OPINION: संजू सैमसन ही बार-बार क्यों पिसें? क्या ड्रेसिंग रूम का दबाव और PR गेम ले रहा है फॉर्म की बलि?

OPINION: संजू सैमसन ही बार-बार क्यों पिसें? क्या ड्रेसिंग रूम का दबाव और PR गेम ले रहा है फॉर्म की बलि?


नई दिल्ली: संजू सैमसन भारतीय क्रिकेट टीम में फिलहाल एक ऐसे खिलाड़ी हैं, जो तलवार की धार पर चल रहे हैं. एक मैच उनका अच्छा गया नहीं कि लोग उनका करियर खत्म करने के पीछे पड़ जाते हैं. सोशल मीडिया यूजर्स और फैंस तक यह बात रहे तो ठीक है, लेकिन जब पूर्व क्रिकेटर्स और एक्सपर्ट्स संजू की काबिलियत पर सवाल उठाते हैं, तब समझ आता है कि शायद संजू को अपने खेल के साथ-साथ पीआर को भी ठीक कर लेना चाहिए, क्योंकि कहते हैं न जो दिखता है, वही बिकता है.

संजू शांत स्वभाव के खिलाड़ी हैं. उन्हें तड़क-भड़क से ज्यादा मतलब नहीं रहता है और वह सोशल मीडिया पर भी ज्यादा एंगेजिंग नहीं हैं. इसका यह मतलब तो नहीं कि संजू को पर्याप्त मौका न मिले. संजू का एक मैच खराब जाता है, तो उन्हें टीम से बाहर कर वैभव सूर्यवंशी को लाने की बातें होने लगती हैं. वैभव को मौका मिलना चाहिए, लेकिन किस कीमत पर? वैभव अच्छा खेलते हैं और उनका अपना तरीका है, तो संजू का भी अपना तरीका है. क्रिकेट के खेल में, खासतौर पर टी20 में, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वैभव और अभिषेक शर्मा आपको हर मैच में 100 रन की पार्टनरशिप करके देंगे.

संजू के बैटिंग ऑर्डर में लगातार हुए हैं बदलाव

हालिया न्यूजीलैंड दौरे पर संजू ने अर्धशतक लगाकर जबरदस्त शुरुआत की थी. वहीं, अभिषेक शर्मा शुरुआती मैचों में अच्छी शुरुआत के बाद आउट हुए, लेकिन एक मैच के शतक ने उनकी उन सब कमियों को ढक दिया. क्या कभी अभिषेक की नाकामी पर यह सवाल उठाया गया कि उन्हें ड्रॉप कर वैभव और संजू से ओपनिंग कराई जाए? संजू अगर एक अर्धशतक लगाकर कोई मैच जिताते हैं, तो उन्हें लेकर कोई बात नहीं होती है, लेकिन वहीं, अगर अभिषेक ऐसा करें, तो युवराज सिंह जैसे खिलाड़ी सोशल मीडिया पर उनकी तारीफ का पीआर करते हैं. वहीं, के लिए कोई स्टैंज नहीं लेता है. ऐसे में संजू बेशक कुछ नहीं कहें, लेकिन मानसिक रूप से जरूर प्रभावित होते हैं जिसका असर उनके खेल पर पड़ता है.

क्या कभी अभिषेक को तीसरे नंबर पर बैटिंग कराने की बात हुई है? आखिर संजू ही क्यों हर बार समझौता करें, कभी ओपनिंग, तो कभी तीसरे नंबर पर, तो कभी मिडिल ऑर्डर में? संजू को टीम इंडिया में कभी ऐसा पक्का स्थान मिला ही नहीं, जिस पर वह खुद को स्थापित कर सकें. संजू ने भी चुपचाप वह सब किया, जो टीम ने उनसे करने के लिए कहा, लेकिन इसके बावजूद, जब संजू की एक खराब सीरीज के बाद उनके करियर को खत्म करने की बात की जाती है, तो इससे निश्चित तौर पर यह पता चलता है कि टीम इंडिया में पीआर का कितना बड़ा रोल है.

संजू सैमसन के खेल में रही है निरंतरता की कमी

यह बात भी सच है कि संजू सैमसन के खेल में निरंतरता की कमी रही है, लेकिन यह कमी उनमें आई कैसे? सवाल टीम मैनेजमेंट से लेकर उन क्रिकेट एक्सपर्ट्स से भी है, जो संजू के एक खराब मैच के बाद उन्हें टीम से बाहर करने का ढोल पीटने लगते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि संजू को टीम इंडिया में वैसा ट्रीटमेंट नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे. आखिर कोई खिलाड़ी अपना बेस्ट कैसे दे पाएगा, जब उसके दिमाग में यह चल रहा हो कि अगले मैच में क्या पता उसे बाहर बैठना पड़ सकता है या उसका बैटिंग ऑर्डर बदला जा सकता है? यही कारण है कि यह सवाल उठता है, आखिर संजू को ही हमेशा बलि का बकरा क्यों बनाया जाता है?



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