Last Updated:
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में सिपाही भर्ती परीक्षा में सामूहिक नकल कराने वाले मुख्य आरोपी अमित राणा की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है. जस्टिस कृष्ण पहल की सिंगल बेंच ने यह कड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी को एक बड़े नकल नेटवर्क का सरगना करार दिया है. गौतमबुद्ध नगर के नॉलेज पार्क थाने में दर्ज इस मामले में पुलिस ने आरोपी के पास से 50 लाख रुपये नकद, पांच लैपटॉप, राउटर और कई मोबाइल फोन बरामद किए थे.
कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में नकल कराने वाले मास्टरमाइंड की जमानत यचिका खारिज. (फाइल फोटो)
प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता और पारदर्शिता को तार-तार करने वाले शातिर अपराधियों पर न्यायपालिका का शिकंजा कसता जा रहा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में सामूहिक नकल कराने और सॉल्वर गैंग संचालित करने के मुख्य आरोपी अमित राणा की जमानत अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया है. जस्टिस कृष्ण पहल की सिंगल बेंच द्वारा सुनाए गए इस कड़े फैसले के बाद आरोपी के कानूनी शिकंजे से बाहर आने की उम्मीदें फिलहाल खत्म हो गई हैं. अदालत ने प्रथम दृष्टया आवेदक को एक बेहद बड़े और संगठित नकल नेटवर्क का मास्टरमाइंड माना है.
यह पूरा मामला गौतमबुद्ध नगर जिले के थाना नॉलेज पार्क का है, जहां पुलिस ने 22 मई 2026 को कार्रवाई करते हुए अमित राणा समेत कुल आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया था. एसआई अक्षय परवीर कुमार त्यागी की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर के अनुसार, छापेमारी के दौरान आरोपियों के पास से पांच लैपटॉप, एक राउटर, ग्याहर मोबाइल फोन, दो प्रवेश पत्र, चार प्रवेश/पहचान पत्र और भारी-भरकम 50 लाख रुपये नकद बरामद किए गए थे. इसके अलावा आवेदक के पास से कुछ अंतरराष्ट्रीय मोबाइल नंबर भी मिले थे. गिरफ्तारी के बाद से ही आरोपी 23 मई 2026 से जेल में बंद चल रहा था.
बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के तर्क
सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता विनीत पांडेय ने दलील दी कि आवेदक पूरी तरह निर्दोष है और उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया है. उनका कहना था कि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और किसी भी अभ्यर्थी ने उससे पैसे लेने या मदद मांगने का आरोप नहीं लगाया है. साथ ही परीक्षा केंद्र से 40 किमी दूर गिरफ्तारी की बात कहते हुए बरामद 50 लाख रुपये को परिचितों से लिया गया कर्ज बताया गया, जिसके समर्थन में तीन रसीदें (12, 15 और 21 लाख रुपये) भी पेश की गईं.
दूसरी ओर, सरकारी वकील ने सह-आरोपी प्रदीप चौहान के मोबाइल से मिले व्हाट्सएप चैट और डिजिटल सबूतों का हवाला दिया. चैट में 8 अप्रैल से प्रवेश पत्र, रोल नंबर और लैब स्लिप साझा होने, प्रॉक्सी सर्वर चलाने तथा परीक्षा वाले दिन अभ्यर्थियों विवेक कुमार और शाकिर मलिक का काम “हो जाने” जैसी बातें सामने आईं. इसके अलावा आईफोन की क्लोनिंग से पता चला कि उसने दिल्ली पुलिस और एसएससी जीडी परीक्षा से जुड़े दर्जनों लिंक अन्य सहयोगियों को भेजे थे.
हाईकोर्ट की टिप्पणी और निर्देश
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि आवेदक की कार्यप्रणाली और डिजिटल साक्ष्य यह साबित करते हैं कि वह नकल के एक बड़े नेटवर्क का सरगना है. ऐसे गिरोह योग्य और मेहनती अभ्यर्थियों का भविष्य बर्बाद करते हैं और पूरी परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. कोर्ट ने 50 लाख रुपये की बरामदगी और अविश्वसनीय रसीदों को देखते हुए उसे राहत देने से इनकार कर दिया. साथ ही निचली अदालत को निर्देश दिया है कि यदि कोई कानूनी बाधा न हो, तो इस मुकदमे का निस्तारण जल्द से जल्द किया जाए.