रेवतीपुर में मिट्टी के हिसाब से आलू और मटर की खेती, जानें नए बीजों पर अनुदान व ई-लॉटरी किट के नियम

रेवतीपुर में मिट्टी के हिसाब से आलू और मटर की खेती, जानें नए बीजों पर अनुदान व ई-लॉटरी किट के नियम


गाजीपुर: खेती में अच्छी पैदावार सिर्फ मेहनत और सिंचाई पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि किसान ने अपने खेत की मिट्टी के अनुसार फसल और बीज की किस्म चुनी है या नहीं. कई बार किसान एक ही फसल और एक ही किस्म का बीज पूरे इलाके में इस्तेमाल करते हैं, जबकि खेतों की मिट्टी की बनावट अलग-अलग होती है. गाजीपुर के रेवतीपुर में यह अंतर साफ दिखाई देता है. यहां एक ही गांव के अलग-अलग मौजों में मिट्टी की प्रकृति बदल जाती है. ऐसे में किसानों के लिए बुवाई से पहले मिट्टी को समझना और उसी के अनुसार बीज चुनना जरूरी है.

कृषि विभाग के तकनीकी सहायक प्रबंधक धीरज के मुताबिक, रेवतीपुर गांव में कुल 14 मौजे हैं और इनकी मिट्टी की बनावट एक जैसी नहीं है. कहीं काली दोमट मिट्टी है तो कहीं बलुई दोमट मिट्टी पाई जाती है. इसका सीधा असर फसलों की बढ़वार और पैदावार पर पड़ता है.

मिट्टी के अनुसार करते हैं खेती 

काली दोमट मिट्टी में नमी रोकने और फसलों को जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने की क्षमता अपेक्षाकृत अच्छी हो सकती है.ऐसे क्षेत्रों में दलहनी और तिलहनी फसलों की खेती बेहतर परिणाम दे सकती है. वहीं, बलुई दोमट मिट्टी में पानी का निकास अपेक्षाकृत तेज होता है. रेवतीपुर के कुछ इलाकों में किसान इस मिट्टी के अनुसार आलू की खेती करते हैं.

कहीं मटर की खेती, तो कहीं आलू पर भरोसा

रेवतीपुर क्षेत्र में मटर की खेती प्रमुख रूप से की जाती है. कृषि तकनीकी सहायक के अनुसार, यहां की कुछ मिट्टियों में मटर की अच्छी पैदावार होती है. वहीं, बलुई दोमट मिट्टी वाले इलाकों में किसान आलू की खेती को प्राथमिकता देते हैं. इसका मतलब है कि एक ही गांव के किसानों को भी फसल का चुनाव करते समय अपने खेत की मिट्टी और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिये.

दलहन और तिलहन की खेती पर जोर, लेकिन बीज का चुनाव भी जरूरी

दलहनी फसलों में मटर, चना और मसूर शामिल हैं, जबकि सरसों प्रमुख तिलहनी फसल है. दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने में भी मदद कर सकती हैं, खासकर जब उनकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु सक्रिय हों। वहीं, तिलहनी फसलें किसानों को खाद्य तेल उत्पादन से जुड़ी खेती का विकल्प देती हैं. कृषि विभाग इस समय इन फसलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को बीज उपलब्ध करा रहा है। कृषि तकनीकी सहायक धीरज के मुताबिक, विभाग के पास फिलहाल मटर, सरसों, चना और मसूर के बीज उपलब्ध हैं.गेहूं के बीज की उपलब्धता भी शुरू हो गई है.

नई और पुरानी किस्मों में क्या है अंतर?

बीज की किस्मों को लेकर कृषि विभाग की ओर से बताया गया कि दस वर्ष से कम समय पहले जारी की गई किस्मों के बीज पर अपेक्षाकृत अधिक सब्सिडी मिलती है, जबकि दस वर्ष से पुरानी किस्मों पर सब्सिडी की मात्रा कम हो सकती है। हालांकि, वास्तविक अनुदान की दर फसल, बीज की किस्म और संबंधित सरकारी योजना के अनुसार अलग-अलग होती है. किसानों के लिए कुछ मिनी किट भी उपलब्ध कराई जा रही हैं.इनमें मटर, चना और मसूर जैसी दलहनी फसलें शामिल हैं. कृषि तकनीकी सहायक के अनुसार, इन मिनी किट का वितरण ई-लॉटरी के माध्यम से किया जाएगा. यानी पंजीकरण कराने वाले सभी किसानों को किट मिलना तय नहीं है, बल्कि चयनित किसानों को इसका लाभ मिलेगा. कुछ बीजों पर सब्सिडी और कुछ मिनी किट का निशुल्क वितरण किया जाएगा.

किसान बीज खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

किसानों को सिर्फ बीज की कीमत या किस्म का नाम देखकर चुनाव नहीं करना चाहिए.खेत की मिट्टी, पानी की उपलब्धता, बुवाई का समय, सिंचाई की सुविधा और स्थानीय मौसम को ध्यान में रखना जरूरी है. कृषि विशेषज्ञों की सलाह से अपने क्षेत्र के अनुकूल प्रमाणित बीज का चुनाव करने पर बेहतर परिणाम मिलने की संभावना बढ़ती है. रेवतीपुर की यह स्थिति बताती है कि खेती में एक ही सलाह हर खेत के लिए कारगर नहीं हो सकती. सही मिट्टी के लिए सही फसल और सही किस्म का चुनाव ही बेहतर उत्पादन की दिशा में पहला कदम है.



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