बाबरी मस्जिद गिराए जाने के एक दिन पहले ही अर्जुन सिंह ने नरसिम्हा राव को किया था आगाह

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के एक दिन पहले ही अर्जुन सिंह ने नरसिम्हा राव को किया था आगाह


Arjun Singh Birth Anniversary: भारतीय राजनीति के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले अर्जुन सिंह तीन बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल रहे. कांग्रेस संगठन में एआईसीसी के उपाध्यक्ष जैसा पदभार भी संभाला. किसी भी राजनेता के राजनीतिक बायोडेटा में ये विवरण उसके संतुष्ट होने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं. लेकिन अर्जुन सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं यहीं तक सीमित नहीं थीं. उन्हें इस बात का हमेशा मलाल रहा कि देश का सर्वोच्च मुकाम यानी प्रधानमंत्री का पद उनसे हमेशा दूर ही रहा. खासकर पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के प्रति उनकी नाराजगी हमेशा बरकरार रही. उन्होंने अपनी आत्मकथा में बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर खासकर राव पर तीखे हमले बोले था.

अर्जुन सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं राजीव गांधी के निधन के बाद से ही जगने लगी थीं. जब 1991 में राजीव की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने राजनीति में आने से इनकार कर दिया तो अर्जुन सिंह ने 10 जनपथ के रास्ते कांग्रेस की राजनीति के शिखर तक पहुंचने का लक्ष्य बना लिया. उन्हें लगता था कि गांधी परिवार के प्रति वफादारी का उन्हें अंतत: पुरस्कार मिलेगा. उन्होंने इस उम्मीद में संभावनाओं से भरा अपना राजनीतिक कॅरियर तक दांव पर लगा दिया था. उन्होंने पीवी नरसिम्हा राव की ओर से सुलह के लिए बढ़ाए गए हाथ को ठुकरा दिया, कांग्रेस छोड़ दी और यहां तक कि अपना अलग दल भी बनाया. काफी उतार-चढ़ाव के बाद वे आखिरकार मूल पार्टी में लौट आए.

स्वयंभू धर्मगुरुओं पर था पूरा भरोसा!

अर्जुन सिंह उन ज्योतिषियों और स्वयंभू धर्मगुरुओं की बातों पर जमकर भरोसा करते थे, जो लंबे समय से उन्हें बताते आ रहे थे कि उनकी जन्मकुंडली में ग्रहों का ऐसा संयोग है, जो राजयोग यानी सत्ता के सर्वोच्च पद पर पहुंचने का संकेत देता है. मध्य प्रदेश के एक चर्चित स्वयंभू धर्मगुरु ने उनसे कहा था, “यह हम पर छोड़ दीजिए. हम सारे ग्रह-नक्षत्र आपके पक्ष में कर देंगे.”

अर्जुन सिंह अपने करीबियों से कहा करते थे कि वे एआईसीसी के उपाध्यक्ष, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. उनकी शानदार राजनीतिक उपलब्धियों की सूची में बस एक ही पद की कमी है – प्रधानमंत्री का पद. उन्हें पूरा विश्वास था कि यह ताज भी एक दिन उनके सिर पर अवश्य सजेगा. वर्ष 1989 में एक बड़े हार्ट अटैक से बच निकलने के बाद उनका यह विश्वास और मजबूत हो गया था. भोपाल के हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों ने लगभग उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन राजीव गांधी के एक फोन के बाद उन्हें समय रहते हवाई मार्ग से दिल्ली के एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट पहुंचाया गया. अर्जुन सिंह को लगा कि उनका बच जाना किसी ‘दैवीय योजना’ का हिस्सा जरूर है. लेकिन यह ‘दैवीय योजना’ अंत तक मुकाम पर नहीं पहुंच पाई.

2004 में आखिरी उम्मीद भी टूट गई…

18 मई 2004 की तारीख अर्जुन सिंह के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुई. कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार को परास्त कर दिया था. सत्ता की बागडोर एक बार फिर से गांधी परिवार के हाथों में थी. सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री का पद नकारने के बाद अर्जुन सिंह काफी उम्मीद से सोनिया की तरफ देख रहे थे. प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान तो ‘सिंह’ हुए, लेकिन वे नहीं. दूसरे सिंह (मनमोहन सिंह) ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली. अर्जुन सिंह कभी भी मनमोहन सिंह की राजनीतिक हैसियत और कद को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाए, लेकिन उनके मन में मनमोहन सिंह के प्रति कोई कटुता भी नहीं थी.

कई साल बाद जनवरी 2011 में बीमार पड़ने से कुछ सप्ताह पहले तक पुराने कांग्रेसी नेता याद करते थे कि हाशिये पर जा चुके अर्जुन सिंह से अगर कोई मिलने आता तो वे ‘गठबंधन की मजबूरियों’, ‘उम्र के तकाजे’ और ‘राजनीतिक संस्कृति, मूल्यों तथा परंपराओं में आए बदलाव’ की बातें करते. सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस में अब उनकी प्रासंगिकता क्यों नहीं रह गई थी, इसे वे इन्हीं आधार पर समझाते थे.

फिर मरणोपरांत प्रकाशित आत्मकथा ने मचाई हलचल

अर्जुन सिंह बिना कोई हलचल पैदा किए लोगों की यादों से ओझल हो जाएंगे, यह भ्रम भी जल्द ही टूट गया. अपनी आत्मकथा ‘अ ग्रेन ऑफ सैंड इन द ऑवरग्लास ऑफ टाइम’, जो उनकी मृत्यु के करीब एक साल बाद प्रकाशित हुई, में अर्जुन सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी नरसिम्हा राव पर जमकर निशाना साधा था. उन्होंने बाबरी मस्जिद के विध्वंस के लिए परोक्ष रूप से राव को ही जिम्मेदार ठहराया था.

अपने संस्मरणों में अर्जुन सिंह ने दावा किया था कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने से दो दिन पहले यानी 4 दिसंबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने उन्हें अयोध्या जाने से रोक दिया था. आत्मकथा के अनुसार, 5 दिसंबर की सुबह अर्जुन सिंह की राव से मुलाकात हुई. वे लिखते हैं, “मैंने कल्याण सिंह के साथ हुई बातचीत का पूरा ब्यौरा उन्हें ज्यों का त्यों बता दिया. जब मैं अपनी बात पूरी कर चुका तो प्रधानमंत्री ने मुझसे पूछा, ‘इस स्थिति को लेकर आपका अपना आकलन क्या है?’ मैंने जवाब दिया, ‘आपने मुझे लखनऊ से बाहर जाने ही नहीं दिया तो मैं आपको क्या आकलन बताऊं?’ इसके बाद उन्होंने और कुरेदते हुए पूछा, ‘नहीं, नहीं, मुझे पता है कि आपके अपने सूत्र हैं. मैं जानना चाहता हूं कि आगे क्या होने वाला है.’ तब मैंने उनसे बिल्कुल साफ शब्दों में कहा कि बाबरी मस्जिद गिराई जाने वाली है. फिर उन्होंने पूछा, ‘यह (विध्वंस) कब हो सकता है?’ मैंने जवाब दिया, ‘यह किसी भी दिन हो सकता है.’” अर्जुन सिंह के अनुसार, मुझे खुद भी अंदाजा नहीं था कि बाबरी मस्जिद अगले ही दिन गिरा दी जाएगी.



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