Last Updated:
Traditional Healer Dashrath Netam: छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के वैद्य दशरथ नेताम 15 साल से अधिक समय से जड़ी-बूटियों से मरीजों का इलाज कर रहे हैं. उनका दावा है कि रोजाना 30-35 मरीज उनके पास पहुंचते हैं. वे किडनी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज का भी दावा करते हैं, हालांकि इन दावों की वैज्ञानिक पुष्टि जरूरी है.
राहुल दुबे(रायपुर),
Traditional Healer Dashrath Netam: छत्तीसगढ़ में आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी पारंपरिक वैद्य और जड़ी-बूटियों से उपचार की परंपरा कायम है. प्रदेश के जंगलों में मिलने वाले औषधीय पौधों, पेड़ों की छाल, पत्तियों और जड़ों से आज भी कई तरह की दवाइयां तैयार की जा रही हैं. पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक औषधियों से इलाज की इस पद्धति को लेकर लोगों में दिलचस्पी बनी हुई है. कुछ वैद्य कैंसर और किडनी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज का भी दावा करते हैं, हालांकि इन दावों की वैज्ञानिक पुष्टि जरूरी है.
15 साल से ज्यादा समय से कर रहे हैं वैद्य का काम
वैद्य दशरथ नेताम ग्राम बांघा, तहसील नगरी, जिला धमतरी के रहने वाले हैं. वे शंभू शक्ति वैद्यराज संघ के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने बताया कि वे लंबे समय से लोगों को जड़ी-बूटियों से तैयार दवाइयां दे रहे हैं. उनके मुताबिक, पहले से दवाइयां तैयार करके रखते हैं, ताकि मरीज के आने पर उन्हें इलाज के लिए इंतजार न करना पड़े. वे मरीजों को सामान्य तौर पर 15 दिन की दवाई देते हैं. उनका दावा है कि रोजाना उनके पास 30 से 35 मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं.
जंगलों से जुटाते हैं जड़ी-बूटियां
दशरथ नेताम के मुताबिक, वे जंगलों से अलग-अलग औषधीय पौधे, पेड़ों की छाल, पत्तियां और जड़ें इकट्ठा करते हैं. कुछ जरूरी सामग्री बाजार से भी खरीदते हैं. वे छत्तीसगढ़ राज्य पादप बोर्ड से भी जुड़े हुए हैं. उनका कहना है कि पादप बोर्ड के माध्यम से उन्हें अलग-अलग औषधीय पौधों की पहचान करने में मदद मिलती है. कई पौधों को वे स्थानीय और आदिवासी नामों से पहचानते हैं, जबकि उनके सरकारी नाम अलग होते हैं.
किडनी के मरीज के इलाज का भी किया दावा
वैद्य दशरथ नेताम ने बताया कि उनके पास कई ऐसे मरीज भी आते हैं, जो अस्पतालों में इलाज कराने के बाद पारंपरिक उपचार की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. उन्होंने एक मरीज का उदाहरण देते हुए दावा किया कि दोनों किडनी खराब होने के बावजूद वह व्यक्ति उनके इलाज के बाद पिछले 8 साल से जीवित है. हालांकि, इस तरह के गंभीर रोगों के इलाज के दावों की स्वतंत्र चिकित्सकीय पुष्टि जरूरी है.
छत्तीसगढ़ के जंगलों में औषधीय पौधों और पारंपरिक चिकित्सा का पुराना ज्ञान आज भी कई वैद्यों के पास मौजूद है. ऐसे में इस परंपरा को समझने, दस्तावेजीकरण करने और वैज्ञानिक तरीके से शोध करने की जरूरत है.