UP Chunav: 2012, 2017 और 2022 से कितना अलग होगा यूपी में 2027 का चुनाव? क्या इस बार भी अखिलेश वही करेंगे जो उनके लिए शुभ है?

UP Chunav: 2012, 2017 और 2022 से कितना अलग होगा यूपी में 2027 का चुनाव? क्या इस बार भी अखिलेश वही करेंगे जो उनके लिए शुभ है?


लखनऊ. यूपी चुनाव 2027 से पहले अखिलेश यादव ने एक ऐसा राजनीतिक संकेत दिया है, जिसने उनकी चुनावी रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने साफ संकेत दिया है कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. अखिलेश यादव साल 2012 विधानसभा चुनाव में बिना चुनाव लड़े ही मुख्यमंत्री बन गए थे. क्या इस बार भी वही करेंगे जो उनके लिए शुभ है? 3 नवंबर 2026 को वाराणसी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अखिलेश ने कहा कि वह लोकसभा सदस्य रहते हुए ही मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं. यानी कन्नौज के सांसद रहते हुए ही वह मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश कर सकते हैं. इस फैसले को केवल चुनाव नहीं लड़ने के निर्णय के तौर पर देखना ही काफी नहीं है. इसके पीछे 2012 के राजनीतिक प्रयोग, 2017 और 2022 के चुनावी अनुभव और 2027 के लिए समाजवादी पार्टी की संगठनात्मक रणनीति को समझना जरूरी है.

2012 का विधानसभा चुनाव अखिलेश यादव के राजनीतिक सफर का निर्णायक मोड़ था. उस समय समाजवादी पार्टी की कमान मुलायम सिंह यादव के हाथों में थी, लेकिन पार्टी की छवि को बदलने की जिम्मेदारी अखिलेश को सौंपी गई थी. 2007 में सत्ता गंवाने के बाद सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलने की थी. पार्टी पर कानून-व्यवस्था और बाहुबलियों को संरक्षण देने जैसे आरोप लगते थे. ऐसे में मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे को पार्टी का नया चेहरा बनाकर आगे किया. अखिलेश ने इस जिम्मेदारी को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने कई स्तरों पर बदलाव की कोशिश की.

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सपा में युवा नेतृत्व को आगे किया

अखिलेश यादवव ने छात्र राजनीति और युवा संगठनों को सक्रिय किया. विश्वविद्यालयों में नए चेहरों को मौका दिया. 2011 में उम्मीदवारों से आवेदन की प्रक्रिया अपनाई गई. टिकट के लिए केवल वरिष्ठ नेताओं की सिफारिश को पर्याप्त नहीं माना गया. सितंबर 2011 में अखिलेश ने समाजवादी क्रांति रथ यात्रा शुरू की. इस दौरान उन्होंने करीब 12 हजार किलोमीटर की यात्रा की और 250 से अधिक सभाएं कीं. लैपटॉप, युवाओं के रोजगार और विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी. साथ ही पारंपरिक नेताओं के साथ नए और पेशेवर औऱ गैरराजनीतिक बैकग्राउंड से आने वाले उम्मीदवारों को भी चुनाव में उतारा.

2012 में अखिलेश यादव ने कैसे संभाली थी सपा की कमान?

इन प्रयासों के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया. 15 मार्च 2012 को 38 साल की उम्र में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने. उस समय वह कन्नौज से लोकसभा सांसद थे और उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था. यानी 2012 में अखिलेश ने खुद विधानसभा सीट जीतने के बजाय पूरी पार्टी को चुनाव जिताने की जिम्मेदारी संभाली थी.

2017 में अखिलेश की रणनीति कैसे बदल गई थी?

2017 का विधानसभा चुनाव अखिलेश यादव के लिए 2012 से बिल्कुल अलग था. इस बार वह मुख्यमंत्री थे और उनके सामने सत्ता बचाने की चुनौती थी. लेकिन चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी के भीतर मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और अखिलेश के बीच वर्चस्व की लड़ाई सामने आ गई. इसका असर पार्टी संगठन और उम्मीदवारों के चयन पर भी पड़ा. अखिलेश ने इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी को चुनाव प्रचार में पेश किया गया. दोनों नेताओं ने रोड शो और साझा रैलियां कीं. कांग्रेस को करीब 105 सीटें दी गईं. लेकिन इस गठबंधन के सामने कई चुनौतियां थीं. जैसे सपा के भीतर नेतृत्व को लेकर विवाद और गठबंधन में सीटों के बंटवारे पर असंतोष. इसके साथ ही कई सीटों पर दोनों सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के बीच दोस्ताना मुकाबला और सरकार के पांच साल के कामकाज और कानून-व्यवस्था पर विपक्ष के सवाल. नतीजा यह हुआ कि 2017 में सपा 47 सीटों पर सिमट गई. अखिलेश मुख्यमंत्री पद से बाहर हो गए.

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि 2017 में भी अखिलेश ने खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था. यानी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का प्रयोग वह 2027 से पहले भी कर चुके हैं. 2017 की रणनीति में अखिलेश खुद मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव का नेतृत्व कर रहे थे, जबकि 2027 में वह विपक्ष में रहते हुए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद के तौर पर चुनावी अभियान की कमान संभालने का संकेत दे रहे हैं.

2022 में अखिलेश ने क्यों बदली थी अपनी रणनीति?

2017 की हार के बाद अखिलेश यादव ने 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया. इस बार उन्होंने कांग्रेस और बसपा जैसे बड़े दलों के साथ गठबंधन करने से परहेज किया. इसके बजाय छोटे क्षेत्रीय और जाति आधारित दलों को साथ जोड़ने की कोशिश की. इस रणनीति के कुछ प्रमुख पहलू थे. पहला- छोटे दलों का बड़ा गठबंधन. अखिलेश ने जयंत चौधरी की आरएलडी, ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा, महान दल और दूसरे क्षेत्रीय दलों को साथ जोड़ा. चाचा शिवपाल यादव से भी राजनीतिक मतभेद खत्म करके गठबंधन किया.

कैसे अखिलेश अपनी रणनीति में बदलाव किया?

दूसरा, गैर यादव ओबीसी पर फोकस किया गया. सपा को यह समझ आया कि केवल यादव और मुस्लिम वोटों के सहारे सत्ता तक पहुंचना मुश्किल है. इसलिए मौर्य, कुशवाहा, राजभर, निषाद और अन्य पिछड़ी जातियों के नेताओं को पार्टी से जोड़ा गया. तीसरा, खुद चुनाव लड़ने का फैसला. 2021 में अखिलेश ने पहले कहा था कि वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन बाद में उन्होंने मैनपुरी की करहल सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया. उन्होंने भाजपा के एसपी सिंह बघेल को 67 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हराया. चौथा, योगी आदित्यनाथ के सामने सीधी राजनीतिक चुनौती. अखिलेश ने खुद को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश किया और चुनाव प्रचार में योगी सरकार को सीधे निशाने पर रखा.

2022 के चुनाव में सपा को 111 सीटें मिलीं और उसका वोट शेयर बढ़कर लगभग 32 प्रतिशत हो गया. हालांकि पार्टी बहुमत के 202 के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी. यहां एक दिलचस्प तथ्य है. 2022 में अखिलेश ने लोकसभा की सदस्यता छोड़कर विधानसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका चुनी थी. 2024 में वह फिर कन्नौज से लोकसभा सांसद बन गए.

2012, 2017 और 2022 से कितना अलग होगा 2027 का चुनाव?

अखिलेश यादव की तीनों चुनावी रणनीतियों में एक बात समान रही है. वह हर चुनाव में पार्टी की सामाजिक और राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं. लेकिन नेतृत्व की भूमिका, गठबंधन और चुनाव लड़ने के तरीके में अंतर रहा है. अखिलेश के लिए चुनाव लड़ना और पार्टी का नेतृत्व करना दो अलग-अलग राजनीतिक भूमिकाएं रही हैं. 2012 और 2017 में वह विधानसभा चुनाव लड़े बिना पार्टी के मुख्यमंत्री चेहरे थे, जबकि 2022 में उन्होंने खुद विधानसभा का चुनाव लड़ा.

कुलमिलाकर 2012 में अखिलेश यादव के सामने पार्टी की छवि बदलने और मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक उत्तराधिकार को स्थापित करने की चुनौती थी. लेकिन 2027 में चुनौती अलग है. अब अखिलेश खुद पार्टी के सर्वमान्य राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. अखिलेश यादव का 2027 में विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला 2012 की राजनीतिक रणनीति की याद जरूर दिलाता है. उस समय भी वह लोकसभा सांसद थे और विधानसभा चुनाव लड़े बिना मुख्यमंत्री बने थे. 2017 में भी उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था, जबकि 2022 में करहल से मैदान में उतरे थे. लेकिन 2027 में परिस्थितियां 2012 जैसी नहीं हैं. तब अखिलेश को पार्टी का नया चेहरा बनना था, अब उन्हें अपने नेतृत्व में पार्टी के सामाजिक आधार और संगठन का विस्तार करना है.



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