Purvanchal Politics: ‘अभय सिंह, ब्रजेश सिंह, धनंजय सिंह मेरे दरबारी’, ठाकुर बाहुबलियों के लिए ओपी राजभर ने ऐसा क्यों कहा? समझें

Purvanchal Politics: ‘अभय सिंह, ब्रजेश सिंह, धनंजय सिंह मेरे दरबारी’, ठाकुर बाहुबलियों के लिए ओपी राजभर ने ऐसा क्यों कहा? समझें


किसी को दरबारी कहना और खुद को सबसे बड़ा गुंडा बताना. ओम प्रकाश राजभर के इस बयान ने पूर्वांचल की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है. उन्होंने धनंजय सिंह, बृजेश सिंह और अभय सिंह जैसे प्रभावशाली ठाकुर नेताओं को अपना दरबारी बताया है. सवाल है कि क्या यह सिर्फ राजभर का सियासी बड़बोलापन है या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति है? आखिर इन तीनों नेताओं के नाम लेकर राजभर क्या संदेश देना चाहते हैं?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओम प्रकाश राजभर अपने बयानों के लिए जाने जाते हैं. विपक्ष पर हमला करना हो या अखिलेश यादव को घेरना हो, राजभर अक्सर सबसे आगे नजर आते हैं. उनकी बयानबाजी कई बार चर्चा का विषय बनती है. लेकिन इस बार उन्होंने पूर्वांचल के तीन बड़े ठाकुर चेहरों को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है.

राजभर ने खुले मंच से धनंजय सिंह, बृजेश सिंह और अभय सिंह का नाम लिया. उन्होंने कहा कि ये लोग उनके दरबार में आते हैं. इसके बाद उन्होंने खुद को सबसे बड़ा गुंडा तक बता दिया. यह बयान सामान्य राजनीतिक बयानबाजी से अलग है. क्योंकि जिन तीन नेताओं का नाम उन्होंने लिया, उनकी अपने-अपने इलाकों में मजबूत पहचान है. तीनों को पूर्वांचल की राजनीति में प्रभावशाली माना जाता है.

बयान पर चर्चा शुरू होने के बाद सुभासपा प्रमुख ओपी राजभर ने कहा-

हम क्या गलत बोले हैं. हम जहां बोलते हैं, जाकर पता कीजिए वहां लोग गरीबों को डराकर, सताकर और धमकाकर रखे हैं. हम उनके बीच में जाकर ललकारते हैं जो भी यहां गुंडी गुंडा घुम रहे हैं उनसे बड़ा गुंडा हम हैं. गरीबों का मनोबल बढ़ाने के लिए, उत्साह भरने के लिए कि उनसे डरे नहीं, अपना कमा खा रहे हैं, वो लोग डराकर वोट लेंगे. योगी जी का राज है.

राजभर को अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास

इस बयान को समझने के लिए पूर्वांचल के जातीय और राजनीतिक समीकरणों को समझना जरूरी है. ओम प्रकाश राजभर जानते हैं कि उनकी पार्टी का प्रभाव किन इलाकों में है. वह यह भी जानते हैं कि पूर्वांचल में चुनाव जीतने के लिए केवल अपनी जाति का वोट काफी नहीं है. दूसरी जातियों का समर्थन भी जरूरी है.

राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) की सबसे बड़ी ताकत उनका राजभर वोट बैंक है. कई विधानसभा सीटों पर यह वोट बैंक चुनाव का रुख बदलने की क्षमता रखता है. यही वजह है कि बीजेपी हो या समाजवादी पार्टी, दोनों दलों को राजभर की राजनीतिक उपयोगिता का अहसास है.

हालांकि, राजभर की ताकत हमेशा एक जैसी नहीं रहती. घोसी विधानसभा उपचुनाव इसका उदाहरण है. उस चुनाव में उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाई थी. लेकिन समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सुधाकर सिंह ने बीजेपी के दारा सिंह चौहान को हरा दिया. इस हार ने दिखाया कि राजभर का वोट बैंक महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन अकेले चुनाव जिताने की गारंटी नहीं है. दूसरे जातीय समीकरण भी उतने ही अहम हैं.

बाहुबली नेताओं के लिए क्यों जरूरी हैं राजभर?

पूर्वांचल की राजनीति में धनंजय सिंह, बृजेश सिंह और अभय सिंह जैसे नेताओं की अपनी पहचान है. इनके पास स्थानीय प्रभाव, राजनीतिक नेटवर्क और समर्थकों का आधार है. लेकिन किसी क्षेत्र में प्रभावशाली होना और चुनाव जीतना दो अलग-अलग बातें हैं.

चुनाव में हर उम्मीदवार को अलग-अलग जातियों का समर्थन चाहिए. खासकर उन सीटों पर जहां राजभर मतदाताओं की संख्या अच्छी है, वहां इस समाज का वोट काफी अहम हो जाता है. यहीं ओम प्रकाश राजभर की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. वह अपने समाज के बीच एक प्रभावशाली नेता हैं. उनके समर्थक कई चुनावों में उनके राजनीतिक फैसले के साथ खड़े होते हैं. ऐसे में दूसरे दलों और नेताओं को भी उनकी जरूरत पड़ती है.

राजभर की पार्टी की एक दूसरी राजनीतिक उपयोगिता भी है. कई बार बड़े दल उन चेहरों को सीधे टिकट देने से बचते हैं, जिनकी छवि विवादित रही है. लेकिन सहयोगी दल के जरिए ऐसे नेताओं या उनके परिवार के सदस्यों को राजनीतिक जगह मिल सकती है. इस तरह गठबंधन की राजनीति में सुभासपा जैसे दलों की भूमिका बढ़ जाती है.

इसका उदाहरण मुख्तार अंसारी के परिवार की राजनीति में भी देखने को मिला. मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी ने सुभासपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और विधायक बने. इससे यह समझा जा सकता है कि राजभर की पार्टी गठबंधन की राजनीति में किस तरह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

अभय सिंह, ब्रजेश सिंह, धनंजय सिंह.

टिकट की राजनीति में भी है राजभर की उपयोगिता

बीजेपी के साथ गठबंधन में रहते हुए राजभर के पास एक राजनीतिक विकल्प मौजूद रहता है. जिन नेताओं को बीजेपी सीधे टिकट देने में सहज नहीं होती, उनके लिए सहयोगी दल के रास्ते संभावनाएं बन सकती हैं. धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला सिंह की राजनीतिक दावेदारी को भी इसी नजरिए से देखा जाता रहा है. इसी तरह बृजेश सिंह के परिवार की राजनीतिक संभावनाओं को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं. ऐसे में राजभर का बयान केवल अपनी ताकत दिखाने की कोशिश नहीं हो सकता. इसके जरिए वह यह संदेश भी दे रहे हैं कि पूर्वांचल में चुनावी राजनीति के कई बड़े चेहरों को उनकी जरूरत पड़ सकती है.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि धनंजय सिंह, बृजेश सिंह या अभय सिंह की पूरी राजनीतिक ताकत राजभर पर निर्भर है. तीनों नेताओं के अपने राजनीतिक आधार हैं. लेकिन गठबंधन और चुनावी समीकरणों में राजभर की भूमिका को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है.

तीनों नेताओं ने चुप्पी क्यों साधी?

राजभर के बयान के बाद सबसे दिलचस्प बात इन तीनों नेताओं की प्रतिक्रिया है. अभी तक उनकी तरफ से कोई बड़ा सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया है. इस चुप्पी के पीछे राजनीतिक मजबूरी हो सकती है. खासकर धनंजय सिंह और बृजेश सिंह जैसे नेताओं के लिए पूर्वांचल में अलग-अलग जातियों का समर्थन जरूरी है. राजभर वोट बैंक भी कई सीटों पर अहम भूमिका निभा सकता है. ऐसे में वे राजभर से सीधे टकराव मोल नहीं लेना चाहते होंगे.

अभय सिंह बीजेपी में हैं. उन्हें फिलहाल टिकट के लिए राजभर की उतनी जरूरत नहीं है. लेकिन उनके इलाके में भी जातीय समीकरणों का महत्व कम नहीं है. इसलिए राजभर के बयान पर प्रतिक्रिया देने से उन्हें भी राजनीतिक नुकसान का अंदेशा हो सकता है. यह भी संभव है कि तीनों नेता इस बयान को राजभर की सामान्य राजनीतिक शैली मानकर नजरअंदाज कर रहे हों. लेकिन उनकी चुप्पी को कमजोरी मानना सही नहीं होगा. राजनीति में कई बार जवाब नहीं देना भी एक रणनीति होती है.

‘सबसे बड़ा गुंडा’ कहकर राजभर ने क्या संदेश दिया?

राजभर के बयान का दूसरा हिस्सा भी काफी महत्वपूर्ण है. उन्होंने खुद को सबसे बड़ा गुंडा बताया. यह सिर्फ मजाकिया टिप्पणी नहीं थी. इसके जरिए उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन करने की कोशिश की. उनका संदेश साफ है. पूर्वांचल में बाहुबल और स्थानीय दबदबा अपनी जगह है, लेकिन चुनावी राजनीति में जातीय समर्थन और राजनीतिक गठबंधन की भी अहम भूमिका है. राजभर यह जताना चाहते हैं कि बड़े से बड़ा नेता भी उनके राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं कर सकता.

दरअसल, पूर्वांचल की राजनीति में ठाकुर नेताओं का प्रभाव लंबे समय से रहा है. लेकिन चुनावी जीत के लिए उन्हें दूसरी जातियों के वोट भी चाहिए. यही वह जगह है जहां राजभर अपनी उपयोगिता साबित करना चाहते हैं.

पूर्वांचल की राजनीति में राजभर का नया दावा

ओम प्रकाश राजभर का यह बयान उनकी राजनीतिक शैली और रणनीति दोनों को दिखाता है. वह जानते हैं कि उनकी पार्टी के पास सीमित सीटें हो सकती हैं, लेकिन गठबंधन की राजनीति में उनकी अहमियत बड़ी हो सकती है. उनकी कोशिश केवल अपने समाज के नेता बने रहने की नहीं है. वह खुद को पूर्वांचल की ऐसी राजनीतिक ताकत के रूप में पेश करना चाहते हैं, जिसके बिना बड़े नेताओं के चुनावी समीकरण अधूरे रह सकते हैं. धनंजय सिंह, बृजेश सिंह और अभय सिंह को दरबारी बताकर उन्होंने इसी राजनीतिक हैसियत का दावा किया है. हालांकि, यह दावा कितना सही है, इसका फैसला चुनावी नतीजे ही करेंगे.

फिलहाल इतना साफ है कि पूर्वांचल की राजनीति में बाहुबल के साथ जातीय समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. कोई नेता अपने इलाके में कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे चुनाव जीतने के लिए व्यापक सामाजिक समर्थन चाहिए. ओम प्रकाश राजभर इसी जरूरत को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में पेश कर रहे हैं.



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