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समस्तीपुर की लोक गायिका सोना आर यादव के छठ गीत सोशल मीडिया पर धूम मचा रहे हैं. उनके 11 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स हैं. वे अपने पारंपरिक गीतों से बिहार की संस्कृति को आगे बढ़ा रही हैं.
अमित कुमार/समस्तीपुर: बिहार में लोक आस्था का महापर्व छठ हो और छठी मैया के पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई न दे, ऐसा संभव ही नहीं है. छठ के नजदीक आते ही गांव से लेकर शहर तक हर तरफ छठी मैया के गीत सुनाई देने लगते हैं. लेकिन आज हम आपको समस्तीपुर की एक ऐसी गायिका से मिलवाने जा रहे हैं, जिनकी आवाज और गीत सोशल मीडिया पर लाखों लोगों के दिलों तक पहुंच रहे हैं. ये हैं समस्तीपुर जिले के दलसिंहसराय प्रखंड क्षेत्र की रहने वाली सोना आर यादव. सोशल मीडिया पर उनके 11 मिलियन से अधिक फॉलोअर्स हैं. छठी मैया की आराधना से जुड़े उनके कई गीत लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. खास बात यह है कि उनके गीतों में बिहार की लोक संस्कृति, पारंपरिक आस्था और छठ पर्व की भावनाओं की झलक देखने को मिलती है. सोना आर यादव रामविलास यादव की पुत्री हैं और उन्होंने अपनी मेहनत तथा गायकी के दम पर संगीत की दुनिया में अलग पहचान बनाई है. आज उनकी गायकी को बड़ी संख्या में लोग पसंद करते हैं. इसी खास मुलाकात में हमने उनसे जाना कि छठी मैया के गीतों के पीछे उनकी भावनाएं क्या हैं और वे अपनी आवाज के जरिए लोगों तक क्या संदेश पहुंचाना चाहती हैं.
गीतों में छिपी है छठी मैया के प्रति अटूट आस्था
बातचीत के दौरान सोना आर यादव ने सबसे पहले छठी मैया की आराधना से जुड़ा एक पारंपरिक गीत गुनगुनाया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में कहा, “छठी माई के ऊंचे ऊंचे घटिया, ओह पर चढ़लो ना जाय, लिही ना भैसुर जी कोदरिया, घटिया देही ना बनाई।” इस गीत के माध्यम से उन्होंने छठ घाट की ऊंचाई और वहां पहुंचने में होने वाली कठिनाइयों को लोकगीत के अंदाज में प्रस्तुत किया। गीत की पंक्तियां सुनकर छठ पर्व की पारंपरिक छटा सामने आने लगती है। इसके बाद उन्होंने दूसरा गीत प्रस्तुत किया, जिसकी पंक्तियां हैं, “सोना सट्टा कुनिया हो दीनानाथ, हे घुमाया छा संसार, आन दीना उगाईछ हो दीनानाथ, आहे भोर भुनी सार।” इस गीत में भगवान सूर्य की उपासना और उगते सूर्य के दर्शन की कामना झलकती है। सोना ने बताया कि छठ के गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए हमारी परंपरा, संस्कृति और आस्था पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है। यही वजह है कि वे अपने गीतों में पारंपरिक भावनाओं को विशेष महत्व देती हैं।
एक गीत ने दिलाई पहचान, अब लोगों तक पहुंचा रही हैं लोक संस्कृति
मुलाकात के दौरान सोना आर यादव ने एक और भावुक गीत सुनाया, जिसके जरिए उन्होंने अपनी पहचान से जुड़े गीत का भी जिक्र किया। उन्होंने गाया, “होई के सुहागिन ए छठी माई अभागिन, बझिन परेले बाटे, नमावा हो, बेटी मंगतिया गोदी में ललनवा, हो एगो दे दा।” इस गीत की पंक्तियों में संतान की कामना और एक मां की भावनाओं को बेहद मार्मिक अंदाज में व्यक्त किया गया है। गीत के जरिए महिलाएं छठी मैया से अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करती हैं. सोना ने बताया कि इसी तरह के गीतों ने उन्हें लोगों के बीच पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. आज सोशल मीडिया के माध्यम से उनके गीत दूर-दूर तक सुने जा रहे हैं.समस्तीपुर की इस कलाकार की खासियत है कि वह आधुनिक डिजिटल मंच पर भी बिहार की पारंपरिक लोक संस्कृति को आगे बढ़ा रही हैं. छठ के मौके पर उनके गीतों की लोकप्रियता यह बताती है कि नई पीढ़ी भी अपनी मिट्टी और परंपराओं से जुड़ना चाहती है.