भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर क्या होगा असर?
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा अमेरिका के साथ व्यापार समझौता है. दोनों देशों के बीच पिछले कई महीनों से ट्रेड डील को लेकर बातचीत चल रही है. लेकिन टैरिफ, कृषि बाजार, डिजिटल बिजनस और रूसी तेल जैसे मुद्दों पर मतभेद के कारण समझौता आसान नहीं रहा. ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति ने भारत के निर्यातकों के सामने भी अनिश्चितता पैदा की थी. अमेरिका भारत का एक बड़ा निर्यात बाजार है. ऐसे में अमेरिकी आयात शुल्क में बदलाव का सीधा असर भारतीय कंपनियों और कारोबारियों पर पड़ता है.
भारत की चिंता यह रही है कि अमेरिका के साथ ऐसा समझौता ना हो जाए जिसमें भारतीय बाजार को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने का दबाव हो, जबकि भारत के अपने किसानों और घरेलू इंडस्ट्री के हित प्रभावित हों. खासतौर पर कृषि सेक्टर भारत के लिए संवेदनशील है. भारत नहीं चाहता है कि अमेरिका के कृषि उत्पादों को बड़े पैमाने पर भारतीय बाजार में एंट्री देने की वजह से घरेलू किसानों को नुकसान उठाना पड़े. इसके अलावा डिजिटल ट्रेड भी बातचीत का बड़ा मुद्दा रहा है. अमेरिका चाहता है कि उसकी टेक्नोलॉजी कंपनियों को भारतीय बाजार में ज्यादा आजादी मिले. वहीं भारत अपने डिजिटल नियमों और नीतिगत अधिकारों को बनाए रखना चाहता है.
अब भारत को क्या फायदा हो सकता है?
ट्रंप की चुनावी हार के बाद अमेरिकी प्रशासन पर घरेलू राजनीतिक दबाव बढ़ेगा. डेमोक्रेट्स टैरिफ और व्यापारिक फैसलों के आर्थिक असर की जांच कर सकते हैं. ऐसे में ट्रंप प्रशासन के लिए भारत जैसे व्यापारिक दोस्तों पर लगातार दबाव बनाना पहले की तुलना में राजनीतिक रूप से महंगा हो सकता है. मिडटर्म चुनाव में हार के बाद ट्रंप की मनमाने तरीके से टैरिफ लगाने की क्षमता को चुनौती मिल सकती है. इससे भारत को ट्रेड डील पर बातचीत में थोड़ा ज्यादा समय और बेहतर शर्तें हासिल करने का अवसर मिल सकता है.
क्या भारत पर अमेरिकी टैरिफ का दबाव कम होगा?
ट्रंप की व्यापार नीति की पहचान टैरिफ रही है. उन्होंने दूसरे देशों से आने वाले सामान पर आयात शुल्क बढ़ाकर अमेरिकी कंपनियों को संरक्षण देने की कोशिश की है. भारत भी इस नीति के कारण मुश्किल में रहा है. लेकिन इस राहत के बावजूद भारतीय निर्यातकों के सामने अनिश्चितता बनी हुई है. अब डेमोक्रेट्स के कांग्रेस पर कंट्रोल का मतलब है कि ट्रंप की टैरिफ नीति पर ज्यादा सवाल उठ सकते हैं. टैरिफ का बोझ आम लोगों पर भी पड़ता है. इसी वजह से ट्रंप की टैरिफ नीति अमेरिका में भी विवाद का विषय बनी हुई है.
रूस से तेल खरीदने पर भारत को मिल सकती है राहत?
भारत और अमेरिका के रिश्तों में रूसी तेल का मुद्दा पिछले कुछ समय से काफी संवेदनशील रहा है. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना शुरू किया. भारत के लिए यह आर्थिक रूप से फायदेमंद था. लेकिन अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाना शुरू किया. ट्रंप ने भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी.
अब क्या बदलेगा?
डेमोक्रेट्स के कांग्रेस में आने से ट्रंप प्रशासन की रूस नीति और उससे जुड़े व्यापारिक प्रतिबंधों पर अधिक चर्चा हो सकती है. रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत को कुछ समय के लिए राहत मिलने की संभावना है. ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर अपनी नीतियों का बचाव करना और दूसरे देशों पर लगातार दबाव बनाना पहले जितना आसान नहीं होगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका भारत को रूसी तेल खरीदने की पूरी छूट दे देगा. रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में कई मुद्दों पर सहमति रही है. इसके अलावा ट्रंप के पास कार्यकारी अधिकार भी मौजूद हैं. इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना होगी.
H-1B वीजा पर क्या ट्रंप प्रशासन को रोक पाएंगे डेमोक्रेट्स?
भारत के लिए अमेरिकी चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू H-1B वीजा भी है. H-1B अमेरिका का एक गैर-आप्रवासी वीजा कार्यक्रम है. इसके तहत अमेरिकी कंपनियां विशेष कौशल वाले विदेशी प्रोफेशनल्स को नौकरी पर रख सकती हैं. इसमें आईटी, इंजिनियरिंग, रिसर्च और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र शामिल हैं. भारतीय पेशेवर इस वीजा कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में रहे हैं. अमेरिका की कई बड़ी टेक कंपनियों में भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और दूसरे एक्सपर्ट्स काम करते हैं.
ट्रंप प्रशासन ने अपने दूसरे कार्यकाल में इमिग्रेशन नीति को सख्त बनाया है. H-1B वीजा की फीस, योग्यता और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी कई बदलाव और विवाद सामने आए हैं. इसका असर भारतीय आईटी कंपनियों, अमेरिकी टेक कंपनियों और वहां काम करने की इच्छा रखने वाले भारतीय युवाओं पर पड़ सकता है डेमोक्रेटिक बहुमत मिलने के बाद ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन पॉलिसी की ज्यादा जांच हो सकती है. सांसद वीजा नियमों में बदलाव, विदेशी पेशेवरों की नियुक्ति और अमेरिकी कंपनियों पर पड़ने वाले असर को लेकर सुनवाई कर सकते हैं. डेमोक्रेट्स कुछ प्रतिबंधों का विरोध भी कर सकते हैं. लेकिन H-1B वीजा नीति को तुरंत बदल देना आसान नहीं होगा.
भारत-अमेरिका के रक्षा संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?
भारत और अमेरिका के रिश्तों में रक्षा सहयोग एक ऐसा इलाका है जहां दोनों देशों के बीच राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर समर्थन देखने को मिला है. अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है. इसकी एक बड़ी वजह चीन का बढ़ता प्रभाव है. रक्षा क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग को अमेरिका में दोनों राजनीतिक दलों का समर्थन मिलता रहा है. डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन दोनों भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को महत्वपूर्ण मानते हैं. इसलिए ट्रंप की चुनावी हार से भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में तत्काल किसी बड़े बदलाव की संभावना कम है. हालांकि कुछ लेवल पर बजट या मंजूरी जैसी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.
क्या ट्रंप अब भारत पर ज्यादा दबाव बना सकते हैं?
यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू है. आमतौर पर माना जाता है कि जब किसी राष्ट्रपति की घरेलू राजनीतिक स्थिति कमजोर होती है तो वह अंतरराष्ट्रीय मामलों में भी ज्यादा सतर्क हो जाता है. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता. एक्सपर्ट्स का मानना है कि घरेलू स्तर पर कमजोर हुआ राष्ट्रपति कभी-कभी विदेश नीति में ज्यादा अटैकिंग मोड भी अपना सकता है. इसकी वजह यह है कि विदेश नीति में राष्ट्रपति के पास कई ऐसे अधिकार होते हैं जिनका इस्तेमाल वह कांग्रेस की मंजूरी के बिना कर सकता है. यानी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की जीत के बावजूद ट्रंप की विदेश नीति पूरी तरह उनके नियंत्रण से बाहर नहीं जाएगी. भारत के लिए यही सबसे बड़ा सबक है कि उसे केवल अमेरिकी चुनावी नतीजों के आधार पर अपनी रणनीति नहीं बनानी चाहिए. हमें अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखनी होगी.