जर्मनी की तरह एक होंगे उत्तर-दक्षिण कोरिया? मर्ज की अपील, सियोल की चाहत क्या?
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जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने उत्तर कोरिया और साउथ कोरिया के एक होने की वकालत की है. उनका कहना है कि बंटवारे का दर्द जर्मन जानते हैं. इसीलिए चाहते हैं कि सियोल और प्योंगयांग को भी एक होना चाहिए.
कोरिया वॉल, जिसे ढहाने की वकालत जर्मनी के चांसलर मर्ज ने की है. (फोटो-रॉयटर्स)
1961 में 14 अगस्त को जब पूर्वी जर्मनी के लेाग सोकर उठे तो सामने एक दीवार थी. यह 155 किलोमीटर लंबी कंक्रीट की दीवार पश्चिमी बर्लिन को अलग कर रही थी. पूर्वी जर्मनी की कम्युनिस्ट सरकार ने इसे रातों रात बनवाया था ताकि खराब आर्थिक स्थिति से तंग आकर लोग पश्चिमी बर्लिन में पलायन न करें. 28 साल तक यह दीवार जर्मनी को बांटने का प्रतीक रही. सोवियत संघ के कमजोर पड़ने के बाद आखिरकार 1989 में इसे ढहा दिया गया. जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज सियोग और प्योंगयांग के बीच भी कुछ ऐसी ही उम्मीद कर रहे हैं.
उत्तर कोरिया और साउथ कोरिया पॉलिटिकल सिस्टम, इकॉनमी और जियोपॉलिटिकल अलायंस को लेकर बंटे हैं. एक दिन पहले जी जर्मन चांसलकर फ्रेडरिक मर्ज ने सोशल मीडिया पर शेयर कए मैसेज में कहा कि जर्मन चाहते हैं कि किसी देश का बंटवारा दर्दनाक होता है. हम चाहते हैं कि उत्तर कोरिया और साउथ कोरिया के बीच की दीवार भी गिरे. उन्होंने लिखा कि हम कोरिया के लोगों की आजादी की कामना करते हैं.
फ्रेडरिक मर्ज ने कोरिया की दीवार गिराने की वकालत की है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि कोरिया इसके लिए कितना तैयार है. DW ने क्यूंग ही यूनिवर्सिटी में फॉरेन पॉलिसी के प्रोफेसर चू जे वू के हवाले से लिखा है कि युवा साउथ कोरियोई लोग नॉर्थ कोरिया को बस एक देश के तौर पर देखते हैं. उनका उत्तर कोरिया से कोई सेंटीमेंटल अटैचमेंट नहीं है. इससे पहले सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर पीस एंड यूनिफिकेशन स्टडीज़ की एक स्टडी से पता चला कि 39.1% साउथ कोरियाई लोगों का मानना था कि दोनों मुल्कों का फिर से एक होना नामुमकिन है.
नॉर्थ कोरिया के लीडर किम जोंग उन पहले ही यह ऐलान कर चुके हैा कि अब फिर से एक होना मुमकिन नहीं है. साउथ कोरिया को एक दुश्मन के तौर पर देखा जाएगा और उनका अब दोनों को एक साथ लाने का कोई इरादा नहीं है. इसके बाद मार्च 2026 में बदले हुए नॉर्थ कोरिया के संविधान को मंजूरी दी गई, जिसमें सुलह और राष्ट्रीय एकता के सभी जिक्रों को हटा दिया गया. सियोल में हनकुक यूनिवर्सिटी ऑफ फ़ॉरेन स्टडीज में पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर मेसन रिची के हवाले से DW के हवाले से लिखा है कि नॉर्थ कोरिया का साउथ कोरिया के करीब आने का कोई इरादा नहीं है.
द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के बाद विजेता देशों ने इसे चार हिस्सों में बांट दिया था. इसके पश्चिमी हिस्से पर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस का कंट्रोल था, जबिक पूर्वी हिस्सा सोवियत संघ के पास था, जिस पर कम्युनिस्ट सरकार थी. ये वो दौर था जब पूर्वी जर्मनी से लगातार लोगों का पलायन पश्चिमी जर्मनी की ओर हो रहा था. 1949 से 1961 के बीच लगभग 25 से 30 लाख लोगों के पलायन का आंकड़ा बताया जाता है. इनमें ज्यादातर लोग डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर थे. इससे पूर्वी जर्मनी की अर्थव्यवस्था खतरे में आ गई. आखिरकार कम्युनिस्ट सरकार ने रातों रात 155 किमी की दूरी तक कंटीले तार लगाने शुरू कर दिए और फिर धीरे धीरे इसे कंक्रीट की दीवार में बदल दिया.
दीवार ने पश्चिमी बर्लिन को चारों तरफ से घेर लिया. इसमें दो दीवारें थीं, दोनों के बीच 100 से 150 गज की जगह खाली थी. इसे डेथ स्ट्रिप कहा जाता था. इसमें कीलें, कांटेदार तार, वॉच टॉपर, शिकारी कुत्ते, बंकर शामिल थे. आदेश था कि अगर कोई इस सीमा को पार करे तो उसे गोली मार दी जाए. 28 साल तक ये दीवार कायम रही. इस दौरान इसे पार करने की कोशिश करने वाले 140 से ज्यादा लोगों की जान ले ली गई. 1989 में पूर्वी जर्मनी में लोकतंत्र की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और उसके बाद जर्मनी की सरकार ने प्रतिबंधों में ढील का ऐलान किया. आखिरकार लोग बर्लिन की दीवार के पास इकट्ठे हुए और खुद ही इसे तोड़ दिया.
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