देहरादून. ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध और वैश्विक उथल-पुथल की वजह से डीजल, बिटुमेन (तारकोल), और निर्माण सामग्री के आसमान छूते दामों ने उत्तराखंड की दूरस्थ सड़क परियोजनाओं की रफ्तार को धीमा कर दिया है. पहाड़ों में विकास का जाल बुनने वाले ठेकेदार अब खुद को बेबस महसूस कर रहे हैं. पुराने एग्रीमेंट और पुरानी दरों पर इस बेकाबू महंगाई के दौर में काम पूरा करना उनके लिए किसी वित्तीय आत्मघात से कम नहीं है.
तंगहाली और घाटे के चक्रव्यूह में फंसे राज्य के ठेकेदारों ने सरकार से गुहार लगाई है कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की तर्ज पर उन्हें भी ‘प्राइस वेरिएशन’ और विशेष राहत पैकेज दिया जाए. ठेकेदारों का कहना है कि जब कच्ची सामग्री और ईंधन की कीमतें रातों-रात बदल रही हैं, तो वे अपनी जेब से नुकसान सहकर कब तक विकास के पहिए को खींचेंगे.
ठेकेदारों को थोड़ी रियायत
पीएमजीएसवाई कांट्रेक्टर अमित जैन लोकल 18 से बताते हैं कि बिटुमिन की दरें बढ़ने से काम रुके हुए हैं. हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश की तरह ही हमारे राज्य के ठेकेदारों को भी राहत दी जाए. भुगतान की प्रक्रिया को भी सरल किया जाना चाहिए. गढ़वाल कांट्रेक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष भीम दत्त भट्ट कहते हैं कि उत्तराखंड सरकार ने अप्रैल में एक आदेश जारी किया था जिसके तहत 30 अप्रैल तक सड़कों के काम किए जाने थे. हालांकि इसमें ठेकेदारों को थोड़ी रियायत दी गई थी. इसके बाद से लगातार रेट बढ़ते जा रहे हैं. हम कभी उत्तर प्रदेश का हिस्सा थे. जो नियम उत्तर प्रदेश में हैं, वही यहां भी लागू होने चाहिए.
पीएमजीएसवाई कांट्रेक्टर एसोसिएशन ठेकेदार संघों के संयुक्त संगठन अध्यक्ष रमेश चंद्र गहतोड़ी ने कहा कि प्रदेश के प्रत्येक ब्लॉक में IN-Situ चट्टानी पत्थर की क्वारी उपलब्ध नहीं है और पीडब्ल्यूडी की SOR 2023-24, 2024-25 में ब्लॉक वाइज दरें बनी हैं, जिनमें ट्रांसपोर्ट या एक्स-क्वारी का कोई प्रावधान नहीं है. ठेकेदार अनुबंधित सड़क की हिल साइड, फॉर्मेशन या फाउंडेशन कटिंग से निकले लोकल मटेरियल का ही यूज करता है, जिस पर पहले से तय रॉयल्टी ही काटी जाती थी, पेनाल्टी का कोई प्रावधान नहीं था. सैंड, ग्रिट, डस्ट निर्धारित क्वारी से रब्बना के साथ क्रय कर कार्यालय में जमा किया जाता है, फिर भी पेनाल्टी थोपी जा रही है. रिजर्व फॉरेस्ट, भू-स्वामी आपत्ति और भूस्खलन क्षेत्रों के कारण हर ब्लॉक में क्वारी नहीं है और SOR में बिना ट्रांसपोर्ट के बाहर से मटेरियल लाना ठेकेदार के लिए असंभव है, इसलिए यह शोषण है.
उन्होंने ने मांग की है कि वर्तमान में दोगुनी वसूली गई पेनाल्टी और नए सर्कुलर से बढ़ाई गई तुगलकी पेनाल्टी दरों को तत्काल वापस लिया जाए. जिला न्यास यानी DMF की कटौती क्षतिपूर्ति के लिए नदी तल के खनन पट्टा धारकों पर लागू होती है, जिसका उपयोग भू-क्षरण और पेयजल क्षति की भरपाई के लिए जिला स्तर पर होना चाहिए, लेकिन आज तक राज्य गठन के बाद किसी भी सड़क की क्षति पूर्ति के लिए DMF से धनराशि नहीं दी गई है, फिर भी ठेकेदारों के बिलों से यह कटौती क्यों की जा रही है, इसे भी तत्काल समाप्त किया जाए.
इन राज्यों में हो चुका भुगतान
गहतोड़ी बताते हैं कि तीसरी और सबसे गंभीर मांग बिटुमिन की दरों को लेकर है. मार्च 2026 के बाद अमेरिका-ईरान युद्ध से हार्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से पेट्रोलियम संकट और बिटुमिन सप्लाई बंद जैसी आपात स्थिति बनी, जिससे दरें बेतहाशा बढ़ गईं. हिमाचल, उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के सभी राज्यों ने 3.75 मीटर सड़क पर 5 लाख रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से बढ़ी दरों का भुगतान कर दिया है, हिमाचल में 22 करोड़ की पहली किस्त भी जारी हो चुकी है. SBD के क्लॉज 54.3 में युद्ध जैसी आपात स्थिति में डिफरेंस देने का प्रावधान है, बावजूद इसके उत्तराखंड सरकार कोई समाधान नहीं दे रही है.