इतिहास के पन्नों में छुपे रहस्यों को बाहर निकालने के लिए जब आधुनिक विज्ञान और अंतरिक्ष तकनीक आपस में मिलती है, तो कई बार ऐसे खुलासे होते हैं जिनपर यकीन करना मुश्किल हो जाता है. कुछ ऐसा ही नजारा एक नदी के नची दबा दिखा. यहां दलदली मिट्टी यानी कीचड़ के नीचे 2,600 सालों से दफन एक बेहद विशालकाय प्राचीन परिसर खोज निकाला गया है. इस दुनिया को कुदरत के डिफेंस सिस्टम ने ऐसे प्रोटेक्ट करके रखा था कि वैज्ञानिक लाख कोशिशों के बाद भी इस तक पहुंच पा रहे थे. सारे रास्ते बंद होने के बाद वैज्ञानिकों ने ऐसा जबरदस्त ‘तकनीकी जुगाड़’ लगाया कि जमीन के अंदर का पूरा नजारा झांक लिया और देखते ही आंखें फटी रही गईं.
मिस्र के नील डेल्टा में मिली अलग दुनिया
ये करिश्मा मिस्र के नील डेल्टा में हुआ है, जहां वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष की ऊंचाइयों से एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो सदियों से पानी और कीचड़ के नीचे छुपा हुआ था.
ये नई खोज मिस्र के उत्तर-पश्चिम में नील डेल्टा के पास स्थित ‘बुतो’ जिसका आधुनिक नाम- टेल एल-फराइन है, ऐतिहासिक टीले पर हुई है. प्राचीन मिस्र में इस जगह को बेहद पवित्र माना जाता था, क्योंकि ये निचले मिस्र की पूजनीय देवी ‘वाद्जत’ का घर हुआ करती थी.
पुरातत्वविद दशकों से इस टीले पर खुदाई कर रहे थे. उन्हें यहां रोमन और टॉलेमी राजवंश के जमाने के कुछ अवशेष तो मिल गए, लेकिन जब वो और गहरे इतिहास को टटोलने चले, तो उनके सामने दो बड़ी दीवारें खड़ी हो गईं.
- पानी का भारी स्तर : जमीन के नीचे पानी का स्तर इतना ऊपर था कि थोड़ी ही खुदाई करने पर गड्ढे तालाब बन जाते थे.
- दलदली और कीचड़ भरी मिट्टी: डेल्टा की चिपचिपी मिट्टी ने वैज्ञानिकों के सारे पारंपरिक तरीकों और डिफेंस सिस्टम को फेल कर दिया. वो तय सीमा से नीचे जा ही नहीं पा रहे थे.
अंतरिक्ष से रडार और बिजली का जुगाड़: ऐसे खुला राज
जब जमीन के रास्ते सारे दरवाजे बंद हो गए, तब वैज्ञानिकों ने आसमान और विज्ञान का ऐसा तगड़ा मेल कराया कि सदियों का रहस्य बेनकाब हो गया.
- अंतरिक्ष से सैटेलाइट की नजर (Sentinel-1): वैज्ञानिकों ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के ‘सेंटिनेल-1’ सैटेलाइट की मदद ली. अंतरिक्ष से छोड़ी गई माइक्रोवोव किरणों ने जमीन की सतह को स्कैन किया और बताया कि ‘कोम सी’ टीले के नीचे एक विशालकाय अंडाकार ढांचा छिपा बैठा है. ये पूरा परिसर आकार में एक फुटबॉल मैदान जितना बड़ा यानी लगभग 420 फीट लंबा और 203 फीट चौड़ा है.
- जमीन पर करंट का जुगाड़ (ERT तकनीक): बिना एक इंच भी खोदाई किए जमीन के अंदर झांकने के लिए वैज्ञानिकों ने ‘इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटी टोमोग्राफी’ का इस्तेमाल किया. उन्होंने धरती के अंदर बिजली का करंट प्रवाहित किया और देखा कि करंट कैसे लौट रहा है. इस अनोखे जुगाड़ से 23 फीट नीचे तक की परतों का एकदम साफ नक्शा कंप्यूटर स्क्रीन पर आ गया.
जमीन के अंदर निकली इतिहास की तीन परतें
जब वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी स्कैन की परतों को खोला, तो अंदर का नजारा देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं. जमीन के नीचे साफ तौर पर 3 अलग-अलग काल की परतें दिखाई दीं.
- ऊपरी परत (0 से 10 फीट): यहां टॉलेमी और रोमन काल के टूटे-फूटे मकान, कच्ची ईंटें और मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले.
- मध्य परत (10 से 20 फीट): यही वो जगह थी जहां 26वें राजवंश यानी ‘साइत काल’ का वह विशालकाय ढांचा मिला. कार्बन डेटिंग से पता चला कि ये 2600 साल पुराना कोई बड़ा शाही मकबरा, पुजारियों का घर या मुख्य मंदिर हो सकता है.
- सबसे निचली परत (20 से 23 फीट): इस प्राचीन ढांचे के ठीक नीचे वैज्ञानिकों को शुद्ध और साफ सफेद रेत की एक मोटी परत मिली. यहीं पर प्राचीन मिस्र के इंजीनियरों का असली दिमागी खेल छुपा था.
2600 साल पहले का ऐसा ‘इंजीनियरिंग जुगाड़’
नील डेल्टा की मिट्टी बड़ी खतरनाक होती है. नमी मिलते ही ये फूल जाती है और सूखने पर सिकुड़कर धंसने लगती है. इतने भारी-भरकम और विशाल पत्थरों-ईंटों के ढांचे को इस दलदली और हिलती हुई मिट्टी पर टिकाना किसी खतरे से खाली नहीं था.
लेकिन 2600 साल पहले के मिस्र के इंजीनियरों ने इसका ऐसा तोड़ निकाला था कि आज के मॉडर्न सिविल इंजीनियर भी हैरान हैं.
भारी दीवारें खड़ी करने से पहले उन्होंने दलदली मिट्टी पर साफ रेत का एक मोटा गद्देदार बेस बिछाया.
ये रेत भवन के भारी वजन को चारों तरफ बराबर बांट देती थी, जिससे इमारत कभी धंसती नहीं थी.
इसके अलावा, ये रेत प्राकृतिक ड्रेनेज का काम करती थी; यानी ज़मीन का पानी आसानी से निकल जाता था और वह ईंटों को गला नहीं पाता था.
मिस्र के संग्रहालय के निदेशक हुसैन बासिर ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि उन पुराने लोगों को अपने पर्यावरण की जबरदस्त समझ थी. आज हम बड़ी-बड़ी इमारतों की नींव में जिस ‘लोड-डिस्ट्रिब्यूटिंग’ तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, वैसी सोच ढाई हजार साल पहले यहाँ लागू थी.
खुदाई में मिले ऐसे अवशेष, जो रोंगटे खड़े कर दें
जब वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि के लिए एक छोटी सी खोदाई की, तो उस रेत की गद्दी पर टिकी हुई कच्ची ईंटों की मजबूत दीवारें सामने आ गईं. इसके साथ ही कुछ ऐसी चीजें मिलीं जिन्होंने इस जगह के धार्मिक और रहस्यमयी होने पर मुहर लगा दी.
- उशाब्ती मूर्तियां: छोटी-छोटी मूर्तियां जो प्राचीन मिस्र में कब्रों में रखी जाती थीं ताकि वो परलोक में मृत व्यक्ति की सेवा कर सकें.
- बलिदान की वोदी: चूना पत्थर की एक ऐसी वोदी मिली जिसकी नालियों में जानवरों के सूखे खून के निशान मिले, जो साफ बताते हैं कि यहां बड़े पैमाने पर धार्मिक अनुष्ठान और बलिकर्म होते थे.
- फेयेंस लंगूर की मूर्ति: ज्ञान और बुद्धिमत्ता के देवता ‘थॉथ’ से जुड़ी एक बेहद दुर्लभ मूर्ति भी यहां से बरामद हुई.
ये खोज साबित करती है कि प्राचीन मिस्र के लोग सिर्फ पिरामिड बनाने में ही माहिर नहीं थे, बल्कि वो सिविल इंजीनियरिंग और भूविज्ञान के भी पक्के उस्ताद थे. फिलहाल वैज्ञानिक अब इस रहस्यमयी जगह के और भी गहरे राज टटोलने की तैयारी कर रहे हैं ताकि इस प्राचीन दुनिया का पूरा सच दुनिया के सामने आ सके.