बिलासपुर: छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं में दीपावली का त्योहार बेहद खास महत्व रखता है. यहां दीपावली सिर्फ दीप जलाने और मां लक्ष्मी की पूजा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस पर्व पर कई ऐसी पारंपरिक मान्यताएं और रीति-रिवाज भी निभाए जाते हैं, जो प्रदेश की लोक संस्कृति और कृषि परंपरा से जुड़े हुए हैं. इन्हीं में से एक है चिराई चुनिया, जिसे दीपावली के अवसर पर घरों में लगाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है.
खास बात यह है कि धान की फसल पकने के बाद नई धान की बालियों से इसे तैयार किया जाता है. इसे सुख-समृद्धि, खुशहाली और धन-धान्य का प्रतीक माना जाता है. दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के दिन इसे विधि-विधान से पूजा करने के बाद घर के मुख्य दरवाजे पर टांगा जाता है. इस परंपरा की झलक इन दिनों बिलासपुर के बाजारों में भी देखने को मिल रही है. देवकीनंदन चौक पर चिराई चुनिया की कई दुकानें सजी हुई हैं, जहां अलग-अलग डिजाइन और आकार में तैयार चुनिया लोगों को आकर्षित कर रही है. कोई इसे अपने घर की परंपरा निभाने के लिए खरीद रहा है, तो कोई इसे परिवार की सुख-समृद्धि का प्रतीक मानकर घर ले जा रहा है. खास बात यह है कि इस पारंपरिक कला के जरिए ग्रामीण परिवारों को रोजगार भी मिल रहा है. गांव से आए करीब 20 लोग हजारों की संख्या में चिराई चुनिया बनाकर बाजार में बेच रहे हैं.
दीपावली पर चिराई चुनिया लगाने की पुरानी परंपरा
छत्तीसगढ़ में चिराई चुनिया का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. मान्यता है कि इसे घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लगाने से सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है. संगीता पांडे बताती हैं कि वे हर साल दीपावली पर चिराई चुनिया खरीदती हैं. पहले इसकी पूजा की जाती है और फिर घर के दरवाजे पर टांग दिया जाता है. उनके अनुसार यह हमारी परंपरा का हिस्सा है और घर में धन-संपदा व समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
धान की फसल पकने के बाद शुरू होती है तैयारी
चिराई चुनिया बनाने की तैयारी दशहरा के बाद शुरू हो जाती है. जब खेतों में धान की फसल पक जाती है, तब ग्रामीण परिवार धान की बालियों से इसे तैयार करने में जुट जाते हैं. मुंगेली जिले से आए आशीष लहरे बताते हैं कि इसे बनाना आसान नहीं है. एक फूल तैयार करने में करीब आधे घंटे का समय लग जाता है. इसमें काफी मेहनत और कारीगर की जरूरत होती है. इसे खासतौर पर चिड़ियों के लिए भी बनाया जाता है और लोकमान्यता में इसे सुख-समृद्धि का संकेत माना जाता है.
20 लोगों का समूह लेकर आया 5 हजार चिराई चुनिया
देवकीनंदन चौक पर बिक्री के लिए मुंगेली जिले के गांव से करीब 20 लोग पहुंचे हैं. उनके समूह ने लगभग 5 हजार चिराई चुनिया तैयार किए हैं. आशीष लहरे बताते हैं कि दीपावली के दौरान होने वाली बिक्री से उनके परिवारों का त्योहार और खर्च निकल जाता है. वे ग्राहकों के प्यार और सहयोग को अपनी मेहनत का इनाम मानते हैं. फिलहाल बाजार में इसकी बिक्री 20, 50, 60 से लेकर 100 रुपये तक हो रही है.
हर साल बदलते हैं डिजाइन, हार और पान कट की खास मांग
चिराई चुनिया अब सिर्फ पारंपरिक स्वरूप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे आकर्षक बनाने के लिए अलग-अलग डिजाइन भी तैयार किए जा रहे हैं. नंद कुमार पात्रे बताते हैं कि वे पिछले 5 से 7 सालों से इसे बना रहे हैं. हर साल नए डिजाइन तैयार किए जाते हैं. बाजार में हार, दिल कट, पान कट और डबल मंजिल जैसी कई डिजाइन उपलब्ध हैं. हर डिजाइन की अपनी अलग बनावट और कीमत है, जिससे ग्राहक अपनी पसंद और बजट के अनुसार खरीदारी कर सकते हैं.
पारंपरिक कला से ग्रामीण परिवारों को मिल रहा रोजगार
चिराई चुनिया बनाने और बेचने का काम ग्रामीण परिवारों के लिए त्योहार के समय अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन गया है. दशहरा के बाद से ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है और दीपावली के नजदीक आते ही ग्रामीण इसे लेकर शहर के बाजारों में पहुंचते हैं. दुकानदारों को उम्मीद है कि जैसे-जैसे लक्ष्मी पूजा का दिन नजदीक आएगा, वैसे-वैसे बिक्री में और तेजी आएगी. इस तरह चिराई चुनिया की परंपरा न केवल छत्तीसगढ़ की संस्कृति को सहेज रही है, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका को भी सहारा दे रही है.