दिल्ली कल सात साल बाद एक बार फिर पुलिसकर्मियों के प्रदर्शन की गवाह बनी. हेडक्वार्टर पर पुलिसकर्मी जुटे और ACP मानस्वी वशिष्ठ और इंस्पेक्टर अरुण कुमार के तबादले का विरोध किया. अब मामले में संबंधित एसीपी को निलंबित कर दिया है. इससे पहले उनका ट्रांसफर कथित तौर पर 23 अक्टूबर को शाहदरा पुलिस स्टेशन में पुलिस और वकीलों के बीच हुई झड़प के बाद किया गया, जिसमें एक वकील के सिर में गंभीर चोटें आईं थीं. अधिवक्ता का आरोप है कि एसीपी ने अपनी पिस्तौल दिखाई थी.
ऐसा सच में हुआ था या नहीं, मगर सात साल पहले दिल्ली में ही पुलिस और वकीलों के बीच ऐसी झड़प हुई थी, जब पुलिस को गोली तक चलानी पड़ी थी. ऐसा ठीक 7 साल पहले 2 नवंबर 2019 को हुआ था, जब तीस हजारी कोर्ट परिसर में गाड़ी पार्क करने को लेकर एक पुलिसकर्मी और वकील के बीच मामूली विवाद हुआ था. मामले में पुलिस पर संबंधित वकील को लॉकअप में ले जाकर पीटने का आरोप लगा. इसके बाद वकीलों ने प्रदर्शन किया. मामला इतना बिगड़ा की पुलिस वाहनों और कोर्ट परिसर में खड़ी की गई गाडि़यों में तोड़फोड़ की गई और उसमें आग लगा दी गई.
पुलिस को करनी पड़ी फायरिंग
हालात इतने बिगड़ गए थे कि उन्हें कंट्रोल करने के लिए पुलिस को फायरिंग तक करनी पड़ी थी. इसमें एक वकील को गोली लग गई थी. इसके बाद भी हालात सामान्य नहीं हुए. इस हिंसा में 20 पुलिसकर्मी तथा कई वकील घायल हुए थे. कई वाहनों का नुकसान पहुंचा था. इस मामले में दोनों पक्षों की ओर क्रॉस एफआईआर दर्ज की गई थी.
इस घटना के बाद दिल्ली के साकेत कोर्ट और कड़कड़डूमा कोर्ट के बाहर वकीलों ने पुलिसकर्मियों की पिटाई कर दी थी. इससे माहौल और खराब हो गया था. 2019 में 5 नवंबर को दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर पर पुलिसकर्मी जुटे थे. यह पहला मौका था जब पुलिस ही प्रर्शन पर उतर आई थी. पुलिसकर्मियों ने तब 11 घंटे तक मुख्यालय को घेरे रखा था.
न्यायिक आयोग ने की थी जांच
मामला इतना बढ़ गया था कि दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था. शुरुआती कार्रवाई के तौर पर दो सब इंस्पेक्टर निलंबित किए गए थे और दो वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला किया गया था. कोर्ट ने पुलिस को जांच लंबित रहने तक वकीलों पर किसी तरह की कार्रवाई करने से रोक दिया था.
मामले में दिल्ली पुलिस ने वकीलों पर हत्या के प्रयास और दंगा जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था, मगर कोर्ट के आदेश पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी. उधर वकीलों ने सभी कोर्ट में हड़ताल कर दी थी. बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया और बार काउंसिल ऑफ दिल्ली की पुलिस प्रशासन के साथ कई मैराथन बैठकों के बाद हालात सामान्य हुए थे.
मामले में वकीलों की हुई थी जीत
मामले में 170 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज कराए गए थे. कोर्ट ने एक मानवीय फैसला लेते हुए वकीलों को अनुग्रह राशि देने का आदेश दिया था. जो गोली लगने से घायल हुए उन्हें 50 हजार रुपये और अन्य घायल वकीलों को 25 हजार रुपये दिए गए थे. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में दखल नहीं देगा, मगर कोर्ट ये देखें कि अनुशासन और कानून व्यवस्था बनी रहे. इसके बाद कोर्ट परिसरों में सीसीटीवी व अन्य सुरक्षा बंदोबस्त के आदेश दिए गए. वकीलों के लिए भी आदेश जारी किया गया कि अगर उन्होंने अदालतों के भीतर हिंसा की या पुलिसकर्मियों पर हमला किया तो उन पर लाइसेंस रद्द करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है.
अब फिर हेडक्वार्टर पर जमा हुए पुलिसकर्मी
23 अक्टूबर को शाहदरा में पुलिस स्टेशन में एक बार फिर वकीलों और पुलिसकर्मियों के बीच झड़प हुई. इसके बाद मानस्वी वशिष्ट और इंस्पेक्टर अरुण कुमार के तबादलों के विरोध में सैकड़ों पुलिसकर्मी मुख्यालय पर जमा हुए, हालांकि पुलिस ने इसे संपर्क सभा बताया. पहले पुलिसकर्मी हेडक्वार्टर के बाहर जमा रहे, फिर अंदर पहुंचे.
शुरुआत 100 जवानों से हुई. हालांकि बाद में इनकी संख्या 500 हो गई थी. इस दौरान कई वीडियो सामने आए, जिसमें अधिकारी जवानों को इकट्ठा होने से रोक रहे थे. खास बात ये है कि इस दौरान पुलिसकर्मियों के साथ खुद एसीपी मानस्वी वशिष्ठ भी थे. हालांकि उन्होंने पुलिसकर्मियों के इस जुटान को स्वाभाविक बताया.