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Kota Famous Rabri Jalebi: कोटा में 75 साल पुरानी दूध-जलेबी की दुकान अपने अनोखे स्वाद और विरासत के लिए मशहूर है. पहलवान दादाजी को अखाड़े के बाद दूध-जलेबी खाने का शौक था, जो धीरे-धीरे पारिवारिक कारोबार बन गया. आज शंभू लाल की यह दुकान चार पीढ़ियों की पहचान बन चुकी है. पहली बार कोटा दशहरा मेले में पहुंची इस दुकान पर रोजाना 500 से 1000 लोग रबड़ी, दूध और जलेबी का स्वाद लेने आ रहे हैं.
कोटा. एक पहलवान को अखाड़े के बाद दूध-जलेबी का नाश्ता पसंद था. वही शौक आज चार पीढ़ियों की पहचान बन चुका है. पुराने कोटा की “शंभू लाल” की दुकान अब पहली बार कोटा दशहरा मेले में पहुँची है, और रोज़ 500 से 1000 लोग इसका स्वाद लेने आ रहे हैं.
इस सफ़र की शुरुआत रामपुरा से हुई. परदादा ओंकार लाल जी सैनी ने दुकान की नींव रखी. उनके बाद दादाजी शंभू लाल जी आए, जिनके नाम पर आज दुकान जानी जाती है. वे खुद पहलवान थे, और पहलवानी के बाद दूध-जलेबी खाना उन्हें बेहद पसंद था. आसपास के लोगों को भी यह स्वाद भाने लगा, तो उन्होंने इसकी दुकान डाल दी. देखते-देखते वह पूरे इलाके में मशहूर हो गई. इसके बाद पिता चंद्रप्रकाश जी और चाचा भरत प्रकाश जी ने विरासत संभाली. आज चौथी पीढ़ी के अभय ने बताया कि हम परिवार के साथ मिलकर इसे आगे बढ़ा रहे हैं. पीढ़ियाँ बदलीं, पर स्वाद नहीं बदला.
स्वाद का असली राज
अभय सेनी इसका राज़ एक ही शब्द में बताते हैं: शुद्धता, वे कहते हैं, “हम हर चीज़ शुद्ध बेचते हैं, इसलिए हमारा टेस्ट भी वही है. कोई मिलावट नहीं.” जलेबी देशी घी में बनती है और रबड़ी के लिए शुद्ध गाय और भैंस का दूध इस्तेमाल होता है. दुकान सुबह 5 बजे खुल जाती है, और 6:30 बजे तक गरमागरम रबड़ी, दूध और जलेबी ग्राहकों को मिलने लगती है.
इस बार मेले को चखाया स्वाद
हाड़ौती क्षेत्र समेत आसपास के इलाकों से लगातार डिमांड आ रही थी. लोग कहते थे कि इतना पुराना और भरोसेमंद स्वाद मेले में भी मिलना चाहिए. इसी वजह से इस बार दशहरा मेले में दुकान लगाई गई. रिस्पांस बहुत अच्छा है. रोज़ 500 से 1000 लोग स्टॉल पर आते हैं.अभय ने कहा नगर निगम की व्यवस्था भी अच्छी हैं और वे कहते हैं कि मेले में सब कुछ बहुत बढ़िया है.हम भी वही क्वालिटी, वही स्वाद, और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक दे रहे है, जिस दुकान की शुरुआत एक पहलवान के नाश्ते से हुई थी, वह आज कोटा की पहचान बन चुकी है.