भगवान राम के धनुष और श्रीकृष्ण की बांसुरी पर क्या कह गए धीरेंद्र शास्त्री, क्यों होने लगे ट्रोल?

भगवान राम के धनुष और श्रीकृष्ण की बांसुरी पर क्या कह गए धीरेंद्र शास्त्री, क्यों होने लगे ट्रोल?


Bageshwar Baba Controversy: धार्मिक कथाओं के दौरान कही गई छोटी-सी बात भी कई बार बड़ी बहस की वजह बन जाती है. बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का एक वीडियो इन दिनों इसी वजह से चर्चा में है. इसमें वह भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप, उनकी मुद्राओं और धनुष-बांसुरी की तुलना करते हुए नजर आ रहे हैं. कुछ लोगों को उनका अंदाज और बात कहने का तरीका पसंद नहीं आया. वहीं, कई लोग इसे कथा के दौरान किया गया हास्य और दोनों भगवानों के अलग-अलग स्वरूप समझाने की कोशिश मान रहे हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि बाबा आखिर कहना क्या चाहते थे? क्या उनकी बात को गलत समझा गया या धार्मिक मंच पर शब्दों के चयन को लेकर उठ रहे सवाल वाजिब हैं? इस पूरे मामले को समझना जरूरी है.

आखिर बागेश्वर बाबा ने भगवान राम और कृष्ण को लेकर क्या कहा?

यह मामला मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करेरा में आयोजित श्रीराम कथा का है. यहां धीरेंद्र शास्त्री कथा के दौरान भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की तुलना करते नजर आए. वायरल वीडियो में वह कहते हैं कि भगवान राम सीधे खड़े होते हैं, जबकि श्रीकृष्ण की मुद्रा तीन जगह से टेढ़ी होती है. उन्होंने श्रीकृष्ण के बांसुरी बजाने और वृंदावन का जिक्र करते हुए भगवान राम के धनुष और अयोध्या से भी तुलना की.
उनकी बात का एक हिस्सा यह भी था कि बांसुरी बजाना आसान है, लेकिन धनुष चलाना हर किसी के बस की बात नहीं. इस दौरान मंच पर मौजूद बांसुरी बजाने वाले व्यक्ति की ओर इशारा करके उन्होंने माहौल को हंसी-मजाक वाला बना दिया. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, धीरेंद्र शास्त्री ने बाद में यह भी कहा कि उन्होंने यह बात मजाक-मजाक में कही थी.

क्या बाबा असल में दोनों भगवानों के बीच अंतर समझाना चाहते थे?

इस पूरे बयान को धार्मिक संदर्भ में देखें तो भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व और लीलाओं का वर्णन अलग-अलग भावों में किया जाता है. भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, जबकि भगवान श्रीकृष्ण को लीला पुरुषोत्तम के रूप में जाना जाता है. श्रीराम का जीवन मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श का उदाहरण माना जाता है. वहीं श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम, नीति, ज्ञान और अलग-अलग लीलाओं से जुड़ा है.

श्रीकृष्ण की तीन जगह से मुड़ी हुई मुद्रा को धार्मिक कला और परंपरा में त्रिभंग मुद्रा कहा जाता है. यह उनकी एक खास पहचान है. इसलिए उनके टेढ़े खड़े होने की बात अपने आप में अपमान नहीं है. असली सवाल यह है कि इस मुद्रा और भगवान के स्वरूप का जिक्र किस भाव और किन शब्दों में किया गया.

ऐसा लगता है कि कथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री अपने अंदाज में भगवान राम के धनुष और श्रीकृष्ण की बांसुरी के जरिए दोनों के अलग-अलग स्वरूप समझाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन बात समझाने के लिए चुने गए शब्दों ने ही विवाद खड़ा कर दिया.

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सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग सही या फिर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया?

सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर दो तरह की राय दिखाई दे रही है. एक पक्ष का कहना है कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं. ऐसे में किसी एक को ऊंचा और दूसरे को कमतर दिखाने वाली भाषा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. खासकर जब बोलने वाला व्यक्ति धार्मिक मंच से बड़ी संख्या में लोगों को संबोधित कर रहा हो.

दूसरी तरफ कुछ लोग इसे कथा के दौरान किया गया हास्य और दोनों भगवानों के अलग-अलग स्वरूपों को समझाने का तरीका मान रहे हैं. उनका सवाल है कि क्या हर मजाक को अपमान मानकर किसी को ट्रोल करना सही है? क्या वीडियो का एक हिस्सा देखकर किसी के पूरे भाव और मंशा का फैसला कर देना उचित है?

यहां एक बात समझनी जरूरी है. किसी सार्वजनिक व्यक्ति के बयान की आलोचना करना और उसे सोशल मीडिया पर अपशब्द कहकर निशाना बनाना दो अलग बातें हैं. अगर किसी की भाषा से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं तो उस पर सवाल उठाना गलत नहीं है. लेकिन आलोचना में गाली-गलौज, व्यक्तिगत हमले और बिना पूरी बात समझे बहिष्कार की मांग करना भी सही तरीका नहीं है.



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