चलने की तीन दिशाएं लेकिन वक्त की सिर्फ एक ही रफ्तार क्यों? क्वांटम थ्योरी ने खोल दिए अनसुलझे ताले

चलने की तीन दिशाएं लेकिन वक्त की सिर्फ एक ही रफ्तार क्यों? क्वांटम थ्योरी ने खोल दिए अनसुलझे ताले


हम जिस दुनिया में रहते हैं, वहां आगे-पीछे, दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे जाने की आजादी है. इसे हम स्पेस के तीन डायमेंशन कहते हैं. इसके विपरीत समय हमेशा केवल आगे की तरफ एक ही दिशा में बहता है. सवाल उठता है कि हमारे ब्रह्मांड में समय का सिर्फ एक ही आयाम क्यों है. क्या समय के दो या तीन रास्ते नहीं हो सकते थे. इस बुनियादी सवाल का जवाब खोजने के लिए सर्बिया की बेलग्रेड यूनिवर्सिटी के तीन फिजिसिस्ट्स ने नया गणितीय मॉडल तैयार किया है. वैज्ञानिकों ने क्वांटम ग्रेविटी के एक खास मॉडल का उपयोग करके कंप्यूटर पर पूरा सिमुलेशन चलाया. इसमें वर्चुअल चार आयामी त्रिभुजों को आपस में जोड़ा गया. करीब 20 अरब से ज्यादा कैलकुलेशन के बाद बेहद हैरान करने वाले नतीजे सामने आए हैं. इस स्टडी ने दिखाया है कि कुदरत के सूक्ष्म टुकड़े जुड़कर अपने आप तीन स्पेस और एक टाइम वाला ब्रह्मांड बना लेते हैं.

आइंस्टीन और मिन्कोवस्की के पुराने मॉडल से क्या नया निकलकर आया?

करीब सौ साल पहले महान गणितज्ञ हरमन मिन्कोवस्की ने दुनिया को स्पेसटाइम का फलसफा समझाया था. मिन्कोवस्की अल्बर्ट आइंस्टीन के गणित के टीचर थे. उन्होंने पहली बार बताया कि स्पेस के तीन आयाम और समय का एक आयाम आपस में बुने हुए हैं. शुरुआती दौर में आइंस्टीन को यह विचार सिर्फ किताबी गणित लगा था. बाद में आइंस्टीन ने इसी ढांचे में ग्रेविटी को जोड़कर जनरल रिलेटिविटी का सिद्धांत तैयार किया.

उन्होंने सपाट स्पेसटाइम को घुमावदार स्पेसटाइम में बदल दिया. इसके बावजूद आधुनिक साइंस के सामने यह गुत्थी अनसुलझी रही कि ब्रह्मांड ने यही खास अनुपात क्यों चुना. स्पेस के तीन और समय का एक ही आयाम क्यों बना. इसी उलझन को सुलझाने के लिए सर्बिया के वैज्ञानिकों ने नए नजरिए से काम शुरू किया. उन्होंने आधुनिक भौतिकी के बुनियादी नियमों को अलग रखकर शुद्ध ज्यामिति के जरिए ब्रह्मांड की संरचना को परखा है.

तीन दिशाएं चलने की और वक्त की सिर्फ एक ही रफ्तार क्यों? नए गणितीय मॉडल ने दुनिया को चौंकाया. (AI Generated Video)

क्वांटम ग्रेविटी के वर्चुअल पत्तों से ब्रह्मांड कैसे खड़ा हुआ?

बेलग्रेड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने इस काम के लिए क्वांटम ग्रेविटी का एक टॉय मॉडल चुना.

  • इस मॉडल में ब्रह्मांड को ताश के पत्तों से बने किसी महल की तरह देखा गया. इसमें चार आयामी ज्यामितीय टुकड़ों का इस्तेमाल किया गया. इन्हें गणित की भाषा में फोर-सिम्प्लिसेस कहा जाता है.
  • ये चार आयामी टुकड़े असल में तीन आयामी टेट्राहेड्रॉन से बनते हैं. टेट्राहेड्रॉन दो आयामी त्रिभुजों से मिलकर बनते हैं. त्रिभुज एक आयामी किनारों से बनते हैं और किनारे शून्य आयामी बिंदुओं पर मिलते हैं.
  • वैज्ञानिकों ने इन सभी टुकड़ों के किनारों की लंबाई को रैंडम आधार पर तय किया. इसमें सबसे छोटी सीमा प्लांक लेंथ यानी 10 की घात माइनस 35 मीटर रखी गई. यह वह पैमाना है जहां भौतिकी के मौजूदा नियम काम करना बंद कर देते हैं.

इसके लिए लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर और लीगो-वर्गो जैसी वैधशालाओं के डेटा की मदद ली गई. इससे तय हुआ कि किसी भी तरह की ज्यामितीय दरार सिर्फ परमाणु से भी खरबों गुना छोटे स्तर पर ही मौजूद हो सकती है.

एक चार-आयामी सिम्पलेक्स बिल्डिंग ब्लॉक. (Credit : Djordjevic et al., arXiv, 2026)

20 अरब सिमुलेशन टेस्ट में वैज्ञानिकों को क्या चौंकाने वाले आंकड़े मिले?

रिसर्च टीम ने करीब एक लाख सिम्प्लिसेस के टुकड़ों को लेकर तीन अलग-अलग तरह के ब्रह्मांडीय मॉडल बनाए.

  1. पहले मॉडल में एक चार आयामी गेंद थी जिसकी सीमा तय थी.
  2. दूसरे मॉडल में एक ऐसा चार आयामी गोला था जिसकी कोई सीमा नहीं थी.
  3. तीसरा मॉडल बिखरे हुए एक लाख टुकड़ों का एक अनियंत्रित समूह था.

इसके बाद कंप्यूटर पर 20 अरब से ज्यादा गणनाएं की गईं. जब इन सभी रैंडम टुकड़ों को आपस में जुड़ने दिया गया तो परिणाम हैरान करने वाले थे. लगभग 85 प्रतिशत मामलों में यह सिस्टम अपने आप हमारे ब्रह्मांड जैसे स्पेसटाइम में बदल गया. इसमें खुद ब खुद तीन स्पेस और एक टाइम का आयाम तैयार हो गया. वैज्ञानिकों ने किनारों की लंबाई को जब स्पेस जैसी दूरी माना तब यह नतीजा सबसे ज्यादा सटीक रहा. अलग-अलग लंबाई के टुकड़े जब ज्यामितीय रूप से एक साथ फिट होते हैं तो वे अपने आप समय की एक दिशा पैदा कर देते हैं.

अगर समय के दो आयाम होते तो दुनिया किस कदर बदल जाती?

सिमुलेशन के दौरान कुछ अजीब स्थितियां भी देखने को मिलीं. करीब 6 फीसदी मामलों में ऐसा ढांचा सामने आया जिसमें चार स्पेस डायमेंशन थे और समय का कोई नामोनिशान नहीं था. यह पूरी तरह से जमा हुआ एक स्थिर संसार था. वहीं करीब 8 फीसदी मामलों में दो स्पेस और दो टाइम डायमेंशन वाला ढांचा बना. अगर दो टाइम डायमेंशन होते तो भौतिकी के कारण और प्रभाव का नियम पूरी तरह टूट जाता. वहां कोई भी घटना एक सीधी रेखा में नहीं घटती.

वैज्ञानिक इस बात से चकित रह गए कि समय की दिशा बनाने के लिए पहले से समय के गुणों की जरूरत नहीं पड़ी. सिर्फ स्पेस जैसे किनारों को जोड़ने पर ही टाइम की दिशा अपने आप उभर कर सामने आ गई. यह दिखाता है कि हमारे ब्रह्मांड का बुनियादी ढांचा किसी सोची-समझी योजना के बिना भी कुदरती तौर पर इसी रूप में ढलने की सबसे ज्यादा संभावना रखता है.

ब्रह्मांड के बाहरी आकार का इस पूरे खेल पर क्या कोई असर पड़ता है?

स्टडी का एक और सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि ब्रह्मांड के समग्र आकार से नतीजों पर कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ा. चाहे ब्रह्मांड गेंद जैसा हो, गोलाकार हो या पूरी तरह बिखरे हुए टुकड़ों का ढेर हो. सभी स्थितियों में नतीजे लगभग एक जैसे ही मिले. इससे यह संकेत मिलता है कि स्पेस और टाइम का बंटवारा किसी बहुत बड़े कॉस्मिक स्तर पर नहीं होता. यह बंटवारा स्थानीय स्तर पर यानी बहुत छोटे पैमाने पर ज्यामिति के मिलने से तय होता है.



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