Israel Election News: यहूदी-अरब गठबंधन या कुछ सरप्राइज? 2000 लोग उतरे सड़कों पर ट्रंप का नेतन्याहू को कॉल इजरायल में चल क्या रहा है?


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Israel Political Crisis: इजरायल में इस वक्त जो स्थितियां बनी हुई हैं, वो काफी दिलचस्प हो गई हैं. यहां किसी को बहुमत नहीं मिल सका और सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर नेतन्याहू की लिकुड पार्टी है, बावजूद इसके सरकार बनाने की उनकी स्थिति नहीं है. वहीं विपक्ष इस पशोपेश में है कि अरब पार्टियों से समर्थन लेना है या नहीं.

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यहूदी-अरब गठबंधन या सरप्राइज? 2000 लोग सड़कों पर, ट्रंप की नेतन्याहू को कॉल Zoom

इजरायल की पॉलिटिक्स उलझी हुई है.

Israel political turmoil: इजरायल की राजनीति इस समय अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है. 27 अक्टूबर  को हुए नेसेट चुनाव के नतीजों ने किसी एक पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है. ऐसे में 31 अक्टूबर शाम को तेल अवीव में करीब दो हजार लोग यहूदी-अरब सरकार बनाने के समर्थन में सड़कों पर उतरे. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के विरोधियों को कुल 67 सीटें मिली हैं, लेकिन सरकार बनाने का रास्ता अभी भी कांटों भरा है.

चुनावी आंकड़ों के मुताबिक 120 सदस्यीय नेसेट में नेतन्याहू के गठबंधन ब्लॉक को 53 सीटें मिलीं. उनके विरोध में खड़ी यहूदी पार्टियों को अकेले 48 सीटें हासिल हुईं. अरब पार्टियों ने ऐतिहासिक रूप से 19 सीटें जीतीं. अगर विपक्षी यहूदी पार्टियां और अरब पार्टियां मिल जाएं तो कुल 67 सीटें हो जाती हैं, जो बहुमत के लिए काफी हैं. अब पेच ये है कि ज्यादातर यहूदी विपक्षी दल अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने को तैयार नहीं हैं. नतीजा यह है कि नेतन्याहू के पास भी 61 का जादुई आंकड़ा नहीं है और उनके विरोधियों के पास भी अकेले दम पर सरकार बनाना मुश्किल है. 10 नवंबर को नए नेसेट की शपथ होनी है.

तेल अवीव की सड़कों पर दो अलग आवाजें

31 अक्टूबर को हैबीमा स्क्वायर में वामपंथी ग्रुप स्टैंडिंग टुगेदर के नेतृत्व में रैली हुई. प्रदर्शनकारी राबिन स्क्वायर की ओर मार्च करते रहे. वे नारे लगा रहे थे- ‘यहूदी और अरब दुश्मन नहीं बनेंगे’, ‘नस्लवाद नहीं, साझेदारी हाँ’ और ‘साझेदारी व बराबरी के साथ सरकार बदलेंगे’. कुछ नारे अरबी में भी लगे- ‘शांति, आजादी, सामाजिक न्याय.’ उनके हाथों में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था- ‘बदलाव के लिए बहुमत है’ और ‘सभी के लिए समानता’. इसी दौरान एक छोटा दक्षिणपंथी प्रदर्शन भी हुआ जिसमें करीब 200 लोग शामिल हुए. वे चुनाव में धांधली की जांच की मांग कर रहे थे. लिकुड पार्टी ने अरब पार्टियों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने विदेशी सरकारों की मदद से चुनाव चुराया है. दोनों समूहों के बीच कुछ बहस भी हुई. यरूशलम के पेरिस स्क्वायर और हाइफा के यूनेस्को स्क्वायर में भी यहूदी-अरब सरकार की मांग को लेकर छोटी रैलियां हुईं.

नेतन्याहू से ट्रंप ने की बात. (फाइल फोटो-रॉयटर्स)

ट्रंप ने क्यों की बीबी से बात?

इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू से फोन पर बात की है. माना जा रहा है कि ये कॉल ईरान पर अमेरिका-इजरायल की स्ट्राइक को रिज्यूम करने के लिए की गई थी वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों को इस कॉल की जानकारी है, उनके मुताबिक अमेरिका अब भी ईरान के दो और ठिकानों को तबाह करना चाहता है. इजरायल-अमेरिका की ज्वाइंट स्ट्राइक से ही इस युद्ध की शुरुआत हुई थी और अब एक बार फिर ट्रंप चाहते हैं कि वे ईरान पर हमले करें. इजरायल में चल रहे पॉलिटिकल क्राइसिस के बीच नेतन्याहू क्या फैसला लेते हैं, इस पर भी नजरें रहेंगी.

सरकार बनाने की उलझन क्यों बढ़ी?

नेतन्याहू के विरोधियों के पास कागजों पर 67 सीटें हैं, लेकिन अरब पार्टियों को साथ लिए बिना यह आंकड़ा सिर्फ 48 पर सिमट जाता है. कई यहूदी दल सुरक्षा और राजनीतिक कारणों से अरब पार्टियों के साथ गठबंधन करने से हिचक रहे हैं. दूसरी तरफ नेतन्याहू के ब्लॉक को भी अतिरिक्त समर्थन की जरूरत है. इस स्थिति में कोई भी पक्ष आसानी से सरकार नहीं बना सकता या तो अरब पार्टियों के साथ समझौता होगा या फिर कुछ सदस्यों के दलबदल की नौबत आएगी.

आगे क्या होने की संभावना ?

इजरायल में गठबंधन की राजनीति नई नहीं है, लेकिन इस बार अरब पार्टियों की 19 सीटें निर्णायक बन गई हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि असली बदलाव तभी संभव है जब यहूदी और अरब मिलकर काम करें. वहीं दूसरी तरफ आरोप-प्रत्यारोप का माहौल भी गर्म है. चुनाव में गड़बड़ी के दावे और जवाबी प्रदर्शन राजनीतिक तनाव को और बढ़ा रहे हैं. अभी देशभर में चर्चा यही है कि नवंबर में नेसेट के सत्र शुरू होने तक कोई बड़ा समझौता होता है या नहीं. अगर कोई सूत्र नहीं निकला तो राजनीतिक गतिरोध लंबा खिंच सकता है. तेल अवीव की सड़कों पर उठी आवाजें इस बात की याद दिलाती हैं कि मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा अब साझेदारी वाली सरकार की उम्मीद कर रहा है.



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