जंगलों में उगने वाला सीताफल बना आदिवासी महिलाओं की कमाई का जरिया, दुबई-अमेरिका तक पहुंची मेवाड़ के इस फल की मांग

जंगलों में उगने वाला सीताफल बना आदिवासी महिलाओं की कमाई का जरिया, दुबई-अमेरिका तक पहुंची मेवाड़ के इस फल की मांग


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Udaipur News: मेवाड़ का सीताफल अब स्वाद के साथ आत्मनिर्भरता की कहानी भी लिख रहा है. जंगलों से निकलकर बाजार और विदेशों तक पहुंचा यह फल आदिवासी महिलाओं के लिए रोजगार और आर्थिक मजबूती की नई उम्मीद बनता जा रहा है.

मेवाड़ के जंगलों और पहाड़ियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला सीताफल अब सिर्फ स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि रोजगार के लिए भी पहचाना जाने लगा है.कभी जंगलों से तोड़कर स्थानीय बाजारों में बिकने वाला यह फल अब देश ही नहीं, विदेशों तक अपनी पहचान बना रहा है. दुबई, अमेरिका और सऊदी अरब जैसे देशों में भी मेवाड़ के सीताफल की मांग बढ़ रही है. सबसे खास बात यह है कि इस फल ने आदिवासी क्षेत्र की महिलाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खोल दिए हैं.

सीताफल मेवाड़ के पारंपरिक फलों में शामिल रहा है. यहां के जंगलों, पहाड़ियों और खेतों के आसपास बड़ी संख्या में सीताफल के पेड़ मिलते हैं. पहले ग्रामीण और आदिवासी परिवार जंगलों से सीताफल तोड़कर स्थानीय बाजारों में बेचते थे.

लेकिन अब समय के साथ इसकी पहचान और उपयोग दोनों बदल रहे हैं.सीताफल की बढ़ती मांग को देखते हुए इससे कई तरह के नए प्रोडक्ट तैयार किए जा रहे हैं.इससे फल की कीमत और उपयोगिता दोनों बढ़ रही हैं.

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इन दिनों सीताफल से तैयार होने वाली आइसक्रीम, रबड़ी और क्रीम लोगों को खूब पसंद आ रही हैं. वहीं बेकरी से जुड़े कारोबारी भी इसके स्वाद को नए अंदाज में लोगों तक पहुंचा रहे हैं.सीताफल के फ्लेवर से केक, बिस्किट और दूसरी खाने-पीने की चीजें तैयार की जा रही हैं. यानी अब यह फल सिर्फ सीधे खाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे कई तरह के वैल्यू एडेड प्रोडक्ट तैयार हो रहे हैं.

इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा फायदा आदिवासी क्षेत्र की महिलाओं को मिल रहा है. पहले महिलाएं जंगलों और पहाड़ियों से सीताफल तोड़कर उसे बाजार तक पहुंचाती थीं, लेकिन अब कई जगह प्रोसेसिंग यूनिट के जरिए उन्हें रोजगार से जोड़ा जा रहा है.

इन यूनिट में सीताफल को इकट्ठा करने से लेकर उसकी प्रोसेसिंग और उससे अलग-अलग उत्पाद तैयार करने तक का काम किया जा रहा है. इससे महिलाओं को अपने ही क्षेत्र में काम मिल रहा है और वे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में योगदान दे रही हैं.

अब सीताफल केवल जंगलों तक सीमित नहीं रह गया है. इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए इसे खेती के रूप में भी विकसित किया जा रहा है.उदयपुर के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से उगने वाले इस फल को अब व्यवस्थित तरीके से बाजार से जोड़ने की कोशिश हो रही है. वहीं चित्तौड़गढ़ में भी सीताफल से जुड़ी एक नई यूनिट की शुरुआत की गई है.इसके जरिए स्थानीय महिलाओं को रोजगार देने और सीताफल से नए उत्पाद तैयार करने पर काम किया जा रहा ह.

पहले जिस सीताफल को लोग मौसम के दौरान जंगलों से तोड़कर बेचते थे, वही अब स्थानीय उत्पाद से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच रहा है. इससे मेवाड़ की प्राकृतिक पहचान को नई पहचान मिल रही है.साथ ही आदिवासी महिलाओं को भी यह भरोसा मिल रहा है कि उनके आसपास मिलने वाला एक साधारण फल उनकी आमदनी का बड़ा जरिया बन सकता है.

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