Jhaad Phoonk Movie Review: रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफ और अनसुलझा रहस्य

Jhaad Phoonk Movie Review: रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफ और अनसुलझा रहस्य


नई दिल्ली. जब भी बॉलीवुड में हॉरर और अंधविश्वास को स्क्रीन पर दिखाया जाता है, तो ऑडियंस की क्यूरिऑसिटी अपने आप बढ़ जाती है. डायरेक्टर राजन रामगोपाल वर्मा की नई ओटीटी रिलीज ‘झाड़ फूंक’ उत्तराखंड की खूबसूरत और रहस्यमयी घाटियों के बीच सेट एक डरावनी कहानी है, जो रोंगटे खड़े कर देती है. यशपाल शर्मा, पद्मिनी कोल्हापुरी और सुंबुल तौकीर खान जैसे दमदार कलाकारों वाली यह फिल्म एक प्रेग्नेंट औरत के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अनजान लोगों के बीच फंसकर एक डरावने अतीत और भूतिया सायों के जाल में उलझ जाती है. यह फिल्म इस त्योहारों के मौसम के लिए एक परफेक्ट हॉरर ट्रीट है.

कहानी
‘झाड़ फूंक’ की कहानी उत्तराखंड की बर्फीली और रहस्यमयी पहाड़ियों से शुरू होती है, जहां आस्था (सुंबुल तौकीर खान) और उसका बॉयफ्रेंड राजवीर (हर्ष राजपूत) एक तेज रफ्तार कार में सफर कर रहे हैं. आस्था प्रेग्नेंट है और राजवीर से नाराज है कि उसने अभी तक अपने परिवार से अपनी शादी या रिश्ते के बारे में बात नहीं की है. इस अफरा-तफरी के बीच, अचानक एक रहस्यमयी औरत उनकी कार के सामने आ जाती है. उसे बचाने की कोशिश में कार का कंट्रोल खो जाता है और वह एक पेड़ से टकरा जाती है, जिससे दोनों बुरी तरह घायल हो जाते हैं. जब आस्था की नींद खुलती है, तो वह खुद को एक अनजान घर में पाती है. घर के मालिक, मोहन ठाकुर (यशपाल शर्मा), और उनकी पत्नी कामिनी ठाकुर (पद्मिनी कोल्हापुरी) उसके सामने खड़े होकर मुस्कुरा रहे होते हैं. जब आस्था राजवीर के बारे में पूछती है, तो उसे बताया जाता है कि एक्सीडेंट के समय वह कार में अकेली थी. आस्था को लगता है कि राजवीर शादी के दबाव के डर से भाग गया होगा. वह दिल्ली लौटने की जिद करती है, लेकिन मोहन और कामिनी उसे अपनी सुरक्षा का हवाला देकर रोक लेते हैं.

धीरे-धीरे आस्था को घर में अजीब और डरावनी आवाजें सुनाई देने लगती हैं. एक दिन, जब वह उस कपल को अपना डर ​​बताती है, तो वे उसे एक डरावनी सच्चाई बताते हैं. उन्हें पता चलता है कि एक्सीडेंट करने वाली औरत कोई आम इंसान नहीं बल्कि मंजरी का भूत है. सालों पहले गांव वालों ने मंजरी और उसके पेट में पल रहे बच्चे को बेरहमी से मार डाला था. तब से मंजरी ने बदला लेने की कसम खाई है कि वह गांव में कोई बच्चा पैदा नहीं होने देगी. अब आस्था एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई है जिससे निकलना नामुमकिन लगता है. क्या आस्था अपने अजन्मे बच्चे को बचा पाएगी? राजवीर के साथ असल में क्या हुआ था? इन सभी सवालों के जवाब फिल्म के क्लाइमैक्स में मिलते हैं.

एक्टिंग
फिल्म की पूरी कास्ट ने अपनी परफॉर्मेंस से कहानी में जान डाल दी है. आस्था का लीड रोल निभा रही सुम्बुल तौकीर खान ने एक चैलेंजिंग रोल को शानदार ढंग से निभाया है. सुम्बुल ने एक एक्सीडेंट के बाद अजनबियों के बीच फंसी एक प्रेग्नेंट औरत के मुश्किल इमोशंस को अच्छे से दिखाया है. उसका डर, इनसिक्योरिटी, मेंटल स्ट्रेस, और अपने बच्चे को बचाने की सख्त जरूरत… इन सभी मुश्किल इमोशंस को अपनी आंखों और एक्सप्रेशन से असली रूप से दिखाया है. यशपाल शर्मा और पद्मिनी कोल्हापुरी जैसे अनुभवी और मंझे हुए एक्टर्स ने अपनी परफॉर्मेंस से फिल्म की परफॉर्मेंस को और बेहतर बनाया है. मोहन ठाकुर के रूप में यशपाल शर्मा के किरदार में कई ग्रे शेड्स दिखते हैं और उन्होंने इसे अपने जाने-पहचाने, दमदार स्टाइल से दिखाया है. पद्मिनी कोल्हापुरी का शांत और रहस्यमयी स्वभाव कहानी के सस्पेंस को बनाए रखता है. हर्ष राजपूत और अप्रतिम सिंह भी अपने सीमित रोल के साथ पूरा न्याय करते हैं.

डायरेक्शन
डायरेक्टर राजन रामगोपाल वर्मा हॉरर और थ्रिलर जॉनर की नब्ज को अच्छी तरह समझते हैं. किसी भी हॉरर फिल्म के लिए सबसे बड़ी चुनौती डर और सस्पेंस के बीच बैलेंस बनाए रखना होता है. अगर मिस्ट्री बहुत जल्दी खुल जाए, तो थ्रिल खत्म हो जाता है और अगर घटनाओं को बिना किसी लॉजिक के दिखाया जाए, तो फिल्म अजीब लगने लगती है. राजन रामगोपाल वर्मा ने इस मामले में एकदम सही बैलेंस बनाया है. उन्होंने पहाड़ी बैकग्राउंड, लोकल मान्यताओं और अंधविश्वासों जैसे एलिमेंट्स को इस तरह से पिरोया है कि दर्शक हर सीन के साथ अपनी सीट से चिपके रहते हैं. उनका डायरेक्शन यह पक्का करता है कि कहानी की रफ्तार कम न हो और दर्शक आखिर तक जुड़े रहें.

सिनेमैटोग्राफी
हॉरर फिल्मों में डरावना माहौल बनाने में सिनेमैटोग्राफी और विजुअल ट्रीटमेंट का अहम रोल होता है. ‘झाड़ फूंक’ में उत्तराखंड की घाटियों, सुनसान सड़कों और पुराने, हॉन्टेड घर को जिस डरावने तरीके से फिल्माया गया है, वह तारीफ के काबिल है. कैमरा एंगल, लो-की लाइटिंग का इस्तेमाल और परछाइयों का खेल सीन में एक नेचुरल ठंडक पैदा करते हैं. डायरेक्टर और सिनेमैटोग्राफर ने स्क्रीन पर जो डरावना कैनवस बनाया है, वह दर्शकों को सीधे इस हॉन्टेड दुनिया में खींच लेता है.

म्यूजिक
म्यूजिक और साउंड डिजाइन इस फिल्म की रीढ़ साबित होते हैं. हॉरर फिल्मों में बैकग्राउंड स्कोर का बहुत ज्यादा इस्तेमाल कभी-कभी बनावटी लग सकता है, लेकिन इस फिल्म में म्यूजिक का इस्तेमाल बहुत कम किया गया है. जरूरत पड़ने पर एकदम शांत माहौल का इस्तेमाल अचानक आने वाले डरावने सीन के असर को कई गुना बढ़ा देता है. बैकग्राउंड में बजने वाले डरावने म्यूजिकल नोट्स और सस्पेंस वाली धुनें दर्शकों की धड़कनें बढ़ा देती हैं.

कमियां
फिल्म के बीच के हिस्से में कुछ सीन में जो ट्विस्ट डालने की कोशिश की गई है, उसे आप पहले ही भांप लेंगे, जिससे थोड़ा मजा किरकिरा हो सकता है और सस्पेंस कम हो जाता है. कुछ जगहों पर विजुअल इफेक्ट (VFX) बेहतर हो सकते थे, जिससे हॉरर का लेवल और बढ़ जाता. कुछ घटनाओं के पीछे के कारणों को स्क्रिप्ट में और साफ तौर पर बताया जाना चाहिए था.

अंतिम फैसला
शॉर्ट में ‘झाड़ फूंक’ हॉरर, अंधविश्वास और साइकोलॉजिकल सस्पेंस का एक परफेक्ट मिक्स है. कुछ छोटी-मोटी कमियों को छोड़कर, फिल्म दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखने और डरावने सीन को अच्छे से दिखाने में कामयाब होती है. सुम्बुल तौकीर खान की दमदार परफॉर्मेंस और राजन रामगोपाल वर्मा का टाइट डायरेक्शन इसे इस त्योहारों के मौसम में जरूर देखने वाली ओटीटी फिल्म बनाता है. अगर आपको डर, सस्पेंस और थ्रिल से भरी कहानियां पसंद हैं, तो Jio Hotstar पर यह फिल्म आपके लिए एक बढ़िया च्वाइस है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार.



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