हरिद्वार: हर की पौड़ी पर गंगा स्नान करना करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है. देश-विदेश से लोग यहां गंगा में डुबकी लगाने, पिंडदान, अस्थि विसर्जन और पितरों के नाम पर पूजा करने पहुंचते हैं. हरिद्वार में होने वाले इन धार्मिक कामों और गंगा घाटों की व्यवस्था संभालने में श्री गंगा सभा की अहम भूमिका है. इस संस्था की शुरुआत साल 1916 में हुई थी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्री गंगा सभा का गठन कैसे हुआ और इसके पीछे क्या वजह थी?
श्री गंगा सभा के पूर्व अध्यक्ष पंडित प्रदीप झा बताते हैं कि इस संस्था की शुरुआत अंग्रेजों के शासन के दौरान हुए एक बड़े आंदोलन के बाद हुई थी. उस समय गंगा घाटों पर कुछ ऐसे काम हो रहे थे, जिनसे हिंदू समाज की धार्मिक भावनाएं आहत होती थीं. वहीं, अंग्रेजों की ओर से भीमगोडा में बांध बनाकर गंगा की धारा मोड़ने की कोशिश भी की जा रही थी. इसके विरोध में स्थानीय तीर्थ पुरोहितों और श्री महंत समाज ने आवाज उठाई. आगे चलकर इसी आंदोलन ने श्री गंगा सभा के गठन का रास्ता तैयार किया.
गंगा घाटों पर हो रहे थे ऐसे काम
पंडित प्रदीप झा के मुताबिक, मुगलों के बाद अंग्रेजों के शासनकाल में हिंदू समाज को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. उस समय गंगा में नावों से मछली पकड़ी जाती थी और गंगा घाटों पर जूते-चप्पल भी ले जाए जाते थे. इन कामों से सनातन धर्म को मानने वाले लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती थीं. इसके अलावा अंग्रेजों ने भीमगोडा में बांध बनाकर गंगा की प्राकृतिक धारा को मोड़ने की कोशिश की. इसका स्थानीय तीर्थ पुरोहित समाज और श्री महंत समाज ने विरोध किया और आंदोलन शुरू कर दिया.
देशभर के राजा-महाराजाओं को बुलाया गया
इस आंदोलन को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए बीकानेर, पटियाला, बंगाल, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत देश की अलग-अलग रियासतों के राजा-महाराजाओं को बुलाया गया. आंदोलन को नेतृत्व देने के लिए बनारस से महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को भी आमंत्रित किया गया. पंडित प्रदीप झा बताते हैं कि मालवीय जी के नेतृत्व के बिना अंग्रेजी सरकार के सामने इस मांग को मजबूती से रखना मुश्किल था.
अंग्रेजी सरकार को माननी पड़ी मांग
पंडित प्रदीप झा के अनुसार, मालवीय जी के मार्गदर्शन और राजा-महाराजाओं के सहयोग से आंदोलन को मजबूती मिली. आखिरकार अंग्रेजी सरकार को भी उनकी मांगों पर ध्यान देना पड़ा. उस समय नगर पालिका के माध्यम से कुछ खास नियम बनाए गए. इनके तहत हर की पौड़ी के चारों ओर चार किलोमीटर के दायरे में मांस और शराब की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी गई.
साल 1916 में हुआ श्री गंगा सभा का गठन
पंडित प्रदीप झा ने बताया कि साल 1916 से पहले मेलों और तीर्थ से जुड़ी व्यवस्थाएं स्थानीय तीर्थ पुरोहित समाज ही संभालता था. लेकिन अंग्रेजों का दखल बढ़ने लगा था. साथ ही, गंगा की धारा को बिना रुकावट हर की पौड़ी तक लाने की जरूरत भी महसूस की जा रही थी. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए साल 1916 में श्री गंगा सभा का गठन किया गया. इस काम में गोस्वामी गणेश दास जी, पंडित आत्माराम जी, पंडित इंद्रराज जी, रामरखा जी, रामनाथ मिश्र जी और सुरजी बाबू पंडा जी समेत कई तीर्थ पुरोहितों ने अपना सहयोग दिया. पंडित प्रदीप झा के मुताबिक, इन सभी लोगों ने इस काम के लिए तन, मन और धन से योगदान दिया.
कुंभ और बड़े धार्मिक मेलों की व्यवस्था संभालती है सभा
श्री गंगा सभा आज भी हरिद्वार में होने वाले बड़े धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था संभालने में अहम भूमिका निभाती है. कुंभ, सोमवती अमावस्या, ग्रहण और सावन के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं से जुड़ी धार्मिक व्यवस्थाओं का संचालन भी इसी संस्था की ओर से किया जाता है. एक सदी से ज्यादा समय बीतने के बाद भी यह संस्था गंगा, श्रद्धालुओं और हिंदू परंपराओं से जुड़े कामों में जुटी हुई है. पंडित प्रदीप झा ने बताया कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी अपनी हरिद्वार यात्रा के दौरान हर की पौड़ी की मर्यादा का ध्यान रखते थे. उन्होंने यहां पाश्चात्य कपड़े छोड़कर धोती पहनी थी. उनके मुताबिक, हरिद्वार का तीर्थ पुरोहित समाज आज भी अपनी पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए धर्म और संस्कृति से जुड़े कामों में लगा हुआ है.