Earth Destruction Video | Rare Double Debris Disk Around Dead Star Hints At Solar System Fate | सूरज खत्म हुआ तो क्या ऐसे ही मिट जाएगी पृथ्वी? वीडियो

Earth Destruction Video | Rare Double Debris Disk Around Dead Star Hints At Solar System Fate | सूरज खत्म हुआ तो क्या ऐसे ही मिट जाएगी पृथ्वी? वीडियो


नई दिल्ली: खगोलविदों को एक मृत तारे के आसपास ऐसा ढांचा मिला है जो पहले देखे गए कई मलबा डिस्क सिस्टम से अलग है. चिली में मौजूद यूरोपियन सदर्न ऑब्जर्वेटरी के वेरी लार्ज टेलिस्कोप से वैज्ञानिकों ने गैस की दो अलग-अलग डिस्क के संकेत दर्ज किए हैं. इनके बीच एक खाली जगह भी है. यह सिस्टम जे1328-1450 नाम के वाइट ड्वार्फ के आसपास मौजूद है. वाइट ड्वार्फ किसी सूरज जैसे तारे का बचा हुआ घना कोर होता है. रिसर्च के मुताबिक दोनों डिस्क को बनाए रखने में दो ग्रह जैसे पिंडों की भूमिका हो सकती है. इनमें एक एस्टेरॉयड जितना छोटा हो सकता है जबकि दूसरा प्लूटो या चंद्रमा के आकार तक पहुंच सकता है.

यह खोज इसलिए अहम है क्योंकि इससे पता चलता है कि तारे के जीवन के अंत के बाद उसके ग्रहों की व्यवस्था किस तरह बदल सकती है. हालांकि वैज्ञानिकों ने अभी इन दोनों पिंडों को सीधे देखकर उनकी मौजूदगी की पुष्टि नहीं की है.

  • ‘नेचर एस्ट्रोनॉमी’ में प्रकाशित अध्ययन में इस सिस्टम के आसपास गैस की दो संकेंद्रित डिस्क का पता लगाया गया है. आमतौर पर वाइट ड्वार्फ के आसपास गैस वाली मलबा डिस्क के संकेत एक घूमते हुए घेरे के रूप में दिखाई देते हैं.
  • इस बार गैस से निकलने वाली रोशनी के स्पेक्ट्रम में चार अलग-अलग पीक मिलीं. वैज्ञानिकों ने इसका विश्लेषण किया तो उन्हें दो अलग-अलग डिस्क की मौजूदगी का संकेत मिला. दोनों डिस्क अलग-अलग गति से घूम रही हैं. उनके बीच एक स्पष्ट गैप भी है.

अध्ययन के मुख्य लेखक निकोला जेंटाइल फुसिल्लो और उनकी टीम के मुताबिक, यह संरचना वाइट ड्वार्फ के आसपास ग्रहों के अवशेषों के व्यवहार को समझने में मदद कर सकती है. यह खोज मौजूदा मॉडल के सामने भी नए सवाल खड़े करती है.

सफेद बौने तारे जे1328−1450 के आसपास खगोलविदों ने गैस और धूल से बनी एक अनोखी डिस्क का अध्ययन किया है. यह तारा कभी सूर्य जैसा था. अपने जीवन के अंतिम चरण में इसने बाहरी परतें खो दीं और इसका कोर सफेद बौने तारे में बदल गया. वैज्ञानिकों को संदेह था कि तारे की मृत्यु के दौरान इसका ग्रह तंत्र टूटकर मलबे में बदल गया. यूरोपियन सदर्न ऑब्जर्वेटरी के वेरी लार्ज टेलीस्कोप में लगे एक्स-शूटर उपकरण से गैस की गति मापी गई. इसमें गैस दो अलग-अलग गतियों से घूमती मिली. इससे डिस्क में बीच में खाली जगह वाली दो संकेंद्रित गैसीय डिस्क होने के संकेत मिले. वैज्ञानिकों के अनुसार, दो प्लैनेटेसिमल इन डिस्क को बनाए रख सकते हैं. इनके धूल कणों से टकराने पर गैस निकलती है. (Image Credit: ESO/L. Calçada)

तारे की मौत के बाद दो रिंग्स कैसे बन सकती हैं?

  1. जब सूरज जैसे तारे अपने जीवन के अंतिम चरण में पहुंचते हैं तो वे फैलने लगते हैं. इस दौरान उनकी बाहरी परतें अंतरिक्ष में निकल जाती हैं. इस प्रक्रिया में आसपास के कुछ ग्रह नष्ट हो सकते हैं या उनकी कक्षाएं बदल सकती हैं.
  2. तबाही से बचे चट्टानी पिंड भी तारे के गुरुत्वाकर्षण के कारण अस्थिर कक्षाओं में पहुंच सकते हैं. इनमें से कुछ टूटकर धूल और गैस का मलबा बना सकते हैं. यह मलबा मृत तारे के चारों ओर घूमती डिस्क का हिस्सा बन जाता है.
  3. जे1328-1450 के मामले में दो अलग-अलग गैसीय डिस्क दिखाई दी हैं. शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इन डिस्क में मौजूद पदार्थ के साथ दो बचे हुए पिंडों की गतिविधियां जुड़ी हो सकती हैं. इन पिंडों की गति और मलबे के साथ उनकी परस्पर क्रिया गैस के उत्सर्जन की वजह बन सकती है.

क्या मृत तारे के पास प्लूटो जितना बड़ा ग्रह भी बचा हुआ है?

वैज्ञानिकों ने दोनों डिस्क की संरचना और गति का अध्ययन करके उनमें मौजूद संभावित पिंडों के आकार का अनुमान लगाया है. अंदरूनी डिस्क से जुड़ा पिंड कुछ किलोमीटर व्यास वाला एस्टेरॉयड हो सकता है.

बाहरी डिस्क से जुड़ा पिंड इससे काफी बड़ा हो सकता है. मॉडल के मुताबिक उसका आकार प्लूटो या चंद्रमा तक हो सकता है. लेकिन इसे सीधे देखा नहीं गया है. इसलिए इसे किसी जीवित ग्रह की पक्की खोज कहना सही नहीं होगा.

शोधकर्ताओं का मानना है कि इन पिंडों का गुरुत्वाकर्षण और मलबे के साथ उनकी गतिविधियां दोनों डिस्क की संरचना को बनाए रखने में भूमिका निभा सकती हैं. यह अनुमान वाइट ड्वार्फ के आसपास ग्रहों के अवशेषों की संभावित स्थिति समझने में अहम है.

मृत तारे के चारों ओर मिलीं मलबे की दो डिस्क. (Video : AI Generated)

मलबे में मिले तत्वों से ग्रहों की बनावट के बारे में क्या पता चला?

  • टेलिस्कोप से मिले स्पेक्ट्रम में कैल्शियम, ऑक्सीजन, मैग्नीशियम और आयरन जैसे तत्वों के संकेत मिले हैं. ये तत्व चट्टानी ग्रहों और अन्य ठोस खगोलीय पिंडों में भी पाए जाते हैं.
  • अध्ययन में दोनों डिस्क की रासायनिक संरचना में अंतर भी सामने आया. अंदरूनी डिस्क में मैग्नीशियम गैस की मात्रा अधिक है. बाहरी डिस्क में यह काफी कम दिखाई देती है.
  • वैज्ञानिकों के मुताबिक यह अंतर संकेत देता है कि दोनों डिस्क को पदार्थ देने वाले पिंडों की बनावट अलग हो सकती है. एक संभावना यह भी है कि मलबा किसी बड़े पिंड के अलग-अलग हिस्सों से आया हो. उदाहरण के लिए किसी ग्रह की बाहरी परत और उसके अंदरूनी हिस्से की रासायनिक संरचना अलग हो सकती है.

सूरज के वाइट ड्वार्फ बनने पर क्या पृथ्वी भी नष्ट हो सकती है?

हमारा सूरज भी बहुत दूर भविष्य में अपना ईंधन खत्म करने के बाद वाइट ड्वार्फ बनेगा. उससे पहले वह लाल दानव तारे के चरण में पहुंचेगा और उसका आकार काफी बढ़ जाएगा. इस दौरान पृथ्वी का भविष्य गंभीर खतरे में पड़ सकता है.

हालांकि यह कहना अभी सही नहीं होगा कि पृथ्वी का अंत ठीक जे1328-1450 जैसे सिस्टम में ही होगा. दोनों तारों और उनकी ग्रह प्रणालियों की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं. इस खोज से हमारे सौरमंडल के अंतिम चरण की एक संभावित तस्वीर जरूर मिलती है.

अध्ययन के सह-लेखक फेलिप लागोस-विल्चेस के मुताबिक यह सिस्टम ऐसे ग्रहों के भविष्य को समझने का मौका देता है जो अपने तारे की मौत के बाद भी उसके आसपास मौजूद रह सकते हैं. वैज्ञानिक अब यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि ऐसे मलबा सिस्टम कैसे बनते हैं और कितने समय तक स्थिर रह सकते हैं.

वैज्ञानिकों ने चिली के अटाकामा रेगिस्तान में स्थित वेरी लार्ज टेलिस्कोप पर लगे एक्स-शूटर उपकरण से इस तारे के स्पेक्ट्रम का अध्ययन किया. यह उपकरण अलग-अलग तरंगदैर्ध्य पर आने वाली रोशनी को मापता है. इससे गैस में मौजूद तत्वों और उनकी गति के बारे में जानकारी मिलती है.

गैस की गति के संकेतों ने वैज्ञानिकों को दो अलग-अलग डिस्क की पहचान करने में मदद की. इस तरह उन्होंने केवल तारे की तस्वीर देखने के बजाय उसकी रोशनी का विश्लेषण करके मलबे की संरचना का पता लगाया.



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