उत्तराखंड में भेड़ पालन से संवर रही आजीविका, लोहे के खास ब्रश से ऊन साफ कर पारंपरिक गर्म कपड़े तैयार कर रहीं महिलाएं

उत्तराखंड में भेड़ पालन से संवर रही आजीविका, लोहे के खास ब्रश से ऊन साफ कर पारंपरिक गर्म कपड़े तैयार कर रहीं महिलाएं


Bageshwar news: उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भेड़ पालन लंबे समय से आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है. यहां भेड़ की ऊन से स्वेटर, टोपी, मफलर, शॉल और अन्य गर्म कपड़े तैयार किए जाते हैं. सर्दियों में इन ऊनी कपड़ों की मांग भी बढ़ जाती है. हालांकि, बाजार में ऊनी कपड़े खरीदना जितना आसान है, उन्हें तैयार करने की प्रक्रिया उतनी ही मेहनत भरी होती है.

खासकर भेड़ की ऊन को साफ करने का काम काफी कठिन होता है. इसके लिए एक विशेष प्रकार के ब्रश का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे चलाने में काफी मेहनत लगती है.

लोहे के विशेष ब्रश से सफाई की बारीकी
स्थानीय व्यापारी पुष्पा बिष्ट बताती हैं कि पहाड़ों में ऊन की सफाई का काम आज भी पारंपरिक तरीके से किया जाता है. इसके लिए लोहे की पतली-पतली डंडियों से बना एक विशेष ब्रश इस्तेमाल में लाया जाता है. इस ब्रश को दोनों हाथों की मदद से चलाया जाता है. इसकी सहायता से ऊन में मौजूद धूल, मिट्टी, छोटे कचरे और उलझे हुए रेशों को अलग किया जाता है. ऊन को साफ करने के दौरान काफी सावधानी बरतनी पड़ती है, ताकि उसके रेशे खराब न हों और आगे धागा तैयार करने में आसानी रहे.

कड़े परिश्रम और धैर्य के साथ महिलाओं की भागीदारी
भेड़ की ऊन को साफ करने की जिम्मेदारी पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाएं संभालती हैं. यह काम देखने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन इसे करने में काफी समय और शारीरिक मेहनत लगती है. दोनों हाथों से विशेष ब्रश को लगातार चलाना पड़ता है. ऊन की मात्रा अधिक होने पर इसे साफ करने में कई घंटे और कभी-कभी कई दिन तक लग जाते हैं. इसके बावजूद महिलाएं पूरे धैर्य और लगन के साथ इस काम को पूरा करती हैं.

चरखे पर कताई और बुनाई का सफर
ऊन की सफाई पूरी होने के बाद अगला चरण धागा तैयार करने का होता है. साफ ऊन को पारंपरिक तरीके से कातकर धागा बनाया जाता है. इसके लिए तकली या चरखे जैसे उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है. धागा तैयार होने के बाद उससे बुनाई का काम शुरू होता है. इसके बाद स्वेटर, टोपी, मफलर, शॉल और अन्य गर्म कपड़े तैयार किए जाते हैं.

मशीनी दौर में भी कायम है पारंपरिक पहचान
बागेश्वर समेत उत्तराखंड के कई पहाड़ी इलाकों में ऊन से कपड़े तैयार करने की परंपरा पुरानी है. यह काम केवल कपड़े बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, पारंपरिक हुनर और महिलाओं की मेहनत से भी जुड़ा है. आधुनिक समय में बाजार में मशीनों से तैयार ऊनी कपड़े आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन हाथों से ऊन साफ करने, धागा कातने और बुनाई करने की कला आज भी अपनी अलग पहचान रखती है.

भेड़ की ऊन से तैयार होने वाले इन कपड़ों के पीछे महिलाओं की मेहनत, धैर्य और पारंपरिक कौशल छिपा होता है. ऐसे में ऊन की सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाला यह खास ब्रश भी पहाड़ की पारंपरिक हस्तकला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.



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