अनंत सिंह के पास अब क्या विकल्प, सुप्रीम कोर्ट से जमानत रद्द, JDU से निष्कासित; चली जाएगी सदस्यता?

अनंत सिंह के पास अब क्या विकल्प, सुप्रीम कोर्ट से जमानत रद्द, JDU से निष्कासित; चली जाएगी सदस्यता?


बिहार के मोकामा से बाहुबली विधायक अनंत सिंह को डबल झटका लगा है. पहले तो उन्हें MLC चुनाव में पार्टी कैंडिडेट नीरज कुमार का विरोध करने की वजह से जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखाया गया. अब उन्हें दुलारचंद यादव हत्याकांड में झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करते हुए सरेंडर करने का आदेश दिया है. अब ऐसे में सवाल है कि क्या किसी विधायक या सांसद को उसकी पार्टी से निकाल दिया जाए, तो क्या उसकी विधानसभा या लोकसभा की सदस्यता भी खत्म हो जाती है? क्या पार्टी अध्यक्ष के पास यह अधिकार है कि वह किसी जनप्रतिनिधि को पार्टी से निष्कासित करने के साथ उसकी विधायकी या सांसदी भी छीन ले? जेल जाने को लेकर क्या नियम है? बिहार की राजनीति में भी इस तरह के सवाल अहम हो जाते हैं, खासकर तब जब किसी विधायक या सांसद के खिलाफ पार्टी अनुशासनात्मक कार्रवाई करती है. अनंत सिंह के पास अब क्या विकल्प है?

सिर्फ पार्टी से निष्कासित कर देने से किसी विधायक या सांसद की सदन की सदस्यता खत्म नहीं होती. पार्टी की सदस्यता और संसद या विधानसभा की सदस्यता दो अलग-अलग चीजें हैं. हालांकि, कुछ परिस्थितियों में पार्टी से जुड़े आचरण के कारण दल-बदल कानून के तहत जनप्रतिनिधि की सदस्यता जा सकती है. भारतीय संविधान और दल-बदल विरोधी कानून में इसके लिए क्या प्रावधान हैं, बिहार विधानसभा के संदर्भ में नियम कैसे लागू होते हैं और आखिर किन परिस्थितियों में किसी विधायक या सांसद की कुर्सी जा सकती है.

जेल जाने पर चली जाएगी सदन की सदस्यता?
किसी विधायक को जेल भेजे जाने का मतलब यह नहीं है कि उसकी विधानसभा की सदस्यता अपने आप खत्म हो जाएगी. कानून में जेल जाने और दोषी ठहराए जाने के बीच बड़ा अंतर है. किसी विधायक की सदस्यता खत्म होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस मामले में जेल भेजा गया है, क्या वह सिर्फ अंडरट्रायल यानी विचाराधीन कैदी है या अदालत ने उसे दोषी ठहराया है और कितनी सजा सुनाई है? इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 को समझना जरूरी है.

पार्टी से निकालने पर सदस्यता खत्म हो जाती है?
नहीं. भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि किसी राजनीतिक दल की तरफ से अपने विधायक या सांसद को निष्कासित करते ही उसकी सदन की सदस्यता अपने आप समाप्त हो जाएगी. इसकी वजह यह है कि संविधान दो अलग-अलग सिस्टम को मान्यता देता है. पहला है पार्टी की सदस्यता. यह राजनीतिक दल के अपने संविधान और अनुशासनात्मक नियमों के तहत तय होती है. दूसरा है सदन की सदस्यता. यह भारतीय संविधान, जनप्रतिनिधित्व कानून और सदन से जुड़े नियमों के तहत तय होती है.

इसलिए किसी पार्टी का अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष या राष्ट्रीय नेतृत्व अपने स्तर पर किसी विधायक की विधायकी या सांसद की सांसदी खत्म नहीं कर सकता. हालांकि, पार्टी से निष्कासन के बाद विधायक या सांसद का अगला कदम महत्वपूर्ण हो जाता है. अगर वह दूसरी पार्टी में शामिल होता है या ऐसा आचरण करता है जिससे यह साबित हो कि उसने स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है, तो उसके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है.

क्या कहता है दल-बदल विरोधी कानून?
अगर कोई विधायक या सांसद अपनी मर्जी से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह चुनाव जीतकर सदन में पहुंचा था, तो उसकी सदस्यता जा सकती है. यहां एक अहम बात है. इसके लिए पार्टी से औपचारिक इस्तीफा देना जरूरी नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में स्पष्ट किया है कि किसी जनप्रतिनिधि के आचरण से भी यह साबित हो सकता है कि उसने अपनी पार्टी छोड़ दी है. यह दल-बदल विरोधी कानून यानी Anti-Defection Law के तहत आता है.

JDU ने की सदस्यता खत्म करने की मांग!
इसके बाद जेडीयू ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार से अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की. 26 अक्टूबर को जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने विधानसभा अध्यक्ष को इस संबंध में पत्र सौंपा. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इसके साथ करीब 10 पन्नों के दस्तावेज और वीडियो फुटेज भी दिए गए थे.

जब पार्टी की तरफ से ही सदस्यता समाप्त करने की अपील की जाती है तो अंतिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष पर निर्भर करता है. यानी कि अनंत सिंह के केस में जेडीयू की तरफ से ऐसा किए जाने के बाद अब बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार की तरफ से निर्णय लिया जाएगा.

पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करना
अगर कोई विधायक या सांसद सदन में अपनी पार्टी के निर्देश यानी व्हिप के खिलाफ वोट करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सदस्यता जा सकती है. हालांकि, इसके लिए कुछ शर्तें भी हैं. पहला तो ये कि पार्टी या अधिकृत व्यक्ति ने सदन में मतदान को लेकर निर्देश जारी किया हो. दूसरा यह कि सदस्य ने पहले से अनुमति नहीं ली हो. पार्टी ने मतदान के 15 दिनों के भीतर उसके इस आचरण को माफ नहीं किया हो. ऐसी स्थिति में दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है.

किसी दूसरी पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करना अपने आप में हर स्थिति में विधानसभा की सदस्यता खत्म करने का आधार नहीं है. खासकर यह ध्यान रखना होगा कि जिस चुनाव में उन्होंने कथित तौर पर विरोधी उम्मीदवार का समर्थन किया, वह बिहार विधान परिषद का चुनाव था, न कि विधानसभा के अंदर होने वाला मतदान.

सिर्फ निष्कासन के आधार पर उसकी विधानसभा सदस्यता खत्म नहीं होगी. लेकिन दूसरी स्थिति में मामला बदल सकता है. उसके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला भी है.

अनंत सिंह का मामला क्यों है चर्चा में?
बिहार की राजनीति में इस कानूनी बहस का ताजा उदाहरण मोकामा के विधायक अनंत कुमार सिंह का मामला है. 24 अक्टूबर 2026 को जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया. पार्टी की कार्रवाई के पीछे आरोप था कि अनंत सिंह ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विधान परिषद MLC चुनाव में जेडीयू के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ प्रचार किया और जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया.

दुलारचंद हत्याकांड का मामला क्या है?
पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव के समय मोकामा विधानसभा सीट और बाहुबली नेता अनंत सिंह चर्चा में आ गए है. 30 अक्टूबर 2025 को दुलारचंद यादव हत्याकांड हुआ है. बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान हुई इस घटना में जनसुराज पार्टी के समर्थक दुलारचंद यादव की मौत हो गई थी. जेडीयू उम्मीदवार अनंत सिंह और जनसुराज उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के समर्थकों के काफिले आमने-सामने आ गए. इसके बाद दोनों पक्षों के समर्थकों के बीच विवाद और हिंसक झड़प हुई. इस दौरान दुलारचंद यादव गंभीर रूप से घायल हो गए और उनकी मौत हो गई.

इस मामले में मोकामा के विधायक अनंत सिंह को भी आरोपी बनाया गया था. अनंत सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. हालांकि, जेल में रहते हुए उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. मार्च 2026 में पटना हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद वह जेल से बाहर आ गए. दुलारचंद यादव हत्याकांड में अनंत सिंह को आज सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने पटना हाईकोर्ट से मिली उनकी जमानत रद्द कर दी है.



Source link