हुनर हो तो ऐसा… रोहतास की महिलाएं जंगल की घास और खजूर के पत्तों से बना रही कमाल का झाड़ू, बस बाजार की है तलाश

हुनर हो तो ऐसा… रोहतास की महिलाएं जंगल की घास और खजूर के पत्तों से बना रही कमाल का झाड़ू, बस बाजार की है तलाश


रोहतास: बिहार के रोहतास जिले के सिकरियां गांव में प्रकृति की खूबसूरती के बीच महिलाओं के हाथों में एक ऐसा हुनर छिपा है, जिसे देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे. यहां की महिलाएं जंगलों में मिलने वाली खास घास, खजूर के पत्तों और झाड़ियों की मदद से पारंपरिक झाड़ू तैयार करती हैं. पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों से बनने वाली इन झाड़ुओं को तैयार करने में न तो किसी मशीन की जरूरत पड़ती है और न ही किसी खास पूंजी की. इसके बावजूद इन महिलाओं की कला आज तक बड़े बाजार तक नहीं पहुंच पाई है. यही वजह है कि इनके हुनर से शहरों के लोग अब भी काफी हद तक अनजान हैं.

महिलाएं हाथों से तैयार करती हैं झाड़ू

सिकरियां गांव की रहने वाली मीरा देवी बताती हैं कि वह अकेली नहीं हैं, बल्कि गांव की कई महिलाएं इस पारंपरिक कला से जुड़ी हैं. वे खजूर के पत्तों, झुर, कुश और जंगलों में मिलने वाले दूसरे पेड़-पौधों से अलग-अलग तरह की झाड़ू तैयार करती हैं. इन महिलाओं को इस काम का अनुभव पीढ़ियों से मिला है. जहां जंगल से मिलने वाली सामग्री को इकट्ठा करने से लेकर उसे साफ करने और झाड़ू का आकार देने तक का काम वे खुद अपने हाथों से करती हैं.

एक दिन में तैयार कर लेती हैं 10 झाड़ू

मीरा देवी के मुताबिक इस काम में मेहनत जरूर लगती है, लेकिन कच्चा माल आसपास के जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से मिल जाता है. यही कारण है कि उन्हें झाड़ू बनाने के लिए अलग से पैसे खर्च नहीं करने पड़ता है. वह एक दिन में करीब 10 झाड़ू तैयार कर सकती हैं. हालांकि, बाजार और बिक्री की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण उनकी मेहनत को उस रूप में पहचान नहीं मिल पाती, जिसकी वह हकदार हैं.

छठ जैसे पर्व पर बढ़ जाती है मांग

इन पारंपरिक झाड़ुओं का इस्तेमाल महिलाएं अपने घरों में करती हैं. गांव में सामाजिक आयोजनों और साफ-सफाई के काम में भी इनका उपयोग होता है. छठ जैसे पर्व के दौरान झुर से बनी झाड़ुओं की मांग बढ़ जाती है. आसपास के कई गांवों से लोग इन्हें दुसरे शहरों से मंगवाते हैं. इस कारण स्थानीय स्तर पर इनकी नहीं होती है. अगर इन उत्पादों को व्यवस्थित बाजार मिल जाए तो ये इनकी बिक्री कर कुछ आमदनी प्राप्त कर सकते हैं.

सरकारी सहयोग मिले तो बन सकता है रोजगार का जरिया

मीरा देवी का कहना है कि अब तक उनके इस पारंपरिक हुनर को बढ़ावा देने के लिए कोई सहयोग नहीं मिला है. उनका मानना है कि यदि सरकार इन महिलाओं को प्रशिक्षण, बेहतर पैकेजिंग, बाजार से जोड़ने और उत्पादों की बिक्री में मदद करे तो यह कला रोजगार का अच्छा जरिया बन सकती है.

सिकरियां गांव की इन महिलाओं के पास हुनर है, मेहनत है और प्रकृति से मिला कच्चा माल भी। कमी है तो सिर्फ ऐसे अवसरों की. जो उनकी कला को गांव की सीमाओं से बाहर पहचान दिला सकें. उचित सहयोग मिले तो जंगलों से मिलने वाले साधारण पत्तों और घास से तैयार होने वाली ये झाड़ुएं महिलाओं की आमदनी बढ़ाने के साथ ग्रामीण स्वरोजगार की एक नई राह भी खोल सकती हैं.



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