ऑस्ट्रेलिया के खूबसूरत बीचों के किनारे हजारों-लाखों लोग सनस्क्रीन लगाकर समंदर किनारे नजर आते हैं. लेकिन अब यही सनस्क्रीन तय पैमानों पर खरे नहीं उतर रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में कुछ सनस्क्रीन अपने लेबल पर SPF 50+ लिखकर बेच रही हैं. पर जब इनकी जांच की गई तो असल में इसमें SPF रेटिंग महज 4 निकली. यही वजह है कि ऑस्ट्रेलिया में सनस्क्रीन बनाने वाली कंपनियों पर नियम सख्त करने की तैयारी हो रही है. दरअसल हाल ही में एक टेस्ट में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. जांच में 20 लोकप्रिय सनस्क्रीन प्रोडक्ट्स में से 16 अपने लेबल पर किए गए सन प्रोटेक्शन फैक्टर (SPF) के दावे पर खरे नहीं उतरे. टेस्ट में सनस्क्रीन के फेल होने से लोगों के बीच खासा गुस्सा है. इसी को देखते हुए कई कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स बाजार से वापस ले रही हैं.
Firstpost की रिपोर्ट बताती है कि ऑस्ट्रेलिया की थेराप्यूटिक गुड्स एडमिनिस्ट्रेशन (TGA) ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को नए नियमों का प्रस्ताव रखा. इन नियमों से सनस्क्रीन पर होने वाले दावों से मिलने वाली सुरक्षा के दावों को ज्यादा भरोसेमंद बनाना है. इसके लिए टेस्टिंग की शर्तें सख्त करने, लैब की निगरानी बेहतर बनाने और सनस्क्रीन तथा कुछ हद तक धूप से बचाव करने वाले कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स के बीच अंतर को साफ करना है. यह कदम ऑस्ट्रेलिया के ग्राहकों अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन चॉइस (Choice) की 2025 में की गई जांच के बाद उठाया गया है. इस जांच में सवाल उठाए गए थे कि क्या सनस्क्रीन कंपनियों के प्रोडक्ट्स वास्तव में उतनी सुरक्षा देते हैं, जितना वे अपने लेबल पर दावा करते हैं.
बीबीसी के मुताबिक, इस जांच के नतीजों से ऑस्ट्रेलिया में बड़े पैमाने पर चिंता फैल गई. इसकी बड़ी वजह यह है कि ऑस्ट्रेलिया में दुनिया में स्किन कैंसर की दर सबसे ज्यादा है.
सनस्क्रीन के टेस्ट में क्या सामने आया?
चॉइस की जांच में पता चला कि जिन 20 सनस्क्रीन प्रोडक्ट्स का टेस्ट किया गया, उनमें से 16 अपने विज्ञापनों और लेबल पर बताए गए SPF स्तर पर खरे नहीं उतरे. इनमें कुछ महंगे और प्रीमियम ब्रांड्स के प्रोडक्ट्स भी शामिल थे. कई सनस्क्रीन पर SPF 50+ होने का दावा किया गया था. यह रेटिंग अल्ट्रावायलेट रेडिएशन यानी UV किरणों से बहुत ज्यादा सुरक्षा मिलने का संकेत देती है. इस जांच में सबसे चौंकाने वाले मामलों में से एक अल्ट्रा वायलेट (Ultra Violette) के लीन स्क्रीन सनस्क्रीन का था. कंपनी ने इसे SPF 50+ के तौर पर बेचा था, लेकिन जांच में इसकी SPF रेटिंग सिर्फ 4 मिली.
बॉन्डी सैंड्स के प्रोडक्ट्स भी जांच के घेरे में आए. द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक, चॉइस के टेस्ट में कंपनी के SPF 50+ जिंक मिनरल बॉडी लोशन की SPF रेटिंग 26 मिली, जबकि SPF 50+ फ्रेगरेंस फ्री सनस्क्रीन की रेटिंग 32 रही. इस विवाद का असर सिर्फ कुछ प्रोडक्ट्स तक सीमित नहीं रहा. अल्ट्रा वायलेट के एक प्रोडक्ट को वापस मंगाए जाने के बाद उसी बेस फॉर्मूले से बने 19 अन्य प्रोडक्ट्स को भी बाजार से हटा लिया गया. इस पूरे मामले ने सवाल खड़े कर दिए कि सनस्क्रीन से मिलने वाली सुरक्षा की जांच किस तरह की जाती है और कंपनियों को अपने प्रोडक्ट्स के दावों को सही साबित करने के लिए कितनी जिम्मेदारी उठानी चाहिए.
ऑस्ट्रेलिया में सनस्क्रीन के लिए क्या नए नियम लाने की तैयारी है?
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत कंपनियों को उसी तैयार सनस्क्रीन प्रोडक्ट का टेस्ट कराना होगा, जिसे वे बाजार में बेचना चाहती हैं. अभी सिर्फ बेस फॉर्मूले के टेस्ट के नतीजों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा. इसके अलावा, कंपनियों को अपने प्रोडक्ट्स की बिक्री शुरू करने से पहले SPF टेस्टिंग के आंकड़े TGA को देने होंगे. प्रोडक्ट की शेल्फ लाइफ यानी इस्तेमाल करने की तय अवधि के दौरान भी समय-समय पर दोबारा टेस्ट कराना होगा.
फिलहाल कंपनियों के लिए नियमित रूप से SPF टेस्ट के नतीजे जमा करना जरूरी नहीं है. बीबीसी के मुताबिक, रेगुलेटर की ओर से मांगे जाने पर ही उन्हें ये आंकड़े देने होते हैं. प्रस्तावित बदलावों के बाद कंपनियों को बाजार में प्रोडक्ट उतारने से पहले यह साबित करना होगा कि लेबल पर लिखे गए सुरक्षा के दावों के पीछे ठोस सबूत मौजूद हैं.
क्या सनस्क्रीन की टेस्टिंग के तरीके भी बदलेंगे?
प्रस्तावित बदलाव सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं हैं कि किसी प्रोडक्ट का टेस्ट कितनी बार किया जाए. TGA इस बात पर भी विचार कर रहा है कि लैब में SPF मापने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. एबीसी न्यूज के मुताबिक, फिलहाल सनस्क्रीन की टेस्टिंग के लिए मुख्य रूप से इन विवो तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें स्वयंसेवकों की त्वचा पर सनस्क्रीन लगाई जाती है और नियंत्रित परिस्थितियों में अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में आने के बाद सनस्क्रीन कितना असरदार है, इसकी जांच की जाती है. रेगुलेटर ने इन विट्रो (in vitro) टेस्टिंग की भी अनुमति देने का प्रस्ताव रखा है. इस तरीके में इंसान की त्वचा के बजाय एक प्लास्टिक प्लेट पर सनस्क्रीन लगाकर उसकी जांच की जाती है.
TGA ने कहा कि मौजूदा टेस्टिंग तरीकों से SPF के नतीजों में अंतर देखने को मिलता है. इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक तरीके पर विचार किया जा रहा है. हालांकि, रेगुलेटर इन विट्रो टेस्टिंग के जरिए इंसानों पर होने वाले टेस्ट को पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहता. इसकी वजह यह है कि लैब में होने वाली जांच हर तरह के सनस्क्रीन फॉर्मूले के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती. इसी तरह, पानी में रहने या तैरने के दौरान सनस्क्रीन कितनी देर तक असरदार रहती है, यानी उसकी वॉटर रेजिस्टेंस जांचने के लिए भी यह तरीका हर मामले में पर्याप्त नहीं हो सकता. TGA उन लैब के लिए अंतरराष्ट्रीय मान्यता से जुड़ी शर्तें सख्त करने का भी प्रस्ताव दे रहा है, जो सनस्क्रीन की टेस्टिंग करती हैं. एबीसी न्यूज के मुताबिक, फिलहाल TGA इन लैब को रेगुलेट या मान्यता देने का काम नहीं करता है.
कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स भी जांच के दायरे में क्यों हैं?
इन ताजा सुधारों का एक और हिस्सा ऐसे ब्यूटी प्रोडक्ट्स से जुड़ा है, जो धूप से बचाव का दावा करते हैं, लेकिन जिनका मुख्य उद्देश्य त्वचा को अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाना नहीं है. ऑस्ट्रेलिया में बेचे जाने वाले कुछ फाउंडेशन और दूसरे कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स पर SPF 50+ तक की रेटिंग लिखी जा सकती है. हालांकि, इन प्रोडक्ट्स का मुख्य उद्देश्य सनस्क्रीन की तरह त्वचा को धूप से बचाना नहीं होता.
TGA इन प्रोडक्ट्स के SPF संबंधी दावों पर सीमाएं लगाने की योजना पर विचार कर रहा है. इससे ग्राहकों को खास तौर पर धूप से बचाव के लिए बनाए गए सनस्क्रीन और ऐसे कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स के बीच अंतर समझने में मदद मिलेगी, जो एक्स्ट्रा फायदे के तौर पर UV किरणों से सुरक्षा देते हैं. पर अब रेगुलेटर सनस्क्रीन के लेबल पर लिखी जानकारी में बदलाव करने पर भी विचार कर रहा है. चर्चा के दौरान एक विकल्प यह सामने आया कि मौजूदा नंबर आधारित सिस्टम की जगह सुरक्षा के स्तर बताने वाली श्रेणियां इस्तेमाल की जाएं. इनमें ‘लो’ यानी कम, ‘मीडियम’ यानी मध्यम, ‘हाई’ यानी ज्यादा और ‘वेरी हाई’ यानी बहुत ज्यादा सुरक्षा जैसी श्रेणियां शामिल हो सकती हैं.
TGA को मार्च से मई 2026 के बीच हुई चर्चा प्रक्रिया के दौरान कुल 119 सुझाव और प्रतिक्रियाएं मिली थीं. रेगुलेटर ने कहा है कि इनमें से कुछ सुधार अपेक्षाकृत जल्द लागू किए जा सकते हैं, जबकि दूसरे बदलावों के लिए कानून में संशोधन करना पड़ सकता है.