‘जब सरकार को घर तुड़वाना था, तो पानी-बिजली क्यों दिया?’, पति की मौत, अब परिवार का पालन कैसे करेगी सुनीता

‘जब सरकार को घर तुड़वाना था, तो पानी-बिजली क्यों दिया?’, पति की मौत, अब परिवार का पालन कैसे करेगी सुनीता


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Dehradun News: उत्तराखंड के एक परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. एक तरफ छत से गिरकर पति की असामयिक मृत्यु और दूसरी तरफ मोहकम्मपुर-आशारोड़ी एलिवेटेड रोड परियोजना से आशियाने का संकट ने इस परिवार को अंदर से तोड़ दिया है. कैमरे के सामने सुनीता ने अपना दर्द बयां किया है.

देहरादून: मोहकम्मपुर-आशारोड़ी एलिवेटेड रोड परियोजना विकास की नई राहें भले खोल रही हो, लेकिन इसने सुनीता जैसे कई गरीब और मजबूर परिवारों के आशियाने पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं. छत से गिरकर पति की असामयिक मृत्यु के बाद से सुनीता पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.

मोहकम्मपुर-आशारोड़ी एलिवेटेड रोड परियोजना के विकास की दौड़ में सुनीता जैसे गरीब परिवारों के आशियाने पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. सुनीता के पति दिहाड़ी मजदूरी करते थे और उन्होंने बड़ी मुश्किल से जमीन खरीदकर यह घर बनाया था. उन्होंने कहा कि 5-6 साल पहले ही वे इस घर में शिफ्ट हुए थे, लेकिन पति की असामयिक मृत्यु के बाद सुनीता पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. पति के जाने के बाद अब परिवार की पूरी जिम्मेदारी अकेले सुनीता के कंधों पर आ गई है.

कर्ज के साए में बना घर और छिनती छत
सुनीता ने बताया कि उन्होंने यह घर लोन और कर्ज लेकर बनाया था, जिसे वे अब तक पूरी तरह चुका नहीं पाई हैं. उन्होंने रोते हुए सवाल किया कि जब सरकार को उनका घर तुड़वाना ही था, तो वहां बिजली और पानी के कनेक्शन क्यों दिए गए थे. अब यह आशियाना विकास परियोजना की जद में आ चुका है और उनके सिर से एकमात्र छत भी छिनने की कगार पर पहुंच गई है. अनिश्चित भविष्य और बेबसी के इस खौफ ने सुनीता को फूट-फूटकर रोने पर मजबूर कर दिया है.

अपाहिज सास और बच्चों की दोहरी जिम्मेदारी
सुनीता के परिवार में उनकी बुजुर्ग और अपाहिज सास हैं, जो चल-फिर नहीं सकती हैं और उनके दो छोटे बच्चे हैं, जिनकी स्कूली पढ़ाई चल रही है. पति का साया उठने के बाद अब घर की देखभाल और इन सबकी जिम्मेदारी अकेले सुनीता को ही उठानी पड़ रही है. घर पर बिस्तर पर पड़ी सास की दवाइयों का खर्च उठाना और बच्चों की पढ़ाई का प्रबंध करना उनके लिए बेहद कठिन हो गया है. परिवार की देखभाल करने वाला अब घर में कोई और नहीं बचा है.

तंगहाली और आजीविका का कड़ा संघर्ष
सुनीता एक मॉल में सफाई का काम करती हैं और महीने के केवल आठ से दस हजार रुपये ही कमा पाती हैं. इतनी कम आय में बुजुर्ग सास की दवाइयों का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और घर का चूल्हा जलाना उनके लिए बहुत मुश्किल साबित हो रहा है. आर्थिक तंगहाली के इस दौर में पाई-पाई जोड़ने वाली सुनीता के लिए अपने परिवार का पेट पालना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है. कर्ज के बोझ तले दबी सुनीता की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है.

बेसहारा सिंगल मदर का भविष्य और गुहार
बच्चों के सिर से पिता का साया पहले ही उठ चुका है और अब घर भी छिन जाने से यह सिंगल मदर गहरी चिंता में डूब गई है. सुनीता बार-बार यही सोचकर रोती हैं कि इस विकट परिस्थिति में वे अपने असहाय परिवार को लेकर आखिरकार कहां जाएंगी? प्रशासन और सरकार के सामने उनकी यही गुहार है कि इस संकट की घड़ी में उनके परिवार के पुनर्वास और मदद के लिए कोई उचित कदम उठाया जाए.



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