गंगा वार्षिक बंदी: 1914-1916 में अंग्रेजों से हुआ था समझौता, फिर भी हर की पैड़ी पर पानी नहीं, गंगा सभा के पुरोहित ने उठाए सवाल

गंगा वार्षिक बंदी: 1914-1916 में अंग्रेजों से हुआ था समझौता, फिर भी हर की पैड़ी पर पानी नहीं, गंगा सभा के पुरोहित ने उठाए सवाल


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Haridwar Ganga Canal Close: दशहरे की रात से गंगनहर की वार्षिक बंदी के बाद हरिद्वार के प्रमुख घाटों पर पानी की कमी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. गंगा सभा के पुरोहित पंडित कौशल सिखोला के मुताबिक, 1914 से 1916 के बीच पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में हुए आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता हुआ था कि गंगनहर बंदी के दौरान भी हर की पौड़ी पर कम से कम दो फीट पानी रहेगा. पुरोहित का आरोप है कि उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग इस समझौते का उल्लंघन करता है. उनका कहना है कि घाटों पर पर्याप्त जल नहीं होने से पिंडदान, तर्पण और मुंडन जैसे धार्मिक अनुष्ठान करने आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी होती है.

हरिद्वार: दशहरे की रात से उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने उत्तरी खंड गंगनहर की वार्षिक बंदी शुरू कर दी है. इसके बाद धर्मनगरी हरिद्वार के प्रमुख गंगा घाटों पर पानी की कमी हो गई है. आरोप है कि हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड समेत कई घाटों पर गंगा की धारा सूख गई है. इससे पिंडदान, तर्पण और मुंडन जैसे धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए देश-विदेश से हरिद्वार पहुंचे श्रद्धालुओं को परेशानी हो रही है. श्रद्धालुओं को बहते हुए गंगाजल की जगह रुका हुआ गंदा पानी दिखाई दे रहा है, जिससे वे निराश हैं.

दरअसल, हर साल गंगनहर की बंदी के दौरान हर की पौड़ी पर गंगा के पानी के प्रवाह को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था. इस समझौते के मुताबिक, गंगनहर बंद होने के दौरान भी हर की पैड़ी की मुख्यधारा में कम से कम 1000 क्यूसेक पानी का निरंतर प्रवाह बना रहना अनिवार्य है. लेकिन आरोप है कि इस बार इस समझौते का पालन नहीं किया जा रहा है. इस पूरे मामले को समझने के लिए लोकल 18 ने गंगा सभा के पुरोहित पंडित कौशल सिखोला से बातचीत की.

1914 में अंग्रेजों की योजना का हुआ था विरोध

गंगा सभा के पुरोहित पंडित कौशल सिखोला ने बताया कि यह मामला साल 1914 का है. उस समय अंग्रेजों ने हर की पौड़ी पर बांध बनाकर गंगा की धारा रोकने का फैसला किया था. उस समय पंडा समाज का कोई संगठन नहीं था, फिर भी तीर्थ पुरोहितों और पंडा समाज ने अंग्रेजों की इस योजना का विरोध किया. पुरोहितों का कहना था कि रुके हुए पानी में धार्मिक कर्मकांड और अस्थि प्रवाह नहीं किए जा सकते. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन कार्यों के लिए गंगा का जल अविरल और स्वतंत्र रूप से बहना जरूरी है. पंडित कौशल सिखोला के मुताबिक, इस मुद्दे पर कई महीनों तक बातचीत हुई, लेकिन कोई हल नहीं निकला. अंग्रेज अपनी योजना पर अड़े रहे. इसके बाद पंडित मदन मोहन मालवीय को बनारस से हरिद्वार बुलाया गया.

दो साल तक चला आंदोलन, अंग्रेजों को करना पड़ा समझौता

पंडित कौशल सिखोला ने बताया कि अंग्रेजों की योजना के खिलाफ करीब दो साल 1916 तक यह आंदोलन चला. इस आंदोलन को देशभर के राजा-महाराजाओं और रजवाड़ों का भी समर्थन मिला. आंदोलन के बढ़ने के बाद अंग्रेज सरकार को समझौता करना पड़ा. तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी सर जेम्स मेस्टन ने तीर्थ पुरोहितों के साथ समझौता किया कि गंगनहर की वार्षिक बंदी के दौरान भी हर की पौड़ी पर कम से कम दो फीट पानी रहेगा.

हर की पौड़ी की व्यवस्था के लिए बनाई गई गंगा सभा

पंडित कौशल सिखोला के अनुसार, हर की पौड़ी की व्यवस्था संभालने के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय ने गंगा सभा का गठन किया था. उन्होंने उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग पर आरोप लगाया कि विभाग अक्सर ऐतिहासिक समझौते का उल्लंघन करता है. इसके कारण गंगनहर की वार्षिक बंदी के दौरान हर की पौड़ी और दूसरे गंगा घाटों पर पानी की कमी हो जाती है, जिससे श्रद्धालुओं को धार्मिक अनुष्ठान करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है.



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