इजरायल जैसा हाईटेक देश EVM से वोटिंग क्यों नहीं कराता? बैलेट पेपर से हाथों की गिनती तक, किसका डर

इजरायल जैसा हाईटेक देश EVM से वोटिंग क्यों नहीं कराता? बैलेट पेपर से हाथों की गिनती तक, किसका डर


गौरतलब यह है कि पर्ची से मतदान का मतलब यह नहीं है कि इजरायल चुनावों में तकनीक का इस्तेमाल ही नहीं करता. चुनावी प्रबंधन, आंकड़ों के संकलन और नतीजों को प्रकाशित करने में कंप्यूटर की भूमिका होती है. फर्क यह है कि मतदाता का मूल वोट किसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन में दर्ज होने की बजाय कागज पर मौजूद रहता है.

वोटों की गिनती हाथों से क्यों होती है?
मतदान खत्म होने के बाद चुनावी प्रक्रिया का सबसे अहम चरण शुरू होता है. इजरायल में मतपेटियां खोलकर बैलट पेपर की गिनती संबंधित वोटिंग सेंटर पर ही की जाती है. यह काम वोटिंस सेंटर की कमिटी करती है, जिसमें चुनावी अधिकारियों के साथ राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की निगरानी की सिस्टम भी होती है. मतगणना की प्रक्रिया को केवल गिनती तक ही सीमित नहीं रखा गया है. इसका मकसद यह भी है कि वोटों की संख्या और मतदान से जुड़े रिकॉर्ड का मिलान भी किया जा सके.

इजरायल के चुनावी कानून में मतदान केंद्र पर काउंटिंग के बाद लिखित प्रोटोकॉल तैयार करने और उसे चुनावी सामग्री के साथ आगे भेजने का प्रावधान है. यानी किसी वोटिंग सेंटर से आए आंकड़े को अंतिम मानकर बिना जांच के स्वीकार करना इस सिस्टम का मकसद नहीं है. लिखित रिकॉर्ड और असली मतपत्रों के जरिए जरूरत पड़ने पर दोबारा जांच की जा सकती है.

हाईटेक इजरायल को साइबर हमले का डर क्यों है?
इस सवाल का सबसे अहम जवाब चुनावी सिस्टम की सुरक्षा से जुड़ा है. किसी देश की तकनीकी क्षमता जितनी भी एडवांस हो, उसके डिजिटल सिस्टम को पूरी तरह जोखिम से मुक्त नहीं माना जा सकता है.

इजरायल के सामने भी चुनावों के दौरान साइबर हमले, डिजिटल आंकड़ों में छेड़छाड़, गलत सूचनाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार भ्रामक सामग्री जैसी चुनौतियां हैं. 2026 के चुनाव की तैयारियों के दौरान इजरायली चुनाव अधिकारियों ने भी डिजिटल दुनिया में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर चिंता जताई है.

यहां एक जरूरी अंतर को समझना होगा. यह कहना सही नहीं होगा कि इजरायल ने कागजी मतदान इसलिए अपनाया क्योंकि किसी खास साइबर हमले में उसकी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन हैक हो गई थी. उपलब्ध जानकारी से ऐसी वजह साबित नहीं हो पाती है. असल मुद्दा तो यह है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग पर निर्भरता बढ़ने से कुछ नए जोखिम पैदा हो सकते हैं, जिनसे बचने के लिए कागजी मतपत्र एक उपयोगी सुरक्षा उपाय बनते हैं.

अगर वोटों का डिजिटल रिकॉर्ड हैक हो जाए तो?
मान लीजिए किसी चुनाव में मतदाताओं के वोट इलेक्ट्रॉनिक मशीनों में दर्ज किए जाते हैं और उन्हीं मशीनों या उनसे जुड़े सिस्टम से नतीजे तैयार होते हैं. ऐसी स्थिति में यदि कोई हमलावर सिस्टम में घुसकर आंकड़े बदलने में सफल हो जाए, तो यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि वास्तविक वोट कितने थे और कंप्यूटर में दर्ज आंकड़े कितने सही हैं.

यह खतरा हर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम में एक जैसा नहीं होता. इसका लेवल सिस्टम की बनावट, सुरक्षा उपायों और स्वतंत्र जांच के सिस्टम पर निर्भर करता है. कागजी मतपत्र में स्थिति अलग होती है. कंप्यूटर में अगर किसी पार्टी के वोटों की संख्या गलत दर्ज हो जाए, तो मूल मतपत्रों और लिखित रिकॉर्ड से उसका मिलान किया जा सकता है. इस तरह डिजिटल आंकड़े में गड़बड़ी होने पर भी उसे जांचने का एक स्वतंत्र आधार मौजूद रहता है.

क्या कोई विदेशी ताकत चुनाव के नतीजे बदल सकती है?
डिजिटल चुनावी सिस्टम पर साइबर हमले की आशंका केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है. किसी विदेशी सरकार, हैकर समूह या दूसरे दुर्भावनापूर्ण तत्व की ओर से चुनावी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने का जोखिम कई देशों के लिए चिंता का विषय है.

इस तरह के हमलों का मकसद अलग-अलग हो सकता है. कोई वोटिंग लिस्ट या चुनावी वेबसाइट को बाधित करने की कोशिश कर सकता है, तो कोई मतगणना से जुड़े कंप्यूटर सिस्टम को निशाना बना सकता है. कुछ हमले सीधे नतीजों को बदलने के बजाय चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कमजोर करने के लिए भी किए जा सकते हैं.

कागजी मतपत्र इस जोखिम को पूरी तरह खत्म नहीं करते, लेकिन वे एक अहम सुरक्षा परत जोड़ते हैं. यदि केंद्रीय डिजिटल सिस्टम में दर्ज संख्या पर सवाल उठता है, तो मतपत्रों और मतदान केंद्रों के हस्ताक्षरित रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है. इजरायल की व्यवस्था का मूल तर्क यही है कि चुनाव के वास्तविक परिणाम को केवल एक कंप्यूटर सिस्टम पर निर्भर नहीं होना चाहिए.

क्या चुनावी नतीजों में चेंज के लिए सिस्टम हैक करना जरूरी?
नहीं, जरूरी नहीं. किसी चुनाव में जोखिम केवल वोटों की संख्या बदलने तक सीमित नहीं होता. वोटर रजिस्ट्रेशन, मतदान सेंटर का मैनेजमेंट, रिजल्ट कम्पाइलेशन और सार्वजनिक सूचना प्रणाली जैसे दूसरे हिस्से भी महत्वपूर्ण होते हैं. किसी सिस्टम में अगर खराबी आती है तो वोटर्स को गलत जानकारी मिल सकती है. चुनावी प्रक्रिया बाधित हो सकती है या नतीजों को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है. हालांकि किसी वेबसाइट पर गलत आंकड़े दिखने और असली बैलेट पेपर में दर्ज वोट बदल जाने के बीच बड़ा अंतर है.

इजरायल के चुनावी मॉडल में कागजी बैलट पेपर और लिखित प्रोटोकॉल इसलिए अहम हैं, क्योंकि वे डिजिटल रिजल्ट को जांचने का आधार उपलब्ध कराते हैं. 2026 के चुनाव पर पब्लिश रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय चुनावी आंकड़ों के सिस्टम और जनता को नतीजे दिखाने वाले ऑनलाइन सिस्टम को अलग रखा गया है. रिपोर्ट में केंद्रीय सिस्टम के इंटरनेट से अलग होने की बात भी कही गई है.

इसका मतलब यह नहीं है कि हर संभावित साइबर हमले को रोकना सुनिश्चित हो गया. इसका मतलब यह है कि किसी एक डिजिटल हिस्से में गड़बड़ी होने पर भी जांच के लिए दूसरे रिकॉर्ड मौजूद रह सकते हैं.

क्या इजरायल का चुनावी सिस्टम इंटरनेट से जुड़ा नहीं होता?
यहां बारीकी समझना जरूरी है. इजरायल के चुनावों में कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता, ऐसा कहना गलत होगा. चुनावी आंकड़ों को संकलित करने और जनता के सामने नतीजे दिखाने के लिए डिजिटल सिस्टम इस्तेमाल किए जाते हैं.



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