इजराइल में कितने मुसलमान रहते हैं? जहां अब ‘राम’ भरोसे बनेगी सरकार… कैसे बना था यह देश?

इजराइल में कितने मुसलमान रहते हैं? जहां अब ‘राम’ भरोसे बनेगी सरकार… कैसे बना था यह देश?


इजराइल की अरब मुस्लिम आबादी बेंजामिन नेतन्याहू को रोकने में कामयाब हो गई है. चुनाव परिणाम के बाद नेतन्याहू की पार्टी बहुमत से पीछे है. मुख्य विपक्षी दल भी कमाल नहीं कर पाया है. इससे पहले इजराइल 2019 से लेकर 2021 तक ऐसे हालात बने थे जब चार बार मिडटर्म चुनाव कराने पड़े थे. बाद में विपक्षी दल ने ‘राम’ भरोसे सरकार बनाई थी. 2021 में बनी यह सरकार महज 18 महीने ही चल सकी थी.

27 अक्टूबर को हुए चुनाव में इस बार बार बढ़े वोटिंग प्रतिशत के बाद ये तय माना जा रहा था कि चुनाव में बड़ा उलटफेर दिख सकता है. अब तक 90 प्रतिशत वोटों की गिनती हो चुकी है, जिसमें नेतन्याहू की लिकुड पार्टी का गठबंधन बहुमत से बहुत पीछे है. इसकी प्रमुख वजह मुस्लिम वोट को माना जा रहा है. अरब पार्टियों की बढ़ी सीटें इस बात की बानगी हैं. ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी आम चुनाव में अरब पार्टियों ने 19 सीटें जीती हैं. अब तक हुई वोटों की गिनती में लिकुड पार्टी को 53 और आइजेनकोट गठबंधन को 48 सीटें मिली हैं, जबकि बहुमत के लिए 61 सीटें चाहिए.

इजराइल की राजनीति ‘राम’ भरोसे

इजराइल में राम का मतलब Ra’am से है. यह एक अरब पार्टी है जिसका पूरा नाम यूनाइटेड अरब लिस्ट है, जिसे हिब्रू भाषा में रेश-अयिन-मेम कहते हैं. यह इजराइल की मुस्लिम अरब आबादी का प्रतिनिधत्व करती है जिसके नेता मंसूर अब्बास हैं. 2021 में पहली बार यह पार्टी सरकार का हिस्सा बनी थी. उस समय यायर लैपिड और नफ्ताली बेनेट ने आठ पार्टियों का गठबंधन बनाया, जिसमें राम भी शामिल थी. 13 जून 2021 को इस गठबंधन ने संसद में 60 के मुकाबले 59 वोटों से विश्वास मत हासिल किया था. यह पहली बार था जब कोई अरब पार्टी सत्ता का हिस्सा बनी थी. हालांकि 18 महीने बाद ही गठबंधन टूट गया था.

इजराइल में कितने मुस्लिम रहते हैं?

इजराइल में मुसलमानों की संख्या तकरीबन 18.49 लाख है. इजराइल के केंद्रीय सांख्यिकी के मुताबिक 26 मई को जारी एक रिपोर्ट में यह संख्या बताई गई थी. इसके मुताबिक इजराइल की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी तकरीबन 18.6 प्रतिशत है. इसमें मुस्लिमों का सबसे बड़ा केंद्र येरुशलम को बताया गया था जहां तकरीबन 3.95 लाख मुसलमान रहते हैं. खास बात ये है कि इजराइल में रहने वाले सभी अरब मुस्लिम नहीं है. इनमें ईसाई और द्रूज भी शामिल हैं. हालांकि इनकी गिनती नाममात्र ही है.

कैसे बना था इजराइल?

19वीं सदी की शुरुआत में फिलस्तीन का इलाका ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था. यहां अरब मुस्लिम, अरब ईसाई और यहूदी आबादी रहती थी. सदी के अंत में अचानक यूरोप में यहूदी विरोधी भेदभाव और हिंसा बढ़ी. इसने यहूदी राष्ट्रवाद यानी जायोनिज्म को बढ़ावा दिया. यहीं से एक आंदोलन शुरू हुआ जिसने यहूदियों के लिए एक अलग जमीन की मांग की. आखिरकार फिलिस्तीन में यहूदियों का प्रवास बढ़ा.

पहले वर्ल्ड वॉर के बाद जब ऑटोमन साम्राज्य का अंत हुआ तो फिलिस्तीन पर ब्रिटेन का का अधिकार आ गया. 1917 में ब्रिटेन ने खुद यहूदी लोगों के लिए राष्ट्रीय घर की स्थापना का समर्थन किया. ऐसे में यहां रहने वाला अरब समुदाय भड़क गया. आखिरकार 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन दो राष्ट्र का प्रस्ताव दिया, जिसमें एक यहूदी और दूसरा अरब था. यरुशलम के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रशासन का प्रस्ताव था. यहूदी इस प्रस्ताव को मान गए, मगर अरब को ये स्वीकार नहीं था.

1948 में बना इजराइल

इजराइल की आजादी का ऐलान 14 मई 1948 को डेविड बेन गुरियन ने किया था. इसके अलग ही दिन अरब और इजराइल में युद्ध छिड़ गया था. इस दौरान 7 लाख से ज्यादा फिलिस्तीनियों को अपना घर छोड़ना पड़ा था. इसे फिलिस्तीन इतिहास में नकबा यानी तबाही कहा जाता है. युद्ध में इजराइल की जीत हुई और वह संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना से आगे बढ़कर फिलस्तीन के करीब 77 प्रतिशत इलाके में पहुंच गया.

इससे अरब राज्य अस्तित्व में ही नहीं आ सका. इसके बाद 1967 में अरब देशों से छह दिन वाले युद्ध के बाद इजराइल ने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया. हालांकि इन इलाकों में रहने वाले फिलिस्तीनियों की स्थिति इजराइल के मुस्लिमों से अलग रही.

मुस्लिमों के पास समान अधिकार फिर शिकायतें क्यों?

इजराइल में मुस्लिमों को भी यहूदी नागरिकों की तरह समान अधिकार प्राप्त हैं. वह राजनीतिक दल बना सकते हैं, चुनाव लड़ सकते हैं, संसद का सदस्य बन सकते हैं.हालांकि फिर कभी कभी उन्हें शिक्षा, आवास या स्थानीय बुनियादी सुविधाओं को लेकर असमानता का सामना करना पड़ता है. अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस ने 2025 की एक रिपोर्ट में भी इससे संबंधित दावा किया था. इसके अलावा 2018 में इजराइल की संसद ने एक सामान्य कानून पास किया था, जिसका नाम इजराइल दा नेशनल ऑफ ज्यूइश प्यूपिल पारित किया गया था. इस कानून के बाद इजराइल को यहूदी लोगों का राष्ट्रीय घर माना गया.

पूर्वी येरुशलम और वेस्ट बैंक के मुस्लिमों के अधिकार कम

इजराइली मुस्लिमों में पूर्वी येरुशलम और वेस्ट बैंक में रहने वाले मुस्लिमों के पास कम अधिकार है. इन्हें फिलस्तीन के स्थायी निवासी का दर्जा तो मिला हुआ है, मगर वे राष्ट्रीय चुनाव में वोट नहीं डाल सकते, उन्हें सिर्फ नगर पालिका के चुनाव में ही वोट डालने का अधिकार है. वे इजराइली नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं, लेकिन इसकी प्रक्रिया बहुत मुश्किल है.



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