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Israel Exit Polls Against Netanyahu: इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के लिए 2026 का चुनाव मुश्किल तो था ही, इसके एक्जिट पोल ने उन्हें और बड़ा सदमा दिया है. जिस बात का उन्हें डर था, वही हो रहा है क्योंकि सत्ता की चाभी अरब पार्टियों के हाथ में जा रही है और वे क्या करेंगे, ये नेतन्याहू अच्छी तरह जानते हैं.
नेतन्याहू की कुर्सी पर मंडराया संकट. (रॉयटर्स)
Israel Exit Polls Against Netanyahu: इजरायल के चुनावी नतीजों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक राह मुश्किल कर दी है. शुरुआती एग्जिट पोल के मुताबिक नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी गठबंधन और उनके विरोधी गादी आइजेनकोट का गठबंधन, दोनों ही संसद में बहुमत से दूर दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में महत्वपूर्ण हो जाती हैं वो पार्टियां, जो जादुई आंकड़े तक इन्हें पहुंचा सकती हैं. खासतौर पर अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की सीटों में बढ़ोतरी ने पूरी तस्वीर को दिलचस्प बना दिया है.
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद यानी नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटें जरूरी हैं. शुरुआती अनुमानों में दोनों प्रमुख गठबंधनों को करीब 51 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है. ऐसे में अरब पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, इस बात की आशंका नेतन्याहू को वोटिंग के वक्त ही हो गया था. हालांकि अंतिम नतीजे आने तक किसी भी गठबंधन की स्थिति को निर्णायक नहीं माना जा सकता.
अरब पार्टियों के हाथ में सत्ता की चाभी?
इजरायल के तीन प्रमुख टीवी चैनलों के एग्जिट पोल में अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राआम और जॉइंट लिस्ट को मिलाकर 18 से 19 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया. अगर ये अनुमान अंतिम नतीजों में बदला, तो संसद में इन पार्टियों की ताकत बढ़ जाएगी. जहां पिछली संसद में इन पार्टियों के पास कुल मिलाकर 10 सीटें थीं, वहीं नए अनुमानों के मुताबिक इनकी सीटों में इजाफा हो सकता है. इस बढ़त का सबसे बड़ा राजनीतिक असर सरकार गठन की बातचीत पर पड़ सकता है. इसी वजह से अरब पार्टियों को संभावित किंगमेकर के रूप में देखा जा रहा है.
नेतन्याहू के लिए टेंशन पैदा करने वाले हैं एक्जिट पोल के रुझान.
नेतन्याहू की कुर्सी छीनेंगे मुस्लिम वोटर्स?
नेतन्याहू ने मतदान के दौरान भी इस बात का जिक्र किया था कि पोलिंग बूथ पर मुस्लिम वोटर्स की संख्या ज्यादा है और यहूदियों से अपील की थी कि वे वोट देने के लिए घरों से निकलें. अब एक्जिट पोल उनके इस डर को सही बता रहे हैं. हालांकि ज्यादा सीटें मिलने का मतलब यह नहीं है कि अरब पार्टियां निश्चित रूप से नेतन्याहू की सरकार गिरा देंगी या विपक्ष को सत्ता तक पहुंचा देंगी. फिर भी ये जरूर है कि वे हालात बदल सकते हैं. चुनाव के बाद यरुशलम में लिकुड पार्टी के मुख्यालय पर समर्थकों को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने साफ कहा कि वह अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने के पक्ष में नहीं हैं.
इजरायल को चाहिए दक्षिणपंथी सरकार
- नेतन्याहू ने साफ किया है कि इजरायल में एक मजबूत दक्षिणपंथी सरकार बननी चाहिए और यहूदी और जायोनी दलों को एकजुट होना चाहिए. नेतन्याहू ने दावा किया कि उनके दक्षिणपंथी खेमे के पास स्पष्ट बहुमत है. हालांकि उन्होंने खुद जीत की औपचारिक घोषणा नहीं की और अंतिम नतीजों का इंतजार करने की बात कही.
- इस बार राजनीतिक चुनौती तगड़ी है. अगर अंतिम नतीजों में उनका गठबंधन 61 सीटों तक नहीं पहुंचता, तो उन्हें सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों का समर्थन जुटाना होगा. अरब पार्टियों को साथ लेने से इनकार करने की वजह से उनके लिए विकल्प सीमित हो सकते हैं.
तो क्या विपक्ष की सरकार बनेगी?
- नेतन्याहू को चुनौती दे रहे गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे के सामने भी बहुमत जुटाने का चैलेंज है. वजह ये है कि शुरुआती अनुमानों में उसका प्रदर्शन नेतन्याहू के गठबंधन के लगभग बराबर रहा.
- खुदआइजेनकोट भी अल्पसंख्यक अरब समूहों के समर्थन से सरकार बनाने के सवाल पर सावधानी बरत चुके हैं. ऐसे में अरब पार्टियों की बढ़ी हुई सीटें विपक्ष को अपने आप सत्ता तक नहीं पहुंचा देंगी.
- किसी पार्टी का सरकार में शामिल होना और संसद में सरकार को समर्थन देना दो अलग बातें हैं. अरब पार्टियां सरकार में शामिल हुए बिना भी कुछ परिस्थितियों में मतदान के जरिए सरकार गठन या विश्वास मत को प्रभावित कर सकती हैं.
क्या मुस्लिम वोटर बदल देंगे इजरायल की राजनीति?
अरब पार्टियों की बढ़त को इजरायल के अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी के संदर्भ में देखा जा सकता है. हालांकि सभी अरब मतदाताओं को एक ही तरह से सोचने वाला समूह मानना सही नहीं होगा. मतदान के फैसले स्थानीय मुद्दों, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और अलग-अलग पार्टियों की नीतियों से भी प्रभावित होते हैं. फिलहाल चुनावी तस्वीर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नेतन्याहू और विपक्ष, दोनों को बहुमत के लिए अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ सकती है. अरब पार्टियां इस समीकरण में अहम भूमिका निभा सकती हैं पर ऐसा नहीं मान सकते हैं कि वो नेतन्याहू को खत्म कर सकती हैं.