यूपी में MLC को कितनी मिलती है सैलरी? विधायक से कितनी अलग है पावर? समझें पूरा गणित

यूपी में MLC को कितनी मिलती है सैलरी? विधायक से कितनी अलग है पावर? समझें पूरा गणित


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UP MLC Salary News : उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों पर चुनाव के बाद एमएलसी के वेतन, भत्तों और अधिकारों को लेकर चर्चा तेज है. आखिर एक एमएलसी को हर महीने कितनी सैलरी मिलती है? वेतन के अलावा यात्रा, चिकित्सा और दूसरी कौन-कौन सी सुविधाएं मिलती हैं? क्या उन्हें अपने क्षेत्र के विकास के लिए करोड़ों रुपये की निधि भी मिलती है? साथ ही, कानून बनाने से लेकर सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने तक एमएलसी के पास कितनी शक्तियां होती हैं और वे विधायकों से किस तरह अलग हैं? आइए जानते हैं सब. 

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यूपी विधानपरिषद.

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान के बाद अब सबकी नजर चुनाव नतीजों पर है. स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की इन सीटों पर जीतने वाले उम्मीदवार विधान परिषद के सदस्य यानी एमएलसी बनेंगे. ऐसे में लोगों के मन में सवाल है कि आखिर यूपी में एमएलसी को कितनी सैलरी मिलती है, उन्हें कौन-कौन सी सरकारी सुविधाएं दी जाती हैं और कानून बनाने में उनकी कितनी भूमिका होती है?

विधान परिषद के सदस्य भी राज्य की विधायी प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं. हालांकि, उनका चुनाव विधानसभा के सदस्यों यानी विधायकों से अलग तरीके से होता है. एमएलसी सदन में कानूनों पर चर्चा करते हैं, सुझाव देते हैं और सरकार के कामकाज से जुड़े मुद्दे उठाते हैं. आइए जानते हैं एमएलसी का चुनाव, वेतन, भत्ते और उनकी शक्तियों का पूरा गणित.

कैसे चुने जाते हैं विधान परिषद के सदस्य?

विधान परिषद राज्य विधानमंडल का उच्च सदन है. इसके सदस्यों को एमएलसी कहा जाता है. उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों और श्रेणियों के आधार पर होता है.

  • विधायकों के जरिए चुनाव: विधान परिषद की करीब एक-तिहाई सीटों पर राज्य विधानसभा के निर्वाचित विधायक सदस्यों को चुनते हैं.
  • स्थानीय निकायों के जरिए चुनाव: करीब एक-तिहाई सदस्य जिला पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों, नगर निगमों और नगर पालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं.
  • स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: करीब 12 में से एक हिस्सा स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए होता है. यहां निर्धारित शर्तें पूरी करने वाले पंजीकृत स्नातक मतदाता मतदान करते हैं.
  • शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र: करीब 12 में से एक हिस्सा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए होता है. इन सीटों पर निर्धारित योग्यता वाले शिक्षक मतदाता वोट डालते हैं.
  • राज्यपाल के मनोनयन से: विधान परिषद के बाकी सदस्यों को राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले लोगों में से मनोनीत करते हैं.
  • एमएलसी बनने के लिए न्यूनतम उम्र 30 साल होनी चाहिए.
  • विधान परिषद के सदस्य का कार्यकाल छह साल का होता है.
  • हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं.

यूपी में MLC की सैलरी कितनी है?

उत्तर प्रदेश में एमएलसी को मूल वेतन के अलावा कई भत्ते और सुविधाएं मिलती हैं. वर्ष 2025 में वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी की गई थी. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वेतन और भत्तों को मिलाकर राशि करीब 2.66 लाख रुपये प्रति माह बताई गई है.

  1. मूल वेतन: 35,000 रुपये प्रति माह.
  2. चिकित्सा भत्ता: 45,000 रुपये.
  3. निर्वाचन क्षेत्र भत्ता: 75,000 रुपये.
  4. कमेटी की बैठक: बैठक में भाग लेने के लिए 2,500 रुपये तक का भुगतान प्रतिदिन
  5. स्टेशनरी भत्ता: 10,000 रुपये.
  6. यात्रा भत्ता: राज्य के भीतर यात्रा पर 20 रुपये प्रति किलोमीटर और राज्य के बाहर यात्रा पर 25 रुपये प्रति किलोमीटर की दर तय.
  7. यात्रा कूपन: हवाई या रेल यात्रा के लिए 5 लाख रुपये तक के कूपन की सुविधा बताए जाने का उल्लेख है.
  8. मोबाइल खर्च: मोबाइल बिल के लिए एक लाख रुपये तक की सुविधा का दावा किया जाता है.
  9. बिजली: 2,000 यूनिट मुफ्त बिजली की सुविधा का भी उल्लेख है.

एमएलसी के पास कितनी होती है पावर?

एमएलसी का काम सिर्फ सदन की बैठक में हिस्सा लेना नहीं है. वे राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया में योगदान देते हैं और जनता से जुड़े कई मुद्दे उठाते हैं. हालांकि, उनकी शक्तियां विधानसभा के सदस्यों यानी विधायकों जैसी हर मामले में समान नहीं होतीं.

  • कानूनों पर चर्चा और सुझाव
    विधान परिषद में विधेयकों पर चर्चा की जाती है. एमएलसी कानूनों में बदलाव के सुझाव दे सकते हैं, सवाल उठा सकते हैं और विधेयकों की कमियों की ओर ध्यान दिला सकते हैं. सामान्य विधेयकों के मामले में विधान परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन विधानसभा की संवैधानिक स्थिति अधिक मजबूत है.
  • सरकार के कामकाज पर सवाल
    एमएलसी सदन में जनहित के मुद्दे उठा सकते हैं और निर्धारित संसदीय प्रक्रियाओं के तहत मंत्रियों से सवाल पूछ सकते हैं . वे शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और अन्य सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े मामलों पर सरकार का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं.
  • मनी बिल पर सीमित अधिकार
    वित्तीय मामलों में विधान परिषद की शक्तियां विधानसभा से कम हैं. मनी बिल केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है. विधानसभा से पारित होने के बाद इसे विधान परिषद के पास सिफारिशों के लिए भेजा जाता है. विधान परिषद मनी बिल को अधिकतम 14 दिनों तक अपने पास रख सकती है और इस दौरान सिफारिशें दे सकती है. विधानसभा इन सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है. यदि विधान परिषद 14 दिनों में बिल वापस नहीं करती, तो निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत बिल दोनों सदनों से पारित माना जाता है.
  • सरकार बनाने और गिराने में भूमिका
    विधान परिषद राज्य सरकार के बहुमत का फैसला नहीं करती. मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होते हैं. इसलिए सरकार के गठन और उसके बहुमत से जुड़े मामलों में विधानसभा की भूमिका निर्णायक होती है.



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