उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी करीब चार महीने का समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारी तेज कर दी है. समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच नेताओं को अपने पाले में लाने की होड़ मची है. सपा जहां दूसरे दलों के नेताओं को जोड़कर अपना पीडीए समीकरण मजबूत करने में जुटी है, वहीं बीजेपी ने सपा के तीन सीटिंग विधायकों को तोड़कर अखिलेश यादव को बढ़ा डैमेज किया है.
इस राजनीतिक उठापटक में दोनों दल अपनी ताकत बढ़ाने का दावा कर रहे हैं. सपा को उम्मीद है कि नए नेताओं के आने से पिछड़े, दलित और दूसरे सामाजिक वर्गों में उसकी पकड़ मजबूत होगी. वहीं, बीजेपी सपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.
सपा में शामिल हुए 8 नेता, जातीय समीकरण साधने की कोशिश
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव की मौजूदगी में बीजेपी और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से जुड़े कई नेता सपा में शामिल हुए. पार्टी इसे 2027 के चुनाव से पहले अपने संगठन को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मान रही है.
सपा में शामिल होने वाले नेताओं में ये नाम शामिल हैं:
- कुशाग्र सागर: बदायूं की बिसौली सीट से बीजेपी के पूर्व विधायक.
- सिनोद कुमार शाक्य: बदायूं की दातागंज सीट से पूर्व विधायक.
- कालीचरण उर्फ केसी शाक्य: बदायूं के ब्लॉक प्रमुख और बसपा के पूर्व प्रत्याशी.
- राम बहादुर पासी: पूर्व आईएएस अधिकारी.
- अजय कुमार: मुजफ्फरनगर से पूर्व प्रत्याशी.
- दारा सिंह प्रजापति: प्रयागराज के पूर्व विधायक.
- प्रदीप पांडे: मेरठ से लोकसभा चुनाव के पूर्व प्रत्याशी.
- चंद्र प्रकाश मिश्र: शाहजहांपुर के बीजेपी नेता और एफसीआई के निदेशक.
इन नेताओं के सपा में ज्वाइनिंग के समयम पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने कहा-
हम इतना ही कहना चाहते हैं, वैसे तो कई बार इसी तरीके से समाजवादी पार्टी में ज्वाइनिंग भी हो चुकी है. और लगातार अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष जी के पास टाइम हो तो ऐसी ज्वाइनिंग होती चली जाएगी. हम तो कई जिलों में गए हैं, लोग आने को तैयार हैं. बीजेपी को छोड़ने को तैयार हैं. क्योंकि इन्होंने जो वादे किए थे ठीक उसके उल्टा काम किया है. इन्होंने देश को तोड़ने, महंगाई, भ्रष्टाचार करने का काम किया है. यह सबसे भ्रष्ट सरकार है.
इन नेताओं के जरिए सपा अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक वर्गों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती है. पार्टी को उम्मीद है कि गैर-यादव पिछड़े वर्गों, दलितों और ब्राह्मणों के बीच नए सिरे से समर्थन जुटाने में मदद मिलेगी.
अखिलेश यादव का पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पहले से ही पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है. नए नेताओं के शामिल होने से सपा इसी आधार को और व्यापक बनाने की कोशिश कर रही है.
बीजेपी ने सपा के तीन विधायकों को अपने पाले में लिया
दूसरी ओर, बीजेपी ने भी सपा को झटका दिया है. राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग को लेकर चर्चा में आए सपा के तीन विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया.
बीजेपी में शामिल होने वाले नेताओं में शामिल हैं:
- राकेश प्रताप सिंह: अमेठी की गौरीगंज सीट से सपा के विधायक रहे हैं.
- अभय सिंह: अयोध्या की गोसाईगंज सीट से विधायक रहे हैं.
- विनोद चतुर्वेदी: जालौन की कालपी सीट से तीन बार विधायक रहे हैं.
इन नेताओं के बीजेपी में शामिल होने से सपा के सामने अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है. अमेठी, अयोध्या और बुंदेलखंड से जुड़े इन चेहरों के जरिए बीजेपी स्थानीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है. बीजेपी का कहना है कि ये नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के संकल्प में योगदान देने के लिए पार्टी से जुड़े हैं. हालांकि, इस बदलाव का वास्तविक चुनावी असर 2027 में ही साफ होगा.
2027 के लिए सपा और बीजेपी की अलग-अलग रणनीति
दोनों दलों के बीच जारी दल-बदल की राजनीति उनकी चुनावी प्राथमिकताओं को भी दिखाती है. सपा दूसरे दलों के नेताओं को शामिल करके अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहती है. वहीं, बीजेपी सपा के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ लाकर विपक्षी खेमे को कमजोर करने की कोशिश कर रही है.
सपा के लिए चुनौती यह है कि नए नेताओं को शामिल करने के बाद अपने पुराने कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल बनाए रखे. दूसरी ओर, बीजेपी को यह सुनिश्चित करना होगा कि सपा से आए नेताओं का राजनीतिक प्रभाव उसके संगठन को वास्तव में फायदा पहुंचाए.
केवल नेताओं के पार्टी बदलने से चुनावी जीत तय नहीं होती. नए नेताओं को अपने साथ आए समर्थकों को भी नई पार्टी के पक्ष में मतदान के लिए तैयार करना होगा. इसके अलावा स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की छवि और संगठन की सक्रियता भी नतीजों पर असर डालेंगे.
राज्य सभा चुनाव में बगावत करने के बाद बीजेपी में चले गए मनोज पांडे और अभय सिंह को हराने के लिए सपा ने खास प्लान तैयार किया है.
किसे मिलेगा दल-बदल का फायदा?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा और बीजेपी दोनों अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी हैं. सपा कई नेताओं के शामिल होने को पीडीए समीकरण के विस्तार के तौर पर देख रही है. बीजेपी के लिए सपा के तीन विधायकों का साथ मिलना अहम राजनीतिक बढ़त हो सकती है. हालांकि, असली सवाल यह है कि क्या नए नेताओं का प्रभाव वोटों में भी बदलेगा? क्या सपा का पीडीए समीकरण और मजबूत होगा? या बीजेपी सपा के पुराने प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपनी पकड़ बढ़ाने में सफल होगी?
इन सवालों का जवाब चुनाव के दौरान सामने आएगा. फिलहाल, दोनों दलों के बीच नेताओं को अपने पाले में लाने की यह जंग 2027 के चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बना रही है.