सामान्य जेल में कई कैदी एक ही बैरक में रहते हैं. उन्हें तय समय पर भोजन, खुले परिसर में जाने, दूसरे कैदियों से मिलने या अन्य ऐक्टिविटी में हिस्सा लेने का मौका मिल सकता है. इसके उलट, हाई सिक्यॉरिटी सेल में कैदियों की गतिविधियों, मुलाकातों और एक जगह से दूसरी जगह जाने पर ज्यादा कंट्रोल रखा जा सकता है.
हालांकि हर जेल में हाई सिक्यॉरिटी सेल की बनावट और नियम एक जैसे नहीं होते. किसी जगह पर अलग कोठरी में रखना प्राथमिक व्यवस्था हो सकती है, जबकि दूसरी जेल में विशेष सुरक्षा ब्लॉक के भीतर अलग-अलग हिस्से बनाए जाते हैं.
हाई सिक्यॉरिटी सेल की प्रमुख खासियत क्या है?
ये सभी व्यवस्थाएं हर कैदी पर एक जैसी लागू नहीं होतीं. किसी विशेष कैदी के लिए कौन-सी पाबंदियां जरूरी हैं, यह संबंधित जेल प्रशासन और लागू कानूनी आदेशों पर निर्भर करता है.
लॉरेंस बिश्नोई के मामले में सुरक्षा व्यवस्था को समझने के लिए तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है.
लॉरेंस बिश्नोई को कहां रखा गया है?
लॉरेंस बिश्नोई को गुजरात की साबरमती सेंट्रल जेल, अहमदाबाद के ‘दो सौ खोली’ (Do Sau Kholi) या ब्लॉक 200 में शिफ्ट किया गया है. मीडिया रिपोर्ट में जेल से जुड़े सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि यह जेल का विशेष हाई सिक्यॉरिटी हिस्सा है. इस ब्लॉक में 200 कैदियों को रखने की क्षमता बताई गई है. इसे चार अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है और हर हिस्से में लगभग 50 कैदियों की व्यवस्था है. इसका मकसद कैदियों की आवाजाही को नियंत्रित करना और उनके बीच अनधिकृत संपर्क की संभावना कम करना है.
रिपोर्ट के अनुसार, बिश्नोई की नई सेल का आकार करीब 7.5 × 11 फीट है. यानी लगभग 82.5 वर्ग फीट. यह जानकारी मीडिया रिपोर्ट में प्रकाशित हुई है, जेल प्रशासन की ओर से जारी विस्तृत आधिकारिक तकनीकी डॉक्युमेंट के रूप में नहीं. इससे पहले उसे साबरमती जेल के ही छोटे हाई सिक्यॉरिटी परिसर ‘दस खोली’ में रखे जाने की बात सामने आई थी. इस परिसर में लगभग 10 कैदियों को रखने की व्यवस्था बताई गई थी.
‘दो सौ खोली’ में शिफ्ट करने के पीछे क्या वजह बताई गई?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिश्नोई को इस ब्लॉक में शिफ्ट करने का मकसद उसके बाहर मौजूद कथित आपराधिक नेटवर्क से संपर्क की संभावनाओं को और सीमित करना है. इसका एक कारण यह चिंता भी है कि संगठित अपराध से जुड़े गिरोहों के सदस्य जेल में बंद अपने कथित सरगना के बाहर होने पर भी उसके सहयोगियों के जरिए सक्रिय रह सकते हैं. ऐसे मामलों में जेल के भीतर संचार पर नियंत्रण और कैदियों के बीच संपर्क सीमित करना सुरक्षा रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बिश्नोई के सीधे संपर्क से जुड़े मामलों पर जांच एजेंसियां नजर रख रही हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जांचकर्ताओं को पिछले दो वर्षों में उसकी ओर से सीधे किए गए फोन कॉल या संचार के प्रमाण नहीं मिले हैं. यह संबंधित रिपोर्ट में जांचकर्ताओं के हवाले से दी गई जानकारी है, ना कि इस बात का स्वतंत्र प्रमाण कि उसके कथित नेटवर्क की सभी गतिविधियां बंद हो गई हैं.
क्या जेल में रहते हुए भी अपराध का नेटवर्क चलाया जा सकता है?
यह सवाल बिश्नोई जैसे चर्चित मामलों में बार-बार उठता है. सिद्धांत रूप में, जेल में बंद किसी व्यक्ति के सहयोगी बाहर सक्रिय रह सकते हैं. लेकिन किसी गिरोह की गतिविधियों में जेल में बंद व्यक्ति की वास्तविक भूमिका साबित करने के लिए जांच, संचार संबंधी सबूत और न्यायिक प्रक्रिया जरूरी होती है.
बिश्नोई से जुड़े मामलों में भी पुलिस और जांच एजेंसियां उसके कथित सहयोगियों, धमकी भरे संदेशों और दूसरे आपराधिक मामलों में भूमिका की जांच करती रही हैं. ऐसी आशंकाओं को देखते हुए हाई सिक्यॉरिटी व्यवस्था में अनधिकृत फोन, इंटरनेट और दूसरे संचार माध्यमों तक पहुंच रोकना महत्वपूर्ण माना जाता है. हालांकि, केवल हाई सिक्यॉरिटी सेल में रखे जाने से यह साबित नहीं होता कि कोई व्यक्ति जेल से ही अपराध चला रहा था. इसके लिए मामले से जुड़े विशिष्ट सबूतों को देखना जरूरी है.
जेल में बंद कैदी की आवाजाही पर रोक लगाने वाला कानून क्या है?
लॉरेंस बिश्नोई के मामले में हाई सिक्यॉरिटी सेल के अलावा उसकी जेल से बाहर आवाजाही पर लागू प्रतिबंध भी महत्वपूर्ण है. इंडियन एक्सप्रेस की 19 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अगस्त 2026 में बिश्नोई को साबरमती जेल से बाहर न ले जाने संबंधी प्रतिबंध को फिर से बढ़ाया था. इस आदेश के तहत उसे किसी दूसरी जगह शारीरिक हिरासत में ले जाना प्रतिबंधित है और अदालत में पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कराई जाती है. अन्य जांच एजेंसियों को भी उससे पूछताछ के लिए संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है.
रिपोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 303 का उल्लेख किया गया है. यह प्रावधान निर्दिष्ट कैदियों को जेल से बाहर स्थानांतरित करने पर सरकारी प्रतिबंध से संबंधित है. इसे हाई सिक्यॉरिटी सेल बनाने के नियम के साथ एक ही चीज नहीं समझना चाहिए. जेल के भीतर सुरक्षा व्यवस्था और जेल से बाहर ले जाने पर प्रतिबंध, दोनों अलग प्रशासनिक और कानूनी विषय हैं.
क्या हाई सिक्यॉरिटी सेल में कैदियों को सामान्य सुविधाएं नहीं मिलतीं?
हाई सिक्यॉरिटी में रखे जाने का अर्थ यह नहीं है कि कैदी के सभी कानूनी अधिकार खत्म हो जाते हैं. ऐसी व्यवस्था में उसकी आवाजाही, मुलाकात और संचार पर कड़ी पाबंदियां हो सकती हैं, लेकिन लागू कानून और जेल नियमों के अनुसार जरूरी अधिकार बने रहते हैं.
भारत के गृह मंत्रालय की मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016 में कैदियों के अधिकार, कानूनी सहायता, जेल निरीक्षण और हाई सिक्यॉरिटी व्यवस्था से संबंधित प्रावधान शामिल हैं. वहीं, दिल्ली जेल नियमावली 2018 में हाई सिक्यॉरिटी कैदियों को विशेष सुरक्षा परिसर में रखने का उल्लेख है. वास्तविक नियम संबंधित राज्य की जेल व्यवस्था और लागू आदेशों के अनुसार अलग हो सकते हैं.
क्या हाई सिक्यॉरिटी सेल में रखने का मतलब दोषी साबित होना है?
नहीं. सुरक्षा के आधार पर किसी कैदी को विशेष परिसर में रखा जा सकता है. अपराध में दोषी होने या ना होने का फैसला अदालत करती है. हाई सिक्यॉरिटी सेल जेल की ऐसी व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य जोखिम वाले कैदियों की आवाजाही, संपर्क और गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण रखना है. लॉरेंस बिश्नोई के मामले में साबरमती जेल के ‘दो सौ खोली’ ब्लॉक में शिफ्ट किए जाने की खबर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उसके कथित आपराधिक नेटवर्क से संपर्क सीमित करने के लिए अपनाए गए सख्त सुरक्षा उपायों की ओर इशारा करती है.
हालांकि, जेल में सुरक्षा व्यवस्था कितनी सख्त है और किसी कैदी की आपराधिक गतिविधियों में वास्तविक भूमिका क्या रही है, ये दो अलग सवाल हैं. पहले का जवाब जेल प्रशासन के नियमों और आदेशों से मिलता है, जबकि दूसरे का निर्धारण जांच और अदालत में पेश किए गए सबूतों के आधार पर होता है.