वीटो के इस्तेमाल में अमेरिका दूसरे स्थान पर है. पिछले तीन दशकों में उसके वीटो का बड़ा हिस्सा इजरायल और फलस्तीन से जुड़े मामलों पर रहा है. अमेरिका ने कई ऐसे प्रस्तावों को रोका है जिनमें इजरायल की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की गई थी या उससे जुड़ी मांगें रखी गई थीं. गाजा युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने युद्धविराम और संघर्ष रोकने से जुड़े कई प्रस्तावों को वीटो किया. उसका तर्क रहा है कि कुछ प्रस्ताव इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं देते या हमास की भूमिका को उचित तरीके से नहीं देखते. दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी वीटो के कारण सुरक्षा परिषद कई मौकों पर गाजा में हिंसा रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठा सकी.
2018 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रेसिडेंट मारिया फर्नांडो एपिनोसा के साथ पीएम मोदी. फोटो- पीएमओ
चीन ने रूस और अमेरिका के मुकाबले कम बार वीटो का इस्तेमाल किया है. लेकिन पिछले दो दशकों में उसकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हुई है. खासकर सीरिया, वेनेजुएला और उत्तर कोरिया से जुड़े कुछ मामलों में चीन ने रूस के साथ मिलकर प्रस्तावों को रोका. चीन का कहना रहा है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों में संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और बातचीत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. वह कई बार पश्चिमी देशों की ओर से लगाए जाने वाले प्रतिबंधों और सैन्य हस्तक्षेप से जुड़े प्रस्तावों का विरोध करता रहा है.
हालांकि, चीन की भूमिका केवल औपचारिक वीटो तक सीमित नहीं है. भारत के हितों से जुड़े मामलों में उसने संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध समितियों में भी कई बार अड़चनें पैदा की हैं. इन समितियों में किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी घोषित करने के लिए सहमति की प्रक्रिया अहम होती है. ऐसे में किसी एक सदस्य की आपत्ति प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक सकती है. लेकिन इस व्यवस्था को सुरक्षा परिषद में इस्तेमाल किए जाने वाले औपचारिक वीटो के बराबर नहीं माना जाना चाहिए. दोनों के नियम और प्रक्रियाएं अलग हैं.
इस सवाल का जवाब देने के लिए इतिहास के दो दौर अलग-अलग समझने होंगे. शीतयुद्ध के समय भारत के खिलाफ या उसके हितों के प्रतिकूल समझे जाने वाले कई प्रस्तावों पर सुरक्षा परिषद में चर्चा हुई. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत के खिलाफ सबसे ज्यादा वीटो किया. उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड इससे अलग तस्वीर दिखाता है.
1950 और 1960 के दशक में कश्मीर के मुद्दे पर अमेरिका और ब्रिटेन ने ऐसे प्रस्तावों का समर्थन किया, जिनका भारत विरोध करता था. सोवियत संघ ने कई मौकों पर भारत के रुख के अनुकूल भूमिका निभाई. जून 1962 में कश्मीर से जुड़े एक प्रस्ताव को सोवियत संघ के वीटो के कारण पारित नहीं किया जा सका. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उस समय अमेरिका और ब्रिटेन के रुख पर निराशा भी जताई थी.
दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान सोवियत संघ ने युद्धविराम से जुड़े तीन प्रस्तावों को वीटो किया. इन प्रस्तावों में तत्काल युद्धविराम की मांग की गई थी. भारत की चिंता थी कि इससे पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे संघर्ष और बांग्लादेश की मुक्ति की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है. सोवियत संघ के वीटो ने उस समय भारत को कूटनीतिक राहत दी.
इसलिए इतिहास के उस दौर में भारत के हितों के अनुकूल इस्तेमाल किए गए वीटो का प्रमुख उदाहरण सोवियत संघ का है. यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत के खिलाफ सबसे अधिक वीटो किया. कई मामलों में उन्होंने भारत के प्रतिकूल प्रस्तावों का समर्थन जरूर किया, लेकिन वीटो का इस्तेमाल किसी प्रस्ताव को रोकने के लिए किया जाता है. दोनों स्थितियों में अंतर समझना जरूरी है.
हाल के दशकों में चीन और भारत के बीच वीटो से जुड़ी बहस का सबसे चर्चित उदाहरण जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने का मामला रहा है. भारत लंबे समय से मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल कराने की कोशिश करता रहा. चीन ने कई बार इस प्रस्ताव पर तकनीकी रोक लगाई. इससे उसे आतंकवादी घोषित करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी. मई 2019 में चीन ने अपनी आपत्ति हटाई और मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में शामिल कर लिया गया. यहां फिर वही अंतर समझना जरूरी है. चीन ने इस मामले में सुरक्षा परिषद में औपचारिक वीटो नहीं किया था. उसने प्रतिबंध समिति की प्रक्रिया में तकनीकी रोक लगाई थी. हालांकि, भारत के लिए इसका व्यावहारिक असर यही था कि प्रस्ताव को मंजूरी मिलने में देरी हुई.
भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है. भारत के साथ ब्राजील, जर्मनी और जापान भी जी-4 समूह के तहत सुरक्षा परिषद में सुधार की वकालत करते हैं. इन देशों का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था 1945 की वैश्विक शक्ति-संरचना को दर्शाती है, न कि आज की दुनिया को. भारत दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश का प्रतिनिधित्व करता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी भूमिका भी बढ़ी है. इसके बावजूद वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है.
इस मामले में चीन की भूमिका अहम है. सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना होगा. इसके लिए व्यापक समर्थन के साथ पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी भी जरूरी है. यानी चीन किसी ऐसे संशोधन को रोक सकता है, जिससे भारत की स्थायी सदस्यता का रास्ता खुले.
भारत का कहना है कि सुरक्षा परिषद में सुधार केवल सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए. वीटो के अधिकार और उसके इस्तेमाल के नियमों पर भी चर्चा जरूरी है. भारत ने कई मौकों पर कहा है कि वीटो का अधिकार अगर बना रहता है तो सभी नए स्थायी सदस्यों को भी समान अधिकार मिलने चाहिए. भारत का तर्क है कि स्थायी सदस्यता को दो श्रेणियों में बांटने से असमानता खत्म नहीं होगी. अप्रैल 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 76/262 पारित किया था. इसके तहत सुरक्षा परिषद के किसी स्थायी सदस्य द्वारा वीटो किए जाने पर महासभा में उस मुद्दे पर चर्चा कराने की व्यवस्था बनाई गई. इसका मकसद वीटो के इस्तेमाल को अधिक जवाबदेह बनाना था. लेकिन भारत का कहना है कि केवल वीटो के बाद चर्चा करा देने से उसके इस्तेमाल पर रोक नहीं लगती.
भारत ने सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए चल रही अंतर-सरकारी वार्ता में भी आम सहमति की शर्त पर सवाल उठाया है. उसका तर्क है कि जब किसी एक देश की असहमति पूरी प्रक्रिया को रोक सकती है तो यह व्यवस्था सुधार के रास्ते में बाधा बन जाती है. भारत के मुताबिक सुधार पर व्यापक राजनीतिक समर्थन जरूरी है, लेकिन आम सहमति को इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए कि कोई ठोस निर्णय ही न हो सके.