पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब ने बड़े अरमानों के साथ मक्का पैक्ट का ऐलान किया था. इन समझौते का एक अहम मकसद नाटो की तर्ज पर किसी एक देश पर हमला होने की सूरत में सभी सदस्य देशों की तरफ से उनका मुकाबला करना है. इसी वजह से इसे इस्लामिक नाटो की संज्ञा दी जा रही है. हालांकि यह समझौता भी सऊदी अरब के कोई काम आता नहीं दिख रहा है. पाकिस्तान और तुर्की बार-बार सऊदी को मदद का भरोसा ही दिलाते रहे, लेकिन हूति विद्रोहियों से मुकाबले के लिए कोई भी आगे नहीं आया. ऐसे में अब खबर है कि हूर्ति विद्रोहियों के लगातार हमलों के आगे बेबस सऊदी अरब ने अब घुटने टेक दिए हैं.
दरअसल ईरान समर्थित हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब पर हमले कर रहे हैं. उसके हमले रोकने के लिए सऊदी का एयर डिफेंस सिस्टम भी नाकाम साबित हुआ है. अब ये इस्लामी मुल्क जंग के मैदान में बैकफुट पर दिखाई दे रहा है. वहीं इजरायली समाचार वेबसाइट इजरायल हयोम में छपी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सऊदी अरब ने हूतियों को 1 अरब अमेरिकी डॉलर यानी 9521 करोड़ रुपये देने की ऑफर दिया है. यह ऑफर ईरान की मध्यस्थता में हुए एक समझौते का हिस्सा है, जिसका मकसद सीजफायर लागू करना और सऊदी अरब पर हो रहे हमलों को रोकना है.
खबर में बताया गया है कि सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने हूतियों के साथ जंग रोकने पर बातचीत करने के लिए तेहरान भी गए थे. इस प्रस्तावित समझौते के तहत, सऊदी अरब ईरान के जरिये हूति विद्रोहियों को 1 अरब अमेरिकी डॉलर दिए जाने की बात है.
प्लेन में पैसा भरकर तेहरान गए थे सऊदी के रक्षा मंत्री?
इस रिपोर्ट में एक राजनयिक सूत्र के हवाले से दावा गया किया है कि सऊदी मंत्री जिसे ‘हरक्यूलिस’ मिलिट्री प्लेन से तेहरान गए थे, उसमें वह अपने साथ ये पैसे भी ले गए थे. हालांकि किसी सऊदी अधिकारी ने इस बात की पुष्टि नहीं की है कि कोई रकम ट्रांसफर की गई है. बताया जा रहा है कि इस बातचीत में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान, सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के महासचिव मोहसेन रेज़ाई और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ अधिकारी के अलावा तुर्की के खुफिया प्रमुख इब्राहिम कलिन और पाकिस्तानी आर्मी चीफ आसिम मुनीर भी शामिल थे.
मक्का पैक्ट पर क्या बोला सऊदी?
उधर सऊदी विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान में इस यात्रा के बारे में कहा, ‘रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान और ‘मक्का ज्वॉइंट डिफेंस एलायंस’ के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों की तेहरान यात्रा इस गठबंधन के उन प्रयासों का हिस्सा है जिनका मकसद मौजूदा संकट से जुड़े पक्षों के बीच तनाव कम करना, बातचीत और कूटनीतिक समाधान को बढ़ावा देना है.
इस वार्ता में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के अलावा तुर्की के खुफिया प्रमुख इब्राहिम कलिन और पाकिस्तानी आर्मी चीफ आसिम मुनीर भी शामिल थे.
इजरायली मीडिया से बात करते हुए एक सऊदी अधिकारी ने वित्तीय लेन-देन की खबरों की पुष्टि तो नहीं की, लेकिन यह जरूर कहा कि हूतियों के साथ विवाद का एक हिस्सा तीन साल पहले बनी सहमतियों को लागू करने से जुड़ा है. इन समझौतों के तहत, सऊदी अरब को हुतियों को सीधे आर्थिक मदद देनी थी, ताकि विवाद को सुलझाने की कोशिशें आगे बढ़ सकें. इस फंडिंग का एक मकसद हुतियों के नियंत्रण वाले इलाकों में सरकारी कर्मचारियों को वेतन देना और आम नागरिकों से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को दोबारा खड़ा करना था.
सऊदी करता रहा है हूतियों को फंड देने का विरोध
रिपोर्टों के अनुसार, इसके बदले में हुतियों से यह उम्मीद की गई थी कि वे सीजफायर का पालन करेंगे और सऊदी अरब पर हमले बंद कर देंगे. हाल के महीनों में, हुतियों ने अपने ‘हमलों’ को यह कहते हुए सही ठहराया है कि सऊदी अरब ने पहले हुए समझौतों से किनारा कर लिया. इजरायली मीडिया का यह भी कहना है कि सऊदी अरब का रुख यह रहा है कि वह ‘सैन्य ब्लैकमेल’ के दबाव में किसी नए सीजफायर को स्वीकार नहीं करेगा. साथ ही, सऊदी अरब ने हुतियों को तब तक फंड देने का विरोध किया है, जब तक कि वे यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार से छीने गए इलाकों को वापस नहीं कर देते.
मक्का पैक्ट पर सवाल क्यों?
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का में जिस संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, उसका मकसद सामूहिक सुरक्षा, रक्षा सहयोग और किसी एक सदस्य देश पर हमले का मिलकर जवाब देने है. मौजूदा संकट में मक्का समझौते पर इसलिए सवाल उठ रहे हैं क्योंकि हूति विद्रोही लगातार ही सऊदी अरब के अहम ठिकानों पर हमले कर रहे हैं और इस समझौते के साझेदार यानी तुर्की और पाकिस्तान बस समाधान की तलाश में ईरान के साथ बातचीत कर रहे हैं. उधर तुर्की ने यह भी साफ किया है कि इस समझौते का अर्थ हूतियों के खिलाफ यमन में अपनी सेना भेजकर हमला करना नहीं है.