चंद्रभागा के तट पर विराजते हैं भगवान विट्ठल, पंढरपुर के इस पावन धाम में दर्शन से पहले क्यों जरूरी है भक्त पुंडलीक की पूजा

चंद्रभागा के तट पर विराजते हैं भगवान विट्ठल, पंढरपुर के इस पावन धाम में दर्शन से पहले क्यों जरूरी है भक्त पुंडलीक की पूजा


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चंद्रभागा के तट पर विराजते हैं भगवान विट्ठल, पंढरपुर के इस धाम का करें दर्शन

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Pandharpur Bhagwan Vitthal : महाराष्ट्र के पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के तट पर भगवान विट्ठल रूक्मणि संग विराजमान है. पंढरपुर अपने आप में बड़ा तीर्थ स्थल है. यहां भगवान विष्णु के पांडुरंग रूप का दिव्य दर्शन होता है.भगवान विट्ठल को यहां रूक्मणि और अपने भक्तों के लिए आना पड़ा. भगवान विट्ठल के इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण 12वीं-13वीं शताब्दी में माना जाता है. यह पावन धाम सदियों से भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र रहा है. चंद्रभागा नदी के तट पर बसे इस धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान पांडुरंग के दर्शन का पुण्य तभी पूर्ण माना जाता है जब भक्त उनके परम भक्त पुंडलीक के दर्शन करते हैं. आइए जानते हैं पंढरपुर के इस पावन मंदिर का पौराणिक महत्व, पवित्र परंपराएं और दर्शन की संपूर्ण प्रक्रिया.

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भगवान पांडुरंग का मंदिर.(Image: vitthalrukminimandir)

Pandharpur Vitthal Temple : महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में स्थित पंढरपुर धार्मिक आस्था का बड़ा केंद्र है. यहां भगवान विट्ठल विराजमान है. यहां चंद्रभागा नदी के तट पर भगवान श्रीहरि विष्णु के पांडुरंग रूप का दिव्य लीला क्षेत्र है. सदियों से यह क्षेत्र भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र रहा है. भीमा यानी चंद्रभागा नदी यहां की विशेषताओं में चार चांद लगाता है. इस धाम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान पांडुरंग के दर्शन का पुण्य तभी पूर्ण माना जाता है जब भक्त उनके परम भक्त पुंडलीक के दर्शन करते हैं. राम कृष्ण हरि और जय हरि विट्ठल के जयकारों के साथ जब भक्त इस प्रांगण में प्रवेश करते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है. पंढरपुर के भगवान विट्ठल से संबंधित कई चमत्कार और अनजाने रहस्य हैं.

चंद्रभागा नदी का स्नान और भक्त पुंडलीक का मंदिर

पंढरपुर पहुंचने वाले श्रद्धालु सबसे पहले यहां बहने वाली पवित्र भीमा नदी में स्नान करते हैं, जिसे प्रेम से चंद्रभागा भी कहा जाता है. पुराणों के अनुसार, चंद्रभागा नदी में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. स्नान के उपरांत भक्त नदी के समीप स्थित भक्त पुंडलीक के मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं. पौराणिक मान्यता है कि स्वयं भगवान महाविष्णु अपने परम भक्त पुंडलीक की निष्काम सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें मोक्ष प्रदान करने तथा यहां रुकने के लिए विट्ठल रूप में प्रकट हुए थे. इसलिए माना जाता है कि पुंडलीक के दर्शन किए बिना पांडुरंग के दर्शन की यात्रा अधूरी रहती है.

चोखा मेला और संत नामदेव महाराज का पावन स्मरण

चंद्रभागा और पुंडलीक मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद भक्त मुख्य मंदिर परिसर की ओर बढ़ते हैं. मंदिर के मुख्य प्रांगण के दाहिनी ओर भक्त चोखा मेला का मंदिर स्थित है. ऐसी मान्यता है कि चोखा मेला भक्तों की मनोकामनाओं को जानकर पांडुरंग प्रभु से उनकी पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं. इसके आगे मुख्य द्वार के मध्य में संत श्रेष्ठ नामदेव महाराज की अत्यंत सुंदर मूर्ति और उनकी प्रसिद्ध सीढ़ियां स्थित हैं. पंढरपुर आने वाले भक्त सर्वप्रथम नामदेव महाराज की मूर्ति का नमन करते हैं और विशेष उत्सवों पर इन्हीं ऐतिहासिक सीढ़ियों से होकर मुख्य मंदिर में प्रवेश करते हैं.

12वीं सदी का शिला रूप और प्रभु पांडुरंग के दिव्य दर्शन

प्रधान मंदिर के बाह्य कक्ष में प्रभु को समर्पित की जाने वाली नैवेद्य और पूजा सामग्री संचित की जाती है. पांडुरंग प्रभु का यह शिला रूप 12वीं-13वीं शताब्दी का बताया जाता है, जो अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी है. भक्तजन प्रभु विट्ठल के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य बनाते हैं. ‘ओम नमो आभेद जन रक्षकाई’ के मंत्रोच्चार के साथ भक्त प्रभु की शरण में जाते हैं. ऐसा माना जाता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से प्रभु विट्ठल के दरबार में हाजिरी लगाता है, करुणासागर पांडुरंग उसकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और उसके जीवन को सुख-समृद्धि से भर देते हैं.



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