Israel Election Process: इजरायल में कैसे होते हैं चुनाव? भारत से कितनी अलग है वोटिंग प्रणाली, जानिए सरकार बनाने का पूरा गणित

Israel Election Process: इजरायल में कैसे होते हैं चुनाव? भारत से कितनी अलग है वोटिंग प्रणाली, जानिए सरकार बनाने का पूरा गणित


Israel Election Process: इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव होने जा रहे हैं. पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी संघर्ष और राजनीतिक तनाव के बीच होने वाले इन चुनावों पर पूरी दुनिया की नजर है. अक्टूबर 2023 में हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान के साथ हुए संघर्ष ने इजरायल की सुरक्षा और राजनीति को काफी प्रभावित किया है. ऐसे में यह चुनाव देश की भावी राजनीतिक दिशा तय करने के लिहाज से अहम माना जा रहा है.

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर भी सबकी नजर रहेगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इजरायल में चुनाव भारत से बिल्कुल अलग तरीके से होते हैं? भारत में जहां मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुनते हैं, वहीं इजरायल में लोग सीधे किसी उम्मीदवार को नहीं, बल्कि अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं. आइए समझते हैं कि इजरायल की चुनाव प्रणाली कैसे काम करती है और वहां सरकार बनाने का गणित भारत से कितना अलग है.

इजरायल की संसद को क्या कहते हैं?
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है. यह एकसदनीय संसद है, यानी यहां भारत की तरह दो सदन नहीं हैं. भारत में संसद लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनती है, जबकि इजरायल में कानून बनाने के लिए एक ही सदन है, जिसमें कुल 120 सदस्य होते हैं. इजरायल की स्थापना 1948 में हुई थी और देश की पहली संसद का चुनाव फरवरी 1949 में हुआ था. नेसेट का नाम हिब्रू भाषा के उस शब्द से आया है, जिसका अर्थ सभा या असेंबली होता है. इसकी 120 सीटें प्राचीन यहूदी परंपरा की एक प्रतिनिधि परिषद से जुड़ी ऐतिहासिक अवधारणा से प्रेरित हैं. नेसेट का सामान्य कार्यकाल चार साल का होता है. हालांकि, राजनीतिक अस्थिरता, गठबंधन में मतभेद या बजट पारित नहीं होने जैसी परिस्थितियों में संसद का कार्यकाल पूरा होने से पहले भी चुनाव कराए जा सकते हैं. इजरायल में गठबंधन सरकारों का बनना और उनका टूटना राजनीति का अहम हिस्सा रहा है.

इजरायल में कैसे डाला जाता है वोट?
इजरायल की चुनाव प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पूरे देश को एक ही राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है. भारत में लोकसभा चुनाव के लिए देश को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा गया है. हर क्षेत्र से एक सांसद चुना जाता है. इसके उलट, इजरायल में कोई मतदाता अपने शहर या इलाके के लिए किसी एक उम्मीदवार को सीधे नहीं चुनता. वह अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को वोट देता है. चुनाव से पहले हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक क्रमबद्ध सूची जारी करती है. इसे क्लोज्ड लिस्ट प्रणाली कहा जाता है. मतदाता जिस पार्टी को चुनते हैं, उसी पार्टी को मिले कुल वोटों के अनुपात में संसद की सीटें आवंटित होती हैं.

उदाहरण के लिए, अगर किसी पार्टी को देशभर में लगभग 10 प्रतिशत वोट मिलते हैं, तो उसे 120 सदस्यीय संसद में करीब 12 सीटें मिल सकती हैं. हालांकि, वास्तविक सीटों का बंटवारा चुनाव के नियमों और निर्धारित गणना पद्धति के अनुसार होता है. मतदान के दौरान मतदाता अपनी पसंद की पार्टी के चुनाव चिह्न या अक्षरों वाली पर्ची चुनकर उसे लिफाफे में रखते हैं और मतपेटी में डालते हैं. इस तरह वोट सीधे किसी व्यक्ति के बजाय राजनीतिक दल के पक्ष में दर्ज होता है.

छोटी पार्टियों के लिए क्या हैं नियम?
इजरायल में किसी पार्टी को संसद में प्रवेश करने के लिए एक निश्चित न्यूनतम वोट प्रतिशत हासिल करना होता है. इसे चुनावी दहलीज कहा जाता है. वर्तमान व्यवस्था के तहत किसी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट प्राप्त करने होते हैं. इससे कम वोट मिलने पर पार्टी को संसद में सीट नहीं मिलती. इस नियम का सीधा असर छोटी पार्टियों पर पड़ता है. उन्हें चुनाव से पहले अपने समर्थन को मजबूत करना पड़ता है और कई बार दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन या विलय का रास्ता भी चुनना पड़ता है.

भारत में भी चुनाव लड़ने और राजनीतिक दलों की मान्यता से जुड़े नियम हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को संसद में सीट पाने के लिए पूरे देश में एक निश्चित न्यूनतम वोट प्रतिशत हासिल करना अनिवार्य नहीं है. भारत में किसी निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलने पर वह जीत सकता है, भले ही उसे कुल मतों का 50 प्रतिशत से कम हिस्सा मिला हो.

61 सीटें क्यों हैं सरकार बनाने के लिए जरूरी?
इजरायल की संसद में कुल 120 सीटें हैं. ऐसे में बहुमत हासिल करने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए. यहां सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी का नेता अपने आप प्रधानमंत्री नहीं बन जाता. अगर कोई पार्टी अकेले 61 सीटें नहीं जीत पाती, तो उसे दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ती है. चुनाव के बाद इजरायल के राष्ट्रपति विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से बातचीत करते हैं. इसके बाद उस नेता को सरकार बनाने का मौका दिया जाता है, जिसके पास संसद में पर्याप्त समर्थन जुटाने की सबसे ज्यादा संभावना होती है.

यही वजह है कि इजरायल में चुनाव परिणाम आने के बाद भी सरकार गठन को लेकर बातचीत कई दिनों या हफ्तों तक चल सकती है. छोटी पार्टियां भी गठबंधन में शामिल होकर सरकार के गठन में अहम भूमिका निभा सकती हैं. उनकी सीटें कम होने के बावजूद सरकार बनाने के लिए उनका समर्थन निर्णायक साबित हो सकता है. भारत में भी गठबंधन सरकारें बनती हैं और प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत साबित करना होता है. हालांकि, भारत में मतदाता अपने क्षेत्र से सीधे सांसद चुनते हैं, जबकि इजरायल में पार्टी को मिले राष्ट्रीय वोटों के अनुपात में संसद की सीटें तय होती हैं.

इजरायल में समय से पहले चुनाव क्यों होते हैं?
इजरायल की संसद का कार्यकाल चार साल का है, लेकिन राजनीतिक मतभेदों के कारण समय से पहले चुनाव होने की संभावना बनी रहती है. अगर गठबंधन में शामिल पार्टियां किसी अहम मुद्दे पर सहमत नहीं होतीं, तो सरकार का बहुमत कमजोर पड़ सकता है. इसके अलावा, अगर निर्धारित समयसीमा के भीतर बजट पारित नहीं होता, तो संसद भंग होने और नए चुनाव की स्थिति पैदा हो सकती है. कुछ परिस्थितियों में संसद खुद को भंग करने का कानून भी पारित कर सकती है. नियमों के तहत प्रधानमंत्री भी आवश्यक प्रक्रिया पूरी करके संसद भंग करने की पहल कर सकते हैं.

इजरायल की राजनीति में सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, धार्मिक मुद्दे और फिलिस्तीन के साथ संघर्ष जैसे विषय अक्सर चुनावी बहस के केंद्र में रहते हैं. मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बेंजामिन नेतन्याहू की लोकप्रियता, उनकी सरकार के फैसले और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर जनता की राय चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है.

भारत और इजरायल की चुनाव प्रणाली में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
भारत और इजरायल दोनों संसदीय लोकतंत्र हैं, लेकिन चुनाव कराने के तरीके में बड़ा अंतर है. भारत में लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटों के लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव होते हैं. मतदाता अपने क्षेत्र से उम्मीदवार चुनते हैं और सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है. इसके बाद बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन केंद्र में सरकार बनाता है.

इजरायल में पूरा देश एक राष्ट्रीय निर्वाचन क्षेत्र है और मतदाता राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं. पार्टी को मिले वोटों के अनुपात में उसे सीटें मिलती हैं. सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय नेसेट में 61 सीटों का समर्थन जरूरी है. इस व्यवस्था में छोटी पार्टियों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. कुल मिलाकर, इजरायल का चुनाव केवल प्रधानमंत्री चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह तय करता है कि 120 सदस्यीय नेसेट में किस पार्टी या गठबंधन के पास सरकार चलाने की ताकत होगी. वहीं, भारत में मतदाता पहले अपने क्षेत्र का सांसद चुनते हैं और फिर लोकसभा में बहुमत के आधार पर सरकार बनती है. यही दोनों देशों की चुनाव प्रणाली के बीच सबसे अहम अंतर है.



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