सिर्फ सर्बिया नहीं… साउथ कोरिया से श्रीलंका तक युवाओं के 7 बड़े आंदोलन, जिनसे हिली सरकारें

सिर्फ सर्बिया नहीं… साउथ कोरिया से श्रीलंका तक युवाओं के 7 बड़े आंदोलन, जिनसे हिली सरकारें


यूरोप के देश सर्बिया में छात्र आंदोलन ने सरकार को ही बदल दिया.ये प्रदर्शन एक रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे में 16 लोगों की मौत के बाद शुरू हुए थे. छात्रों ने सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. यहां से ऐसा आंदोलन शुरू हुआ जिसने 14 साल के शासन का अंत कर दिया. अलेक्जेंडर वुविच को चुनाव में हार का सामन करना पड़ा. यह पहली बार नहीं जब किसी देश में इस तरह छात्रों के आंदोलन ने सत्ता बदल दी हो. इससे 26 साल पहले सर्बिया में ही ऐसा एक और आंदोलन हुआ था. नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में तो हाल ही में इस तरह के आंदोलन सामने आए. फिलीपींस और साउथ कोरिया भी इस तरह के आंदोलनों के गवाह बन चुके हैं, जिन्होंने सत्ता की जड़ों को हिला दिया.

1- नेपाल, 2025 : यहां सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध के खिलाफ युवाओं ने प्रदर्शन शुरू किए. धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक परिवारों के विशेषाधिकारों के खिलाफ युवाओं का गुस्सा पनपा. आंदोलन हिंसक हुए. सुरक्षाबलों की कार्रवाई में कई लोगों की जान गई. हालात अनियंत्रित होते देख प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने 9 सितंबर 2025 को इस्तीफा दे दिया.

2- बांग्लादेश, 2024 : यहां सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ विश्विवद्यालयों के छात्रों ने आंदोलन शुरू किया. पुलिस ने इसे दबाने का प्रयास किया और प्रदर्शनकारियों पर हमले किए गए तो यह एक बड़ा आंदोलन बन गया. हालात यहां तक पहुंच गए कि प्रधानमंत्री आवास पर युवाओं का कब्जा हो गया. आंदोलनकारियों का गुस्सा देखकर शेख हसीना ने पीएम पद से इस्तीफा दिया. गुस्सा शांत न होने पर उन्हें देश छोड़ना पड़ा.

3- श्रीलंका, 2022: विदेशी मुद्रा संकट, पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और खाद्य पदार्थों में महंगाई की वजह से जनता में गुस्सा पनपा. छात्रों ने प्रदर्शन की अगुवाई की. इसमें अन्य नागरिक भी शामिल हुए. हिंसक प्रदर्शनों के कई चरण के बाद 9 जुलाई 2022 को प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास और कार्यालय पर कब्जा कर लिया. राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश छोड़कर चले गए और 14 जुलाई को उनका इस्तीफा स्वीकार किया गया. बाद में संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को नया राष्ट्रपति चुन लिया.

4- सर्बिया, 2000 : सर्बिया मे 1998 में छात्रों ने स्लोबोदान मिलोशेविच के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन शुरू किया था. यह इतना प्रभावी था कि सत्ता की जड़ें हिल गईं थीं. सितंबर 2000 में राष्ट्र चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार वोजिस्लाव कोस्तुनित्सा को जीत हासिल हुई. हालांकि नतीजों को विवादित बताया गया. इसके बाद आंदोलन ने और तेजी पकड़ी. 5 अक्टूबर को बेलग्रेड में विशाल प्रदर्शन हुए. यह हिंसक आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने कई सरकारी संस्थानों पर कब्जा कर लिया. इसके बाद स्लोबोदान को अपनी हार स्वीकार कर सत्ता छोड़नी पड़ी.

5- बांग्लादेश, 1990: शेख हसीना के खिलाफ हुआ आंदोलन पहली बार नहीं था. इससे पहले 1990 में राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद इरशाद के शासन के खिलाफ छात्र समूहों, विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने आंदोलन किया था. बड़े प्रदर्शनों और हड़तालों के बीच इरशाद को इस्तीफा देना पड़ा था. फरवरी 1991 में चुनाव हुए और संसदीय लोकतंत्र की बहाली का रास्ता खुला.

6- दक्षिण कोरिया, 1987: यहां छात्र पार्क चोल की हिरासत में मौत के बाद लोगों का गुस्सा ऐसा पनपा की सड़कों पर सैलाब आ गया. विपक्ष के साथ आम नागरिक भी गुस्से में थे. 1987 के इस आंदोलन के दाबाब में सरकार को आखिरकार प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव की मांग स्वीकार करनी पड़ी. हालांकि राष्ट्रपति उसी समय नहीं हटे, लेकिन आंदोलन ने राजनीतिक सुधार और अधिक प्रतिस्पर्धी चुनाव का रास्ता बनाया.

7-फिलीपींस, 1986: यहां तनाशाह मार्कोस के खिलाफ लोगों का गुस्सा पनपा. छात्र, नागरिक, धार्मिक संगठन और सेना सब साथ आए. यहां मार्कोस दो दशक से सत्ता में काबिज थे. फरवरी 1986 के विवादित चुनाव के बाद कोराजोन एक्विनो के समर्थन में लाखों लोग सड़कों पर उतरे. आखिर में मार्कोस को देश छोड़कर जाना पड़ा. एक्विनो राष्ट्रपति बनीं.

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