पीयूष ने क्लाइमेट फाइनेंस पर खूब सुनाया, कौन देश कितना कार्बन उत्सर्जन करता है
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केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स की तीखी आलोचना की है. उन्होंने कहा कि इससे बुनियादी ढांचे की लागत बढ़ेगी और यूरोपीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी. बर्लिन में आयोजित एक डिबेट में उन्होंने विकसित देशों की तीखी आलोचना की. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन देश सबसे अधिक कार्बन का उत्सर्जन करता है और उसे थामने के लिए किसको अधिक पैसे खर्च करने चाहिए.
बर्लिन में जलवायु परिवर्तन पर डिबेट में भाग लेते पीयुष गोयल. फोटो- स्क्रीन शॉट.
जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया के इन दिनों खूब बहस चल रही है. दुनिया भर के देश इसका असर भी देखने लगे हैं. ऐसे में विकसित देश कार्बन उत्सर्जन घटाने पर जोर दे रहे हैं, जबकि भारत जैसे विकासशील देशों का सवाल है कि इसकी कीमत कौन चुकाएगा? भारत का तर्क है कि अमीर देशों ने दशकों तक कोयले और दूसरे जीवाश्म ईंधनों के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था खड़ी की. अब वे पर्यावरण के नाम पर विकासशील देशों के उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं.
पिछले दिनों बर्लिन में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसी मुद्दे पर यूरोपीय संघ को जमकर सुनाया. उन्होंने कहा कि स्टील पर कार्बन टैक्स और लगातार बढ़ते नियम यूरोप की अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकते हैं. महंगे इस्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट से बुनियादी ढांचे की लागत बढ़ेगी और यूरोपीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी. उनके इन तर्क का वीडियो खूब वायरल हो रहा है. वह एक राउंड टेबल पर यूरोपीय देशों के नेताओं के साथ बैठे हैं और बहुत सहज भाव से भारत की बात रख रहे हैं. उनके इस बयान के वायरल होने पर सवाल उठ रहे हैं कि दुनिया में आज की तारीख में भी सबसे ज्यादा कार्बन का उत्सर्जन कौन करता है, और इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है.
कौन देश कितना कार्बन उत्सर्जन करता है?
जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में चीन दुनिया में सबसे आगे है. अमेरिका दूसरे और भारत तीसरे स्थान पर हैं. 2024 के आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक उत्सर्जन में प्रमुख देशों और क्षेत्रों की हिस्सेदारी इस प्रकार है.
- चीन: करीब 31.8%.
- अमेरिका: करीब 12.7%.
- भारत: करीब 8.3%.
- यूरोपीय संघ: करीब 6.3%.
- रूस: करीब 4.6%.
ये आंकड़े जीवाश्म ईंधन और इंडस्ट्री से होने वाले कार्बन उत्सर्जन के हैं. भारत की दलील है कि दुनिया की करीब 17 फीसदी आबादी उसके यहां रहती है, जबकि इस श्रेणी के वैश्विक उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी करीब 8.3 फीसदी है. हालांकि, कुल उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अलग-अलग पैमाने हैं.
यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स पर क्यों भड़के गोयल?
यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के तहत कुछ आयातित उत्पादों के उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर कार्बन टैक्स लागत लागू होती है. इस व्यवस्था के दायरे में स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र आते हैं. भारत को आशंका है कि इससे उसके इस्पात, एल्युमिनियम और दूसरे उत्पादों की यूरोपीय बाजार में लागत बढ़ सकती है. गोयल ने कहा कि यूरोपीय संघ लगातार नियम और पाबंदियां बढ़ाकर अपने उद्योगों को ही महंगा बना रहा है. इसका असर सड़कों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और दूसरी बुनियादी परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है. यूरोपीय संघ का तर्क है कि उसके उद्योगों पर कार्बन लागत लागू है, लेकिन आयातित उत्पादों पर कार्बन टैक्स नहीं लगाया जाएगा तो कंपनियां उत्पादन उन देशों में स्थानांतरित कर सकती हैं जहां पर्यावरणीय नियम कम सख्त हैं. इसे कार्बन लीकेज कहा जाता है. सीबीएएम का मकसद इस जोखिम को कम करना है.
क्लाइमेट फाइनेंस पर क्या है विवाद?
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा, नई तकनीक और आपदाओं से बचाव पर भारी निवेश करना पड़ता है. इसी जरूरत को देखते हुए विकसित देशों ने विकासशील देशों के लिए सालाना 100 अरब डॉलर का जलवायु फाइनेंस जुटाने का लक्ष्य रखा था. इसे 2020 तक पूरा किया जाना था. यह लक्ष्य पहली बार 2022 में पूरा हुआ, जब जलवायु वित्त 115.9 अरब डॉलर तक पहुंचा. 2024 में यह रकम बढ़कर 136.7 अरब डॉलर हो गई.
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