यूरोप में समंदर से बनेगी बिजली, भारत के लिए खुल सकता है कमाई का मौका

यूरोप में समंदर से बनेगी बिजली, भारत के लिए खुल सकता है कमाई का मौका


Agency:एजेंसियां

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यूरोप अपने समंदरों में विशाल पवन चक्कियां लगाकर बिजली बनाने जा रहा है, जिसका फायदा उठाने के लिए सिंगापुर की कंपनियों ने बिसात बिछा दी है. भारत के कोचीन शिपयार्ड जैसी कंपनियों और गुजरात-तमिलनाडु में शुरू होने वाले स्वदेशी विंड प्रोजेक्ट्स के जरिए भारतीय कारोबारियों के लिए भी इस नए बाजार में बंपर कमाई के दरवाजे खुल सकते हैं.

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यूरोपीय देश अपने समुद्र में लगा रहे व‍िंड एनर्जी प्रोजेक्‍ट्स.

यूरोप अब अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए समंदर के बीचों-बीच विशाल पवन चक्कियां (Windmills) लगाकर बिजली पैदा करने की बड़ी तैयारी में जुटा है. इस पूरे प्रोजेक्ट में सिर्फ बिजली बनाने वाली कंपनियों की ही चांदी नहीं होगी, बल्कि बड़े-बड़े समुद्री जहाज बनाने, समंदर में भारी-भरकम ढांचे खड़े करने और इन मशीनों की मरम्मत करने वाली कंपनियों के लिए भी अरबों के वारे-न्यारे होने वाले हैं.क्‍योंक‍ि समुद्र में पवन चक्कियां लगाने, उन्हें चालू रखने और उनकी मरम्मत करने के लिए खास तरह के जहाजों और भारी मरीन इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की जरूरत होती है. यही काम भारतीय कंपनियां करती हैं. सिंगापुर की कंपनियों ने तो इस मौके को भुनाने के लिए अभी से कमर कस ली है.लेकिन भारतीय कंपनियों के ल‍िए भी यह बड़ा कमाई का मौका होने वाला है.

ब्‍लूमबर्ग की र‍िपोर्ट के मुताबिक- यूरोप के नौ देशों ने एक बड़ा फैसला लेते हुए उत्तरी सागर में 2050 तक 300 गीगावाट की ऑफशोर विंड यानी समुद्री पवन ऊर्जा क्षमता डेवलप करने पर सहमति जताई थी. यानी समंदर के सीने पर बड़े पैमाने पर पवन ऊर्जा संयंत्र लगाए जाएंगे. चूंकि समंदर के भीतर टर्बाइन लगाने के लिए बेहद मजबूत ढांचे, जमीन तक बिजली लाने के लिए अंडरवाटर केबल और बड़े ट्रांसमिशन प्लेटफॉर्म चाहिए होते हैं, इसलिए इस काम में महारत रखने वालों की भारी डिमांड है. सिंगापुर के पास तेल और गैस निकालने के लिए बड़े समुद्री प्लेटफॉर्म और विशेष जहाज बनाने का पुराना और तगड़ा अनुभव है. इसी को देखते हुए सिंगापुर की सरकारी व्यापार एजेंसी एंटरप्राइज सिंगापुर ने 10 सितंबर 2026 को साफ कर दिया कि उनकी समुद्री इंजीनियरिंग कंपनियां यूरोप के इस ऑफशोर विंड मार्केट से पैदा होने वाले बंपर कारोबारी मौकों को लपकने की पूरी कोशिश कर रही हैं.

भारत के लिए कहां मौका?

हमारी श‍िपब‍िल्‍डिंग और र‍िपेयर इंडस्‍ट्री को इसका सबसे बड़ा फायदा होने वाला है.अभी 25 सितंबर 2025 को ही सिंगापुर की कंपनी सीट्रियम ऑफशोर टेक्नोलॉजी ने भारत के कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड के बीच समुद्री क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए एक अहम समझौता क‍िया था. इसका फोकस एशियाई ग्राहकों के लिए जहाजों और समुद्री ढांचों की मरम्मत और रखरखाव का काम करना है. इससे साफ संकेत मिलता है कि भारतीय शिपयार्ड विदेशी कंपनियों की एडवांस तकनीक का इस्तेमाल करके यूरोप या अन्य बड़े समुद्री प्रोजेक्ट्स की सप्लाई चेन का हिस्सा बन सकते हैं. इसके अलावा, भारत भारी धातु के ढांचे, केबल उपकरण और मरीन इंजीनियरिंग सेवाएं देकर भी इस बाजार में अपनी मजबूत जगह बना सकता है.

भारत खुद भी समंदर से बिजली बनाने में पीछे नहीं

भारत सिर्फ विदेशी ठेकों के भरोसे नहीं बैठा है, बल्कि वह अपने ही समंदरों में विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स लगा रहा है. भारत सरकार ने गुजरात और तमिलनाडु के समुद्री तटों पर 1,000 मेगावाट क्षमता वाली शुरुआती ऑफशोर विंड परियोजनाओं के लिए 6,853 करोड़ रुपये की विशेष आर्थिक मदद को अपनी हरी झंडी दे दी है. इसके अलावा, इस काम के लिए बंदरगाहों पर जरूरी सुविधाएं विकसित करने के लिए 600 करोड़ रुपये का अलग से बजट भी रखा गया है. जब भारत अपने खुद के समंदर में ये पवन चक्कियां लगाएगा, तो यहां भी विशेष जहाजों, मजबूत टर्बाइन ढांचों और बड़े रखरखाव की जरूरत पड़ेगी. ऐसे में भारतीय कंपनियों को अपने ही देश में काम करने का बड़ा तजुर्बा मिलेगा.



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