Jhunjhunu: एक की पेंशन, दूसरे की दक्षिणा, झुंझ़नूं के दो दोस्तों ने ऐसे बदली 100 से अधिक दिव्यांगों की जिंदगी

Jhunjhunu: एक की पेंशन, दूसरे की दक्षिणा, झुंझ़नूं के दो दोस्तों ने ऐसे बदली 100 से अधिक दिव्यांगों की जिंदगी


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Jhunjhunu Unique Initiative Of Two Friends: एक दोस्त खुद दिव्यांग है और दूसरा पूजा-पाठ कर परिवार चलाता है, लेकिन दोनों ने अपनी छोटी सी कमाई से जरूरतमंदों की जिंदगी बदलने का बीड़ा उठाया है. झुंझुनूं के सूरजगढ़ निवासी अशोक सैन और जितेंद्र महमिया दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने से लेकर बुजुर्गों की मदद करने तक कई सामाजिक कार्य कर रहे हैं. अशोक अपनी पेंशन और पार्षद भत्ते से सेवा करते हैं, जबकि जितेंद्र अपनी दक्षिणा का 20 प्रतिशत हिस्सा इस काम में लगाते हैं. दोनों की संस्था अब तक 100 से अधिक जरूरतमंदों तक मदद पहुंचा चुकी है. दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाने, ट्राई साइकिल उपलब्ध करवाने और इलाज में सहयोग करने के साथ उन्होंने निशुल्क स्पेशल स्कूल भी शुरू किया है. अब दोनों का सपना दिव्यांग बुजुर्गों के लिए आश्रम बनाना है. आर्थिक संसाधनों की कमी के बावजूद दोनों दोस्तों ने अपना सेवा अभियान जारी रखा है.

झुंझुनूं. हौसले बुलंद हों तो सीमित संसाधन भी बड़े बदलाव की नींव बन सकते हैं. दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा बड़ी आर्थिक ताकत की जरूरत नहीं होती, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और सेवा का जज्बा ही सबसे बड़ी पूंजी बन जाता है. इसकी मिसाल सूरजगढ़ के दो दोस्त पेश कर रहे हैं. इनमें एक खुद दिव्यांग हैं, जबकि दूसरे पंडिताई करते हैं. अपनी सीमित आय के बावजूद दोनों पिछले सात साल से दिव्यांग बच्चों और जरूरतमंद बुजुर्गों की जिंदगी संवारने में जुटे हैं. हम बात कर रहे हैं दिव्यांग आंचल सेवा समिति के अध्यक्ष अशोक सैन और सचिव जितेंद्र महमिया की. दोनों ने वर्ष 2017 में दिव्यांग बच्चों को शिक्षा देकर आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया था. इसके बाद से वे लगातार सेवा कार्यों में जुटे हुए हैं.

उनकी संस्था अब तक 100 से अधिक दिव्यांग बच्चों और वृद्धजनों की मदद कर चुकी है. जरूरतमंदों को इलाज से लेकर दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने और अन्य जरूरी सुविधाएं दिलाने तक में सहयोग किया जा रहा है. इस सेवा अभियान की सबसे खास बात यह है कि दोनों दोस्त इसके लिए अपनी जेब से खर्च करते हैं. संस्था अध्यक्ष अशोक सैन खुद दिव्यांग हैं. उन्हें मिलने वाली दिव्यांग पेंशन और नगरपालिका से मनोनीत पार्षद के रूप में मिलने वाले भत्ते की राशि का उपयोग वे दिव्यांगजनों की मदद के लिए करते हैं. वहीं, संस्था के सचिव जितेंद्र महमिया पंडिताई करते हैं. पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद मिलने वाली दक्षिणा का 20 प्रतिशत हिस्सा वे संस्था के सेवा कार्यों में खर्च करते हैं. सीमित आय होने के बावजूद दोनों ने जरूरतमंदों की मदद का सिलसिला जारी रखा है. उनका उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि दिव्यांग बच्चों को शिक्षा और हुनर के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना भी है.

बस स्टैंड पर बनाया स्पेशल स्कूल

दिव्यांग बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से दोनों दोस्तों ने कस्बे के बाजार बस स्टैंड पर जीवन ज्योत मंद बुद्धि स्पेशल स्कूल शुरू किया. यहां दिव्यांग बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है. इसके साथ ही उन्हें रोजगार से जुड़ा हुनर सिखाने की दिशा में भी प्रयास किए जाते हैं. आर्थिक संसाधन सीमित होने के कारण फिलहाल यह स्कूल महीने में पांच दिन ही संचालित हो पाता है. संस्था का मानना है कि यदि सरकार की ओर से आर्थिक सहायता मिल जाए तो स्कूल को नियमित रूप से चलाया जा सकता है. इससे अधिक बच्चों को शिक्षा और प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा.

खुद दिव्यांग हैं अशोक इसलिए समझते हैं दर्द

संस्था अध्यक्ष अशोक सैन का कहना है कि दिव्यांग होने के कारण उन्होंने खुद कई परेशानियों का सामना किया है. रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों और सरकारी प्रक्रियाओं में होने वाली दिक्कतों को उन्होंने करीब से महसूस किया है. इसी अनुभव ने उन्हें दूसरे दिव्यांगजनों की मदद के लिए प्रेरित किया. उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले दिव्यांग बच्चों और बुजुर्गों तक जरूरी सुविधाएं पहुंचाना बड़ी चुनौती है. शहरों की तुलना में गांवों और ढाणियों में रहने वाले कई दिव्यांगजन जानकारी और संसाधनों के अभाव में सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते. इसके बाद अशोक सैन ने अपने मित्र जितेंद्र महमिया के साथ मिलकर दिव्यांग आंचल सेवा समिति के माध्यम से सेवा कार्य शुरू किए. दोनों गांव-गांव और ढाणियों में जाकर दिव्यांग बच्चों के बारे में जानकारी जुटाते हैं और जरूरत के अनुसार उनकी मदद करने का प्रयास करते हैं.

प्रमाण पत्र से लेकर ट्राई साइकिल तक में करते हैं सहयोग

संस्था की ओर से दिव्यांगजनों के दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है. इसके अलावा जरूरतमंदों को नि:शुल्क ट्राई साइकिल उपलब्ध करवाने में भी सहयोग किया जा रहा है. कोरोना काल में भी संस्था ने जरूरतमंद लोगों की आर्थिक मदद की थी. दोनों दोस्तों का प्रयास रहता है कि कोई दिव्यांग व्यक्ति केवल जानकारी या संसाधनों के अभाव में जरूरी सुविधाओं से वंचित न रहे.

दिव्यांग बुजुर्गों के लिए आश्रम बनाने का सपना

अशोक सैन और जितेंद्र महमिया अब दिव्यांग वृद्धजनों के लिए आश्रम बनाने की दिशा में भी प्रयासरत हैं. उनका मानना है कि ऐसे बुजुर्गों को विशेष देखभाल और सहारे की जरूरत होती है, जिनके पास परिवार या संसाधनों का पर्याप्त सहयोग नहीं है. संस्था आर्थिक तंगी के बावजूद अपने स्तर पर सेवा कार्य जारी रखे हुए है. दोनों दोस्तों को उम्मीद है कि सरकारी सहायता मिलने पर स्पेशल स्कूल को प्रतिदिन संचालित करने और दिव्यांग बुजुर्गों के लिए आश्रम बनाने का सपना भी साकार हो सकेगा. सूरजगढ़ के इन दो दोस्तों की पहल बताती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े पद या बड़ी पूंजी से ज्यादा जरूरी संवेदनशील सोच और सेवा का संकल्प है. एक दोस्त अपनी पेंशन और दूसरा पूजा की दक्षिणा से दिव्यांगों की जिंदगी में उम्मीद जगा रहा है.



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