झुंझुनूं: देश की रक्षा के लिए सेना में सेवाएं देने वाले कैप्टन हंसराज महला आज भी सेवा और समर्पण की मिसाल बने हुए हैं. 87 वर्ष की उम्र में भी उनका जज्बा कम नहीं हुआ है. सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपनी पेंशन और जीवनभर की जमा पूंजी गांव के विकास और लोगों की सुविधाओं पर खर्च करने का संकल्प लिया. इसी संकल्प के तहत वे अब तक 50 लाख रुपए से अधिक की राशि सामाजिक सरोकारों और विकास कार्यों पर खर्च कर चुके हैं.
कैप्टन महला ने गांव में चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए करीब 35 लाख रुपए खर्च कर राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय का भव्य भवन बनवाया. यह भवन मरीजों, चिकित्सकों और अन्य कर्मचारियों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर तैयार करवाया गया. खास बात यह है कि जिले के 170 आयुर्वेदिक औषधालयों में भाटीवाड़ का यह भवन सबसे बड़ा बताया जा रहा है.
औषधालय में बारिश बारिश के दिनों में टपकता था छत
कैप्टन हंसराज महला बताते हैं कि गांव का राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय पहले मुख्य बाजार के पास केवल दो कमरों में संचालित होता था. बारिश के दिनों में छत से पानी टपकता था. इससे मरीजों के साथ चिकित्सकों और अन्य स्टाफ को भी परेशानी होती थी. लोगों की यह समस्या उनसे देखी नहीं गई. उन्होंने औषधालय में कार्यरत चिकित्सक के सामने नया भवन बनवाने का प्रस्ताव रखा. प्रस्ताव सरकार तक पहुंचा और नए मापदंडों के अनुसार भवन निर्माण की स्वीकृति मिल गई. इसके बाद कैप्टन महला ने अपनी जमा पूंजी से भवन का निर्माण करवाकर सरकार को सौंप दिया.
नवंबर 2021 में इसका उद्घाटन हुआ. करीब 35 लाख रुपए की लागत से बने इस भवन में छह कमरे, हॉल, शौचालय, खुला स्थान और विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधों की व्यवस्था है. औषधालय के चिकित्सा अधिकारी प्रभारी डॉ. चंद्रशेखर भार्गव ने बताया कि झुंझुनूं जिले में कुल 170 आयुर्वेदिक औषधालय संचालित हैं. इनमें से अधिकांश भवन जर्जर स्थिति में हैं. ऐसे में भाटीवाड़ में भामाशाह कैप्टन हंसराज महला की ओर से बनवाया गया भवन जिले में अपनी तरह का सबसे बड़ा भवन है.
साढ़े तीन हजार रुपए पेंशन से शुरू हुआ सफर
कैप्टन हंसराज महला वर्ष 1988 में सेना से सेवानिवृत्त हुए थे. उस समय उनकी मासिक पेंशन महज साढ़े तीन हजार रुपए थी, जो अब बढ़कर करीब 70 हजार रुपए हो गई है. उन्होंने अपनी पेंशन और बचत को केवल निजी जरूरतों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे गांव के विकास का माध्यम बनाया. वर्ष 2012 में उन्होंने अपनी पत्नी पार्वती देवी के नाम पर पांच लाख रुपए खर्च कर विश्राम गृह का निर्माण करवाया. इसके अलावा मोक्षधाम में टिनशेड, सरकारी स्कूल में कमरे और शौचालय सहित अन्य विकास कार्यों में भी आर्थिक सहयोग दिया. झुंझुनूं में किसान द्वार का निर्माण करवाने में भी उनका योगदान रहा है.
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