Tu Hai Meri Kiran Movie Review: समय और पैसे की बर्बादी है सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की ‘तू है मेरी किरण’

Tu Hai Meri Kiran Movie Review: समय और पैसे की बर्बादी है सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की ‘तू है मेरी किरण’


नई दिल्ली. जब भी बॉलीवुड टाइम ट्रैवल और साइकोलॉजिकल सस्पेंस थ्रिलर जैसे मुश्किल टॉपिक पर काम करता है, तो दर्शकों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं. डायरेक्टर करण रावल की नई फिल्म ‘तू है मेरी किरण’ एक अनोखे और दिलचस्प कॉन्सेप्ट पर आधारित है, जिसमें एक पुराना फ्लिप फोन 10 साल के अंतर (2016 और 2026) वाले दो लोगों को जोड़ता है. एक मजबूत प्लॉट आइडिया और कलाकारों की शानदार परफॉर्मेंस के बावजूद फिल्म अपनी ढीली स्क्रिप्ट, बिना डायरेक्शन वाली कहानी और लॉजिकल कमियों से दर्शकों को निराश करती है.

कहानी
‘तू है मेरी किरण’ 28 सितंबर 2026 को शुरू होती है. किरण (सोनाक्षी सिन्हा), एक जानी-मानी राइटर अपने पति रायन (अंकित गुप्ता) के साथ शांति और खुशहाल जिंदगी जी रही है. उसकी जिंदगी अचानक बदल जाती है जब उसे अपनी अलमारी में एक पुराना, खराब फ्लिप फोन मिलता है. अचानक उसे समर (जहीर इक़बाल) नाम के एक अनजान आदमी का फोन आता है. बातचीत के दौरान, किरण को पता चलता है कि समर आज में नहीं, बल्कि 10 साल पहले 2016 में जी रहा है. जब वे एक थिएटर में मिलने का प्लान बनाते हैं, तो किरण को अपने सामने ‘धुरंधर 2’ चलती हुई मिलती है, जबकि समर के थिएटर में ‘एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ दिखाई जा रही होती है. इस तरह उन्हें पता चलता है कि वे एक दशक से बातचीत कर रहे हैं. शुरू में दो अलग-अलग टाइम पीरियड के लोगों का फोन के जरिए कनेक्ट होने का आइडिया दिलचस्प लगता है. लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, समर की असली पहचान सामने आती है. वह एक क्रिमिनल बैकग्राउंड और साइकोटिक सोच वाला आदमी है, जो किरण के जरिए भविष्य पर दांव लगाकर पैसे कमाने की कोशिश करता है. यह दीवानगी बाद में एक खतरनाक और जुनूनी प्यार में बदल जाती है. जब किरण उससे दूरी बनाने लगती है, तो समर उसे ब्लैकमेल करना शुरू कर देता है और 2016 के अपने अतीत में उसे फंसाकर, उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद करने का पक्का इरादा कर लेता है. कहानी का आइडिया तो मजबूत था, लेकिन स्क्रीनप्ले इतना ढीला और उलझा हुआ है कि दर्शक आखिर तक लॉजिक ढूंढते रह जाते हैं. राइटर ने अपनी सुविधा के हिसाब से टाइम ट्रैवल के नियमों को तोड़-मरोड़ दिया है, जिससे कहानी का सस्पेंस थ्रिलर का मकसद ही खत्म हो जाता है.

एक्टिंग
कमजोर स्क्रिप्ट के बावजूद, अगर फिल्म किसी मामले में बेहतरीन है, तो वह है इसके एक्टर्स की एक्टिंग. असल जिंदगी की पति-पत्नी जोड़ी सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल ने अपने-अपने किरदारों को स्क्रीन पर पूरी ईमानदारी से निभाया है.

सोनाक्षी सिन्हा: किरण के रोल में सोनाक्षी ने शांत और गंभीर परफॉर्मेंस दी है. वह हर सीन को अपने इमोशंस और आंखों के एक्सप्रेशन से दिखाती हैं, 2016 की बेफिक्र किरण के तौर पर भी और 2026 की परेशान, डरी हुई, लेकिन मजबूत औरत के तौर पर भी.

जहीर इकबाल: जहीर ने समर (टॉक्सिक और ऑब्सेसिव स्टॉकर) के नेगेटिव, मतलबी और जुनूनी शेड्स को शानदार ढंग से दिखाया है. एक साइको लवर के तौर पर उनकी बॉडी लैंग्वेज और डायलॉग डिलीवरी असरदार हैं.

सपोर्टिंग कास्ट: अंकित गुप्ता ने किरण के पति के रूप में अपने कम स्क्रीन टाइम में भी नेचुरल परफॉर्मेंस दी है. पुराने एक्टर जरीना वहाब और पूर्णेंदु भट्टाचार्य ने अपने छोटे रोल में भी डेडिकेशन दिखाया है, हालांकि खराब रोल राइटिंग के कारण उनके टैलेंट का कम इस्तेमाल हुआ है.

डायरेक्शन
डायरेक्टर करण रावल ने एक अनोखा सब्जेक्ट चुना, लेकिन वह पूरी तरह से चूक गए. टाइम ट्रैवल और साइकोलॉजिकल थ्रिलर जैसे जॉनर में डायरेक्शन के लिए सबसे पहली जरूरत सटीक कनेक्शन और लॉजिकल क्लैरिटी होती है. जहां करण रावल फिल्म के पहले हाफ में सस्पेंस बनाए रखने में कामयाब रहते हैं, वहीं दूसरे हाफ में कहानी पूरी तरह से अपनी पकड़ खो देती है. वह दो अलग-अलग टाइमलाइन के बीच सस्पेंस को ठीक से मैनेज नहीं कर पाए. एक थ्रिलर में जो डर, थ्रिल और शॉक फैक्टर होना चाहिए था, वह खराब डायरेक्शन की वजह से खत्म हो गया.

सिनेमैटोग्राफी
फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट ठीक-ठाक है. दो अलग-अलग दशकों (2016 और 2026) के बीच के अंतर को दिखाने के लिए जो कलर पैलेट, लाइटिंग और फ्रेमिंग का इस्तेमाल होना चाहिए था, वह काफी साधारण है. सिनेमैटोग्राफी में कोई खास एंगल या क्रिएटिव कैमरा वर्क नहीं है जो टाइम ट्रैवल का जादू या रहस्यमयी रोमांच पैदा कर सके. जासूसी और थ्रिलर सीन में भी विजुअल दर्शकों को लुभाने या उनमें डर पैदा करने में नाकाम रहे.

म्यूजिक
साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्मों में बैकग्राउंड स्कोर और म्यूजिक का अहम रोल होता है, जिससे सीन का टेंशन बढ़ जाता है. बदकिस्मती से ‘तू है मेरी किरण’ में म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर बहुत डल हैं. गानों की जगह कहानी की रफ्तार में रुकावट डालती है और थिएटर से निकलने के बाद कोई गाना ऐसा नहीं है जो याद रहे. बैकग्राउंड म्यूजिक सस्पेंस और डरावने सीन में जरूरी असर नहीं डाल पाता.

कमियां
बहुत खराब स्क्रिप्ट और लॉजिक की कमी: टाइम-बेंडिंग फोन कनेक्शन कैसे बनाया जाता है, इसका कोई ठोस आधार नहीं है.

दूसरे हाफ में स्पिलओवर: पहला हाफ जितना दिलचस्प था, इंटरवल के बाद कहानी बोरिंग, कन्फ्यूजिंग और खींचती हुई लगती है.

क्लाइमैक्स में थ्रिल की कमी: एक सस्पेंस थ्रिलर का क्लाइमैक्स जबरदस्त होना चाहिए, लेकिन एंडिंग बहुत कमजोर और बोरिंग है.

एक टॉक्सिक रिश्ते को बेवजह खींचना: समर का साइको बिहेवियर और स्टॉकिंग एंगल कहानी को थ्रिलर के बजाय सिरदर्द बना देता है.

अंतिम फैसला
शॉर्ट में ‘तू है मेरी किरण’ एक शानदार और दिलचस्प आइडिया पर बनी फिल्म है, लेकिन बहुत खराब स्क्रिप्ट और कमजोर डायरेक्शन ने इसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया है. हालांकि सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल ने अपनी परफॉर्मेंस से फिल्म को बचाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन सिर्फ एक्टिंग से फ्लॉप स्क्रीनप्ले को नहीं बचाया जा सकता. अगर आप लॉजिकल और टाइट सस्पेंस थ्रिलर के फैन हैं, तो यह फिल्म आपको बहुत निराश करेगी. इसे देखने के लिए थिएटर जाना समय और पैसे की पूरी बर्बादी जैसा लगता है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 1.5 स्टार.



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