Nainital: ऑटम सीजन में बदल जाता है नैनीताल का नजारा, जानिए आखिर क्यों झील से बाहर निकाली जाती हैं नावें?

Nainital: ऑटम सीजन में बदल जाता है नैनीताल का नजारा, जानिए आखिर क्यों झील से बाहर निकाली जाती हैं नावें?


नैनीताल: उत्तराखंड का नैनीताल अपनी खूबसूरत वादियों, ठंडे मौसम और नैनीझील में नौकायान के लिए देश-दुनिया में मशहूर है. यहां आने वाले पर्यटकों के लिए झील में नाव की सैर सबसे खास अनुभवों में से एक होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पर्यटकों को झील की सैर कराने वाली इन नावों को हर पर्यटन सीजन के लिए किस तरह तैयार किया जाता है? दरअसल, बरसात का मौसम समाप्त होने और ऑटम सीजन की शुरुआत के साथ ही नैनीताल के नाविकों की जिंदगी में भी बदलाव आने लगता है. जहां एक ओर पर्यटकों की आमद बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर नावों की मरम्मत और रखरखाव का काम तेज हो जाता है.

अक्टूबर महीने से नैनीताल में पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगती है. ऐसे में नैनीझील में नौकायान कराने वाले नाविक अपनी नावों को नए पर्यटन सीजन के लिए तैयार करने में जुट गए हैं. इन दिनों झील के किनारे नावों को बाहर निकालकर सुखाया जा रहा है. उनकी साफ-सफाई, रंगाई-पुताई और मरम्मत का काम किया जा रहा है, ताकि पर्यटकों को सुरक्षित और बेहतर नौकायान का अनुभव मिल सके. बरसात के दौरान लगातार पानी और नमी के संपर्क में रहने से नावों की लकड़ी पर असर पड़ता है. ऐसे में सर्दियों के पर्यटन सीजन से पहले नावों की अच्छी तरह जांच करना जरूरी हो जाता है. नाविक नावों में मौजूद दरारों को भरने, खराब लकड़ी बदलने और उनकी बाहरी सतह को मजबूत बनाने का काम कर रहे हैं.

लकड़ी से लेकर तांबे की कीलों तक

नाव मालिक समिति के सचिव नरेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि नावों की मरम्मत की प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं. सबसे पहले नावों को झील से बाहर निकालकर उनमें जमा सिल्ट और गंदगी साफ की जाती है. इसके बाद लकड़ी की स्थिति की जांच की जाती है और जहां जरूरत होती है, वहां खराब लकड़ी को बदल दिया जाता है. नावों में आई दरारों को भरने के लिए विशेष पोटीन तैयार की जाती है. इसके लिए पोटीन को पीसकर उसमें अलसी का तेल मिलाया जाता है. दरारों को भरने के बाद नावों पर वार्निश किया जाता है, जिससे उनकी सतह सुरक्षित रहती है और लकड़ी की देखभाल में मदद मिलती है.

इसके बाद नावों को धूप में सुखाया जाता है, पूरी तरह सूखने और जरूरी जांच के बाद ही उन्हें दोबारा झील में उतारा जाता है. उन्होंने बताया कि नावों की मजबूती के लिए तांबे की कीलों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें खास तौर से मुंबई से मंगवाया जाता है. उनके मुताबिक, एक नाव में लगभग आठ किलो तांबे की कीलें लग सकती हैं. नाव के आकार और मरम्मत की जरूरत के अनुसार खर्च अलग-अलग हो सकता है।

एक नई नाव बनाने में आता है 2.25 लाख रुपये तक खर्च

नैनीताल में नाव चलाना केवल पर्यटन से जुड़ा काम नहीं, बल्कि कई परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन भी है. नावों को सुरक्षित और बेहतर स्थिति में बनाए रखने के लिए नाव मालिकों को हर सीजन में समय, मेहनत और पैसा खर्च करना पड़ता है. नरेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, एक नई नाव तैयार करने में करीब 2.25 लाख रुपये तक का खर्च आता है. वहीं, तांबे की कीलों की कीमत लगभग तीन हजार रुपये प्रति किलो बताई गई है. इसके अतिरिक्त लकड़ी, अलसी का तेल, वार्निश और अन्य मरम्मत सामग्री पर भी खर्च होता है. नाव के आकार और उसमें किए जाने वाले काम के आधार पर कुल लागत कम या ज्यादा हो सकती है.

पर्यटन सीजन से नाविकों को कारोबार बढ़ने की उम्मीद

बरसात के दौरान नौकायान का कारोबार अपेक्षाकृत धीमा रहता है, लेकिन अक्टूबर से पर्यटकों की आमद बढ़ने के साथ नाविकों की व्यस्तता भी बढ़ जाती है. आने वाले दिनों में सर्दियों का मौसम और पर्यटन गतिविधियां उनके कारोबार के लिए महत्वपूर्ण रहने वाली हैं. इसी को देखते हुए नाविक अभी से अपनी तैयारियां पूरी करने में जुटे हैं. नाविकों को उम्मीद है कि इस बार ऑटम सीजन से शुरू होकर सर्दियों तक पर्यटन कारोबार बेहतर बना रहेगा. इससे नैनीझील में नौकायान से जुड़े लोगों को रोजगार और आमदनी का सहारा मिलेगा.



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