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Who is Hemlata Rawat Firozabad : फिरोजाबाद की हेमलता रावत दूसरी महिलाओं के लिए मिसाल हैं. मानसिक रूप से बीमार पति के लापता होने के बाद उन्होंने न सिर्फ अकेले दम पर अपने परिवार को संभाला, बल्कि खुद को आत्मनिर्भर भी बनाया. हेमलता लोकल 18 से बताती हैं कि जिंदगी में एक वक्त ऐसा आया जब सब कुछ बिखर गया. परेशानियों के बीच उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, लेकिन जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब वे स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ीं. वे कहती हैं कि समूह की बैठकों में जाने के बाद लगा कि वह भी कुछ बड़ा कर सकती हैं. समूह के जरिए ही उन्हें ब्यूटीपार्लर की ट्रेनिंग का मौका मिला.
फिरोजाबाद. हेमलता रावत की जिंदगी चुनौतियों से भरी है. उन्होंने पति के जाने के बाद न सिर्फ अकेले दम पर अपने परिवार को संभाला, बल्कि खुद को आत्मनिर्भर बनाकर दूसरी महिलाओं के लिए भी मिसाल बन गईं. उन्हें इसके लिए पुरस्कार भी मिले हैं. टूंडला के गांव बसई में रहने वाली हेमलता रावत लोकल 18 से बताती हैं कि जिंदगी में एक वक्त ऐसा आया जब पति घर से चले गए और सब कुछ बिखर गया. पति मानसिक रूप से बीमार थे, जिसके चलते वे फिर कभी लौटकर नहीं आए. पति के जाने के बाद दो बच्चों की जिम्मेदारी और घर का खर्च सबकुछ उनके कंधों पर आ गया था. परेशानियों के बीच उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. इससे थोड़ा-बहुत गुजारा तो चल रहा था, लेकिन जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब उन्हें स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ने का मौका मिला.
धीरे-धीरे जीता दिल
समूह की बैठकों में जाने के बाद लगा कि वह भी कुछ बड़ा कर सकती हैं. समूह के जरिए ही उन्हें ब्यूटी पार्लर की ट्रेनिंग का मौका मिला. मेहनत और लगन से काम सीखने के बाद उन्होंने अपने ही घर के एक छोटे से कमरे में ब्यूटीपार्लर खोल लिया. शुरुआत में ग्राहक कम थे, लेकिन उनके हाथों का हुनर और व्यवहार ने धीरे-धीरे लोगों का दिल जीता. अब उनके पार्लर में आसपास के इलाकों और टूंडला शहर से भी महिलाएं सजने-संवरने आती हैं.
अब जिंदगी पहले से आसान
हेमलता रावत कहती हैं कि करवाचौथ, दिवाली और शादियों के सीजन में उनके यहां सुबह से शाम तक भीड़ लगी रहती है. मेहंदी, मेकअप, हेयर कटिंग से लेकर ब्राइडल मेकअप तक, हर सेवा उनके पार्लर में मौजूद है. इस काम से उनकी जिंदगी बदल गई है. अब वह महीने में 40 से 50 हजार रुपये तक कमा लेती हैं. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च भी आसानी से उठा रही हैं और परिवार को एक बेहतर जीवन दे रही हैं. हेमलता की कहानी बताती है कि अगर समूह योजना का सही इस्तेमाल किया जाए, तो गांव की महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकती है.