लैब में बना आर्टिफिशियल सोना गिराएगा गोल्ड के दाम? मर्करी से कैसे सोना
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सालों में लैबोरेटरी में तैयार डायमंड के आने से असली प्राकृतिक हीरों के थोक दामों में 90 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है. इसी वजह से इन्वेस्टर्स और सराफा व्यापारी आशंकित हैं कि क्या सोने के साथ भी ऐसा ही होगा?
गोल्ड का खेल
हम किस्सों-किताबों में एलकेमिस्ट्स की बातें पढ़ते हैं. सदियों पुराना कीमियागरों का वह सपना, जिसमें किसी साधारण से धातु को सोने में बदलने की बात कही जाती थी. ये क्या अब हकीकत बनने जा रहा है? सैन फ्रांसिस्को में स्थित अमेरिकी टेक स्टार्टअप मैराथन फ्यूजन ने एक ऐसा दावा किया है जिसने दुनियाभर के सराफा बाजार और फाइनेंशियल जगत में खलबली मचा दी है.
कंपनी का दावा है कि उसने न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीक का इस्तेमाल करके लिक्विड मेटल यानी मर्करी को असली और स्टेबल गोल्ड में बदल दिया है. इस खबर के सामने आते ही यह बहस छिड़ गई है कि क्या लैब में बनने वाला सोना भविष्य में डायमंड की तरह असली सोने की कीमतों को धड़ाम कर देगा? क्या है यह पूरी तकनीक, स्टार्टअप का दावा और क्या सच में सस्ता होने वाला है सोना.
कैसे पारे से बना गोल्ड?
मैराथन फ्यूजन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि उसने हाई-रेट अल्केमी का प्रदर्शन किया है.
- न्यूट्रॉन बमबारी: इस प्रक्रिया के तहत पारे (Mercury-198) पर न्यूक्लियर फ्यूजन से पैदा हुए तेज न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है.
- परमाणु संरचना में बदलाव: न्यूट्रॉन टकराने से पारे का परमाणु एक न्यूट्रॉन खो देता है और ‘मर्करी-197’ में बदल जाता है. इसके बाद रेडियोधर्मी नुकसान की प्रक्रिया के जरिए 79 प्रोटॉन वाला ‘गोल्ड-197’ बनता है, जो कि सोने का इकलौता प्राकृतिक और स्थिर रूप है.
- CERN का रिकॉर्ड तोड़ा: कंपनी का दावा है कि उसने यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन (CERN) की तरफ से 2025 में बनाए गए पिछले रिकॉर्ड की तुलना में 10 गुना अधिक दर से सोना तैयार किया है.
क्या लैब-मेड सोने से हीरों की तरह गिरेगी सोने की कीमत?
इधर हाल-फिलहाल के सालों में लैबोरेटरी में तैयार हीरों (Lab Grown Diamonds) के आने से असली प्राकृतिक हीरों के थोक दामों में 90 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है. इसी वजह से इन्वेस्टर्स और सराफा व्यापारी आशंकित हैं कि क्या सोने के साथ भी ऐसा ही होगा? हालांकि बाजार एक्सपर्ट्स और वैज्ञानिकों का मानना है कि सोने की कीमतों के तुरंत क्रैश होने की संभावना बेहद कम है. इसके कुछ मुख्य वजह निम्न हैं.
- अधिक लागत और धीमा प्रॉसेस: CERN के रिकॉर्ड से 10 गुना तेज होने के बावजूद वर्तमान में प्रयोगशाला में महज 1 ग्राम सोना बनाने में सैकड़ों साल लग सकते हैं. यह कॉमर्शियल रूप से सोना निकालने की तुलना में अरबों गुना महंगा है.
- रेडियोधर्मिता और कूलिंग का समय: फ्यूजन से बने सोने को सुरक्षित रूप से संभालने योग्य बनाने के लिए वर्षों तक ‘कूलिंग पीरियड’ से गुजारना पड़ सकता है.
- कमर्शियल प्लांट की कमी: जिस फ्यूजन रिएक्टर्स Gigawatt-scale Tokamak के जरिए बड़े पैमाने पर सोना बनाने का मॉडल तैयार किया गया है, वे अभी व्यावसायिक स्तर पर अस्तित्व में ही नहीं हैं.
मार्केट पर क्या होगा असर?
वर्तमान में वैश्विक स्तर पर सोने की मांग केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और जियो पॉलिटिकल अनिश्चितताओं से तय होती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक कोई ऐसी तकनीक नहीं आ जाती जो कॉमर्शियल तरीके से माइन्स से सोना निकालने से भी सस्ती लागत में सोना बना सके, तब तक नैचुकल सोने का डॉमिनेंस बना रहेगा.
मैराथन फ्यूजन का यह प्रयोग विज्ञान और न्यूक्लियर इंजीनियरिंग की दुनिया में एक बड़ी उपलब्धि तो है, लेकिन आम यूजर को ‘सस्ता सोना’ मिलने में अभी भी कई दशकों का समय लग सकता है.