बेसहारा मीरा देवी की कहानी, कभी खाली पेट सोती थी, अब जीविका से जुड़कर बदली किस्मत

बेसहारा मीरा देवी की कहानी, कभी खाली पेट सोती थी, अब जीविका से जुड़कर बदली किस्मत


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बेसहारा मीरा देवी की कहानी, कभी खाली पेट सोती थी, जीविका से जुड़कर बदली किस्मत

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Women Struggle Story: कभी-कभी विपदा ऐसी आती है कि हंसता-खेलता परिवार भी पल भर में उजड़ जाता है. ऐसा ही कुछ हुआ है गरखा प्रखंड की निवासी मीरा देवी के साथ. पहले उनके पति की मौत हो गई. उसके कुछ ही दिन बाद उनके बेटे की भी मौत हो गई. अभी यह घाव भरा भी नहीं था कि ससुराल में ही उनकी बेटी की भी मौत हो गई. बेटी की मौत के बाद दामाद ने भी नाता तोड़ लिया. बेटी के दो छोटे-छोटे बच्चों को भी मीरा देवी के हवाले कर दिया गया.

अब मीरा देवी के परिवार में उनकी दो नातिनें और वह खुद हैं. इस तरह घर में कुल तीन लोग थे, जिनमें कमाने वाला कोई नहीं रहा. उनके पति मजदूरी करते थे. घर की हालत पहले से ही ठीक नहीं थी. लगातार हुई इन घटनाओं के कारण मीरा देवी सदमे में चली गईं. तब से उनकी मानसिक स्थिति भी पूरी तरह ठीक नहीं रहती है.

आसपास के लोगों ने उन्हें काफी समझाया और सांत्वना दी. इसके बाद मीरा देवी को कभी-कभी आसपास में ही मजदूरी मिलने लगी. इसी कमाई से घर का राशन आता था. लेकिन कभी घर में राशन रहता था, तो कभी नहीं, क्योंकि उन्हें रोज काम नहीं मिलता था. कई दिनों तक बच्चों के साथ खाली पेट भी सोना पड़ता था. इस बीच उन पर कर्ज भी हो गया था.

घर की स्थिति को गंभीर देखते हुए आसपास की महिलाओं ने मीरा देवी को जीविका से जोड़ने के लिए अधिकारियों से संपर्क किया. इसके बाद उन्हें जीविका से जोड़ा गया. जुड़ने के बाद उन्हें चार बकरियां दी गईं. उन्होंने दो गाय भी खरीदीं. बकरियों के बच्चे और गाय का दूध बेचकर घर चलाना आसान हो गया. अब वह खेती भी करती हैं और गाय-बकरियों से होने वाली कमाई से अपने बच्चों को पढ़ा भी रही हैं.

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लोकल 18 से मीरा देवी ने बताया, ‘मेरे पति की मौत 2018 में हो गई. उसके बाद बेटे की भी मौत हो गई. घर में कोई कमाने वाला नहीं रहा. खाने के लिए राशन भी ठीक से एक वक्त का नहीं रहता था. घर की स्थिति गंभीर होने पर मजदूरी करके और कुछ कर्ज लेकर बच्चों का पेट भरती थी. कभी काम मिलता था, तो कभी नहीं. इसकी वजह से घर में राशन भी नहीं रहता था.

बाद में मैं जीविका से जुड़ गई. इसके माध्यम से घर चलाने के लिए चार बकरियां और दो गाय मिलीं. अब मैं गाय का दूध और बकरी के बच्चे बेचकर घर चलाती हूं. मेरे पास चार बकरियों से आठ बकरियां हो गई हैं. दो गायों में से कोई एक पूरे साल दूध जरूर देती है. उसे बेचकर घर चलाती हूं. कुछ खेती भी करती हूं. सरकार की यह योजना मेरे लिए जीने का सहारा बन गई है. पति, बेटे और बेटी की मौत से मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन सरकार की योजना ने मुझे जीने का सहारा दिया है.’

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