पहाड़ पर चट्टानों के बीच कैसे प्रकट हुईं मां बूढ़ेश्वरी? पतरो नदी किनारे स्थित इस धाम पर पूरी होती हैं मन्नतें

पहाड़ पर चट्टानों के बीच कैसे प्रकट हुईं मां बूढ़ेश्वरी? पतरो नदी किनारे स्थित इस धाम पर पूरी होती हैं मन्नतें


देवघरः झारखंड के देवघर जिले को बाबा बैद्यनाथ की नगरी के नाम से जाना जाता है. यहां कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जिनसे लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है. इन्हीं में से एक है देवघर मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर देवीपुर प्रखंड में स्थित बूढ़ेई माता मंदिर. यह मंदिर अपनी धार्मिक मान्यता के साथ-साथ प्राकृतिक खूबसूरती के लिए भी जाना जाता है. यहां पहाड़ की विशाल चट्टानों के बीच मां बूढ़ेश्वरी विराजमान हैं. मंदिर को देखकर ऐसा लगता है, मानो चट्टानों के बीच ही मां का धाम प्रकट हुआ हो.

यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालु मां के दर्शन के साथ इस जगह की प्राकृतिक सुंदरता को भी करीब से देखते हैं. बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों से श्रद्धालु यहां माथा टेकने पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि मां बूढ़ेश्वरी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है. इसी विश्वास के साथ लोग अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और मन्नत पूरी होने पर मां के दरबार में दोबारा हाजिरी लगाते हैं.

शहर की भागदौर से दूर है यह मंदिर 
देवीपुर के श्रद्धालू पवन कुमार बताते है की बूढ़ेई माता मंदिर बेहद प्राचीन मंदिर है जिसकी उतपत्ती खुद हुई है. इस मंदिर की सबसे खास बात यहां की बनावट और आसपास का प्राकृतिक नजारा है. मंदिर के एक ओर पतरो नदी बहती है, तो दूसरी ओर चारों तरफ पहाड़, बड़ी-बड़ी चट्टानें और हरियाली दिखाई देती है. शहर की भागदौड़ से दूर यह जगह श्रद्धालुओं को एक अलग ही अनुभव देती है. पहाड़ की चट्टानों के बीच स्थित मंदिर को लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं.

कुछ लोग इसे ज्वालामुखी पर्वत से जुड़ा हुआ मानते हैं. यहां पहुंचने वाले भक्तों के लिए यह जगह केवल पूजा-पाठ का स्थान नहीं, बल्कि प्रकृति के बीच कुछ समय बिताने का भी खास ठिकाना है.मंदिर के आसपास फैली हरियाली और पतरो नदी का बहता पानी इस स्थान की खूबसूरती को और बढ़ा देता है. यही वजह है कि यहां पहुंचने वाले लोगों के मन में मंदिर को लेकर श्रद्धा के साथ-साथ इस जगह को करीब से देखने की उत्सुकता भी बनी रहती है. यहां मांगी गयी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है.

क्या कहते हैं मंदिर के पुजारी?
बूढ़ेई मंदिर के पुजारी सरोज राऊत ने लोकल 18 को बताया कि मंदिर से जुड़ी एक और खास मान्यता मन्नत पूरी होने के बाद की पूजा से जुड़ी है. मंदिर के पुजारी बताते हैं कि जब किसी भक्त की मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वह मां के दरबार में आकर अपनी श्रद्धा के अनुसार बलि अर्पित करता है. स्थानीय परंपरा में इसे मां के प्रति आभार जताने के रूप में देखा जाता है. हालांकि, यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सबसे बड़ी बात मां बूढ़ेश्वरी के प्रति उनकी आस्था और विश्वास है. कोई परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर आता है, तो कोई अपने जीवन की परेशानियों से छुटकारा पाने की उम्मीद में मां के दरबार में पहुंचता है. सालों से चली आ रही इन मान्यताओं ने बूढ़ेई माता मंदिर को आसपास के इलाकों में एक खास धार्मिक पहचान दी है.

अगहन में अर्पण होता नए फसल का चुरा
इस मंदिर की पहचान केवल सालभर होने वाले दर्शन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अगहन महीने में यहां लगने वाला मेला भी लोगों के आकर्षण का बड़ा केंद्र है. अगहन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को लगने वाले इस मेले में आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज के लोग भी पहुंचते हैं.इस मौके पर नई फसल के धान से तैयार चूड़ा और दही मां बूढ़ेश्वरी को अर्पित किया जाता है. नई फसल के आगमन पर मां को अन्न चढ़ाने की यह परंपरा स्थानीय जीवन और खेती-किसानी से भी जुड़ी हुई है.

मेले में लकड़ी, लोहे और पारंपरिक इस्तेमाल की कई तरह की वस्तुओं की खूब बिक्री होती है. ग्रामीण इलाकों के लोग यहां खरीदारी करने के साथ मेले का आनंद भी लेते हैं. इस तरह बूढ़ेई माता मंदिर धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय परंपरा, खेती-किसानी और ग्रामीण बाजार को भी एक साथ जोड़ता है.पहाड़, पतरो नदी, हरियाली और मां बूढ़ेश्वरी के दरबार के कारण यह जगह देवघर जिले के खास धार्मिक स्थलों में गिनी जाती है.



Source link