पटना: पशुपालन में मुनाफा बढ़ाना है तो सिर्फ दूध देने वाले पशुओं की देखभाल करना काफी नहीं है, बल्कि उनके नवजात बच्चों पर भी विशेष ध्यान देना जरूरी है. आज का बछड़ा या बछड़ी ही कल का दुधारू पशु बनता है. ऐसे में गर्भावस्था के आखिरी महीनों से लेकर जन्म के बाद के शुरुआती दिनों तक की गई छोटी-छोटी लापरवाही पशु की सेहत, विकास और भविष्य के दुग्ध उत्पादन को प्रभावित कर सकती है. इस बारे में बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रंजना सिन्हा ने खास जानकारी दी है. अगर आप भी पशुपालन या डेयरी का काम करते हैं तो यह जानकारी आपके लिए उपयोगी है.
डॉक्टर रंजना बताती हैं कि गर्भवती पशु के खान-पान, जन्म के तुरंत बाद खीस पिलाने, समय पर कृमिनाशक दवा देने और संतुलित आहार की व्यवस्था करने से जानवरों के बच्चों का बेहतर विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलती है.
जन्म से पहले ही शुरू कर दें बच्चे की तैयारी
नवजात बछड़े और बछड़ी की देखभाल जन्म के बाद ही नहीं, बल्कि गर्भावस्था के दौरान ही शुरू हो जानी चाहिए. गर्भावस्था के अंतिम तीन महीनों में बच्चे का विकास तेजी से होता है. इस दौरान गर्भवती गाय या भैंस को संतुलित आहार देना बेहद जरूरी है. उसके भोजन में पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स होने चाहिए, ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास सही तरीके से हो सके और वह स्वस्थ पैदा हो.
अगर इस दौरान मां को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता है, तो बच्चे का जन्म के समय वजन और उसकी शुरुआती सेहत प्रभावित हो सकती है. इसलिए पशुपालकों को गर्भवती पशु के आहार और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
जन्म के तुरंत बाद करें ये जरूरी काम
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रंजना सिन्हा बताती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद सबसे पहले उसकी नाक और मुंह से श्लेष्मा यानी म्यूकस साफ करना चाहिए, ताकि उसे सांस लेने में परेशानी न हो. सामान्य तौर पर मां अपने बच्चे को चाटकर साफ करती है. इससे बच्चे के शरीर को उत्तेजना मिलती है और वह सक्रिय होने में मदद पाता है. अगर बच्चा जन्म के बाद सामान्य रूप से सांस नहीं ले रहा है या बहुत सुस्त है, तो तुरंत पशु चिकित्सक की मदद लेनी चाहिए. शुरुआती समय में सही देखभाल बच्चे की जान बचाने में अहम भूमिका निभाती है.
पहला दूध यानी खीस पिलाने में न करें देरी
नवजात बच्चे के लिए मां का पहला दूध सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसे खीस या कोलेस्ट्रम कहा जाता है. इसमें प्रोटीन, विटामिन और इम्यूनोग्लोबुलिन जैसे तत्व होते हैं, जो बच्चे को शुरुआती रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करने में मदद करते हैं. डॉ रंजना सिन्हा की मानें तो बच्चे को जन्म के बाद पहले एक से दो घंटे के भीतर खीस पिलाना शुरू करना चाहिए. अगर बच्चा खुद दूध नहीं पी पा रहा है, तो सावधानीपूर्वक उसकी दूध पीने में मदद करें.
उन्होंने आगे बताया कि आमतौर पर शुरुआती 24 घंटों में बच्चे को उसके शरीर के वजन के लगभग 10 प्रतिशत के बराबर खीस देने की सलाह दी जाती है. उदाहरण के लिए, 20 किलो वजन वाले बच्चे को लगभग 2 लीटर खीस की जरूरत हो सकती है. इसे कई बार में देना चाहिए. एक ही बार नहीं पिलायें. इससे डायरिया होने का खतरा बढ़ जाता है. खीस पिलाने में देरी होने पर बच्चे को पर्याप्त रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं मिल पाती, जिससे दस्त और दूसरी संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.
15वें दिन से ही जरूरी है कृमिनाशक दवा?
नवजात पशुओं में पेट के कीड़ों की समस्या उनके स्वास्थ्य और विकास को प्रभावित कर सकती है. इसीलिए बच्चे को 14वें या 15वें दिन से डिवार्मिंग कर देना चाहिए. इसके बाद 6 महीने तक हर महीने डिवार्मिंग करना चाहिए. यानी, कीड़े की दवा देना चाहिए. 6 महीने के बाद हर तीन महीने के अंतराल पर कीड़े की दवा देना चाहिए.
दूसरे सप्ताह से दें काफ स्टार्टर, तेजी से होगा विकास
बछड़े के बेहतर विकास के लिए दूसरे सप्ताह के आसपास से अच्छी गुणवत्ता वाला काफ स्टार्टर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में देना शुरू किया जा सकता है. इसके साथ साफ पानी भी उपलब्ध होना चाहिए. काफ स्टार्टर में प्रोटीन और ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा बच्चे के रूमेन यानी जुगाली करने वाले पशुओं के पेट के विशेष हिस्से के विकास में मदद करती है.
आहार में प्रोटीन की मात्रा लगभग 18 से 22 प्रतिशत या जरूरत के अनुसार इससे अधिक रखी जा सकती है. कुछ विशेष काफ स्टार्टर फॉर्मूलेशन में 22 से 24 प्रतिशत प्रोटीन भी होता है. सही मात्रा पशु की नस्ल, उम्र और आहार की गुणवत्ता के आधार पर तय करनी चाहिए. जैसे-जैसे रूमेन विकसित होता है, बच्चा ठोस आहार खाने और उसे पचाने में सक्षम होने लगता है. इससे दूध पर उसकी निर्भरता धीरे-धीरे कम होती है और वजन बढ़ाने में मदद मिलती है.
कैसा हो नवजात बच्चे का घर, आवास का है बड़ा महत्व
बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए साफ, सूखा, हवादार और सुरक्षित आवास जरूरी है. शुरुआती दिनों में नवजात बच्चों को अलग-अलग साफ जगह पर रखना उपयोगी हो सकता है, ताकि उनकी निगरानी आसानी से की जा सके और बीमारियों के फैलने का खतरा कम हो. बाद में उम्र और आकार के अनुसार छोटे समूह बनाए जा सकते हैं. लगभग 8 से 10 बच्चों के समूह में उन्हें रखने से आपसी व्यवहार सीखने और सक्रिय रहने में मदद मिल सकती है. हालांकि, समूह में पर्याप्त जगह, साफ पानी, चारे की उपलब्धता और नियमित निगरानी जरूरी है. कमजोर या बीमार बच्चों को जरूरत के अनुसार अलग रखना चाहिए.
टीकाकरण को न करें नजरअंदाज
खीस से मिलने वाली रोग प्रतिरोधक क्षमता बच्चे को शुरुआती समय में कई संक्रमणों से बचाने में मदद करती है, लेकिन यह सुरक्षा स्थायी नहीं होती और सभी बीमारियों से बचाव की गारंटी भी नहीं देती. इसलिए केवल खीस पिलाने के भरोसे टीकाकरण छोड़ना सही नहीं है. पशुपालकों को अपने क्षेत्र में प्रचलित पशु रोगों और सरकारी पशु चिकित्सा विभाग की सलाह के अनुसार टीकाकरण कराना चाहिए.